कश्मीर में बदली रणनीति के तहत एकजुट हुए सभी आतंकी संगठन?

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जम्मू-कश्मीर के कुलगाम जिले में रविवार को हथियारों से लैस चार आतंकवादी पुलिस कार्रवाई में मारे गए अपने एक साथी के जनाजे में शामिल हुए और इस दौरान उन्होंने जनाजे को ‘गन सल्यूट’ दिया और हवा में कई राउंड फायर किए। बंदूक से दी गई यह ‘सलामी’ सिर्फ अपने साथी को श्रद्धांजलि देने के लिए नहीं थी, बल्कि इसके जरिए आतंकवादियों की मंशा अपनी मौजूदगी का अहसास कराने की होती है और यह चलन खास तौर पर दक्षिण कश्मीर में पिछले दिनों काफी बढ़ा है। जम्मू-कश्मीर एक नए तरह का आतंकवाद का गवाह बन रहा है। 2002-03 में हुए बड़े आतंकवादी हमलों के लगभग 15 साल बाद इस ‘नए आतंकवाद’ ने सरकार के सामने कड़ी चुनौती पेश की है। इसके लिए आतंकियों ने जहां अपनी रणनीति को बदला है, वहीं अपनी सामाजिक स्वीकार्यता भी बढ़ाई है।
पुलिस के मुताबिक नई पीढ़ी के आतंकवादियों में स्थानीय युवकों की संख्या पिछले दो दशकों में सबसे ज्यादा हो गई है। खास बात यह है कि अलग-अलग आतंकवादी संगठन सिर्फ कहने को अलग रह गए हैं, जमीन पर सभी एक नजर आते हैं। जम्मू-कश्मीर पुलिस के मुखिया एसपी वैद के मुताबिक, दो सबसे खतरनाक आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन और लश्कर-ए-तैयबा इन दिनों साथ मिलकर ऑपरेट कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘हमें इन आतंकी संगठनों के बीच कोई अंतर नजर नहीं आता। ये सभी हमारे के लिए आतंकवादी हैं। हालांकि, हमें ऐसे इनपुट्स मिले हैं कि आजकल वे साथ मिलकर काम कर रहे हैं।’ पुलिस, आर्मी, सीआरपीएफ और अन्य एजेंसियों का कहना है कि आतंकवादियों की कुल संख्या 230 से 250 के बीच है और इनमें लगभग 60-70% आतंकी स्थानीय हैं। दक्षिण कश्मीर के पुलवामा, शोपियां, कुलगाम, अंनतनाग में 90% आतंकवादी स्थानीय हैं, जबकि लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) के नजदीक उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा, बांदीपुरा और बारामुला में 90% आतंकवादी विदेशी हैं क्योंकि सीमा पार से घुसपैठ सबसे ज्यादा यहीं होती है।

आतंकवादियों के खिलाफ चलाए जाने वाले ऑपरेशंस से जुड़े पुलिस अधिकारी दावा करते हैं कि घुसपैठ में आई कमी के बीच स्थानीय लोगों के आतंकवाद में शामिल होने से आतंकवादी संगठनों को ‘नया आत्मविश्वास’ हासिल हुआ है। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं पर हमले, बैंकों में लूट की घटनाएं और पुलिसवालों के घर पर हमले जैसी घटनाओं के पीछे स्थानीय आंतकवादियों को ही जिम्मेदार माना जा रहा है। पिछले साल जुलाई में हिजुबल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद से आंतकवादी संगठनों में स्थानीय युवकों की संख्या तेजी से बढ़ी है। तब से लेकर अब तक 100 से ज्यादा स्थानीय लोग आतंकवाद की राह पकड़ चुके हैं। एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने हमारे सहयोगी अखबार इकनॉमिक टाइम्स से कहा, ‘यह सीमा पार से बनाई गई रणनीति मालूम होती है कि अब वे ज्यादा लोगों को घुसपैठ के जरिए यहां नहीं भेजना चाहते। अब सबकुछ स्थानीय लोगों के सहारे ही किया जा रहा है।’ वैसे हिजबुल में हमेशा से ही स्थानीय लोगों की संख्या ज्यादा रही है और अब लश्कर भी स्थानीय लोगों द्वारा ही चलाया जा रहा है। सिर्फ जैश-ए-मोहम्मद आतंकवादियों की घुसपैठ करवा रहा है और सीमा पार से मिलने वाले निर्देशों पर काम कर रहा है। दक्षिण कश्मीर में सत्ताधारी पीडीपी के एक नेता ने कहा, ‘मुद्दा यह है कि ये आतंकवादी स्थानीय हैं। मेरे पड़ोस में कम से कम सात आतंकवादी रहते हैं। उन्हें सब पता है और उनमें कभी भी हमला कर देने की क्षमता है।’ पुलिस के मुताबिक आतंकवादी त्वरित जरूरत के हिसाब से अपनी रणनीति में बदलाव कर रहे हैं। लाइन ऑफ कंट्रोल पर सुरक्षाबलों की कड़ी निगरानी के चलते उन्हें सीमापार से हथियार और घुसपैठ कराने में मुश्किलें पेश आ रही हैं, इसलिए हथियारों की कमी को पूरा करने के लिए और पैसा जुटाने के लिए वे हथियार छीनने और बैंक लूटने जैसी वारदातों को अंजाम दे रहे हैं।

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