मंदसौर में संवादहीनता के चलते बिगड़ते गए जिले के हालात

0
360

मंदसौर। जिले का वातावरण कभी भी इतना अशांत नहीं रहा जितना 1 जून से 5 जून के बीच में हो गया। बदलती परिस्थितियों को भांपने में जिला व पुलिस प्रशासन पूरी तरह नाकाम रहा। चार दिन तक किसानों के गुस्से को शांत करने के लिए कलेक्टर स्वतंत्रकुमार सिंह व एसपी ओपी त्रिपाठी ने कोई प्रयास नहीं किए।

सबसे बड़ी बात यह रही कि सांसद, विधायक से लेकर प्रभारी मंत्री ने भी किसानों के बीच में पहुंचकर कोई संवाद नहीं किया। नतीजा यह रहा कि प्रशासनिक अमले की लापरवाही का खामियाजा आम जन को भुगतना पड़ा। जिले में तीन दिनों में हुई आगजनी, तोड़फोड़ में लगभग 50 करोड़ रुपए की चल-अचल संपत्ति का नुकसान हुआ है और शासन ने कलेक्टर-एसपी दोनों को विदाई भी दे दी है।

यहां चूके कलेक्टर स्वतंत्र कुमार सिंह

– 1 जून से शुरू हुए किसान आंदोलन को गंभीरता से नहीं लिया पहले दिन से संवाद की कोशिश नहीं।

– 2, 3 व 4 जून को हंगामे का मामला बढ़ने पर भी मौके से सभी एसडीएम व तहसीलदार गायब रहे पर कलेक्टर ने उनको तलब भी नहीं किया।

– जिले के सभी जनप्रतिनिधियों से अच्छा व्यवहार होने के बाद भी कलेक्टर ने किसानों को शांत करने के लिए जनप्रतिनिधियों को आगे लाने की पहल नहीं की।

– 4 जून को शाम को शहर में हुए हंगामे के बाद भी डीएम होने के नाते लॉ एंड ऑर्डर की व्यवस्था अपने हाथ में नहीं ली। न ही शहर सहित जिले में धारा 144 लगाई।

– 5 जून को मामला बढ़ने के बाद पहली बार कंट्रोल रूम पर पहुंचे। वहां भी सुरक्षा व्यवस्था से संबंधित मामले एसपी ओपी त्रिपाठी पर ही ढोलते रहे। दलौदा में महू-नीमच राजमार्ग पर जाम लगाकर बैठे किसानों को हटाने का फैसला लेने में 12 घंटे लगा दिए। तब तक वे रेलवे पटरी को भी नुकसान पहुंचा चुके थे। पिपलियामंडी में हालात काबू से बाहर होने के बाद भी धारा 144 नहीं लगाई गई।

– 6 जून को जब हालात ही काबू से बाहर हो गए। जिले में जगह-जगह किसानों का हंगामा होने लगा और पुलिस या सीआरपीएफ के जवानों को गोली चलाना पड़ी तब भी अपने कदम तत्काल पीछे खींच लिए कि गोली हमारे ऑर्डर से नहीं चली। जब स्थिति बेकाबू हो गई तो मंदसौर व पिपलियामंडी में कर्फ्यू की घोषणा की गई।

– 7 जून को भी जिले के बिगड़ते हालात पर कठोर निर्णय लेने में अक्षमता दिखाई। बरखेड़ा पंथ में भीड़ के झूमा-झटकी करने के बाद भी हालात की विकरालता को नहीं समझे। किसानों ने दिन भर जिले में सभी जगह ट्रकों, मकानों, दुकानों, वाहनों व बैंक में आग लगाई। और कंट्रोल रूम पर बैठकर हालात सामान्य होने का इंतजार करते रहे। आखिरकार रात में शासन ने हटा ही दिया।

एसपी ओपी त्रिपाठी भी नहीं संभाल पाए हालात

– पुलिस का खुफिया तंत्र किसानों के बीच में चल रही हलचल को पढ़ नहीं पाया। एसपी भी हालात की गंभीरता को नहीं समझे।

– 1 जून को ही दूध ढोल रहे व सब्जी विक्रेताओं को रोक रहे किसानों से उनके आंदोलन के स्वरूप पर बातचीत नहीं की। न ही उनकी बात को समझा।

– 2 जून को भी सब्जी सड़कों पर फेंकी जा रही थी और दूध ढोला जा रहा था पर पुलिस बल हाथ पर हाथ बांधकर दूर खड़ा रहा। क्योंकि उन्हें कुछ करने के निर्देश्ा ही नहीं दिए गए।

– 3 जून को भी किसानों ने वहीं सब किया जो वह चाहते थे। पर पुलिस को पूरे जिले में कहीं भी कार्रवाई नहीं करने के निर्देश दिए गए। इस बीच किसानों से बातचीत की भी कोशिश नहीं हुई ताकि हालात नहीं बिगड़े।

– 4 जून को ही पुलिस की सबसे बड़ी चूक हुई। पिपलियामंडी में किसानों की बैठक में हुए निर्णयों को पुलिस का खुफिया तंत्र और यहां तक कि पिपलियामंडी टीआई ने भी गंभीरता से नहीं लिया। सैकड़ों वाहन मंदसौर तरफ आने की सूचना के बाद भी उनको रोकने की कोशिश नहीं हुई।

– 5 जून को दलौदा में चक्काजाम की शुरुआत में भी किसानों के आंदोलन का एक हिस्सा मानकर शांत रहे। और केवल पुलिस बल वहां तैनात कर दिया। रात में रेलवे पटरी पर तोड़-फोड़ के बाद जागे।

– 6 जून को तो सुबह से ही हालात काबू से बाहर हो गए। फिर भी स्थिति की गंभीरता नहीं समझी। महू-नीमच राजमार्ग पर बही फंटे पर किसानों का प्रदर्शन काबू से बाहर हुआ, गोलियां चलने से पांच किसान मारे गए। इसके बाद भी फोर्स को पूरे आंदोलन पर कंट्रोल करने का ऑर्डर नहीं दिया।

– 7 जून को पिपलियामंडी में कर्फ्यू के बावजूद मकानों में आग लगाई गई। जिले भर में तोड़-फोड़ की घटनाएं हुई। तब भी अपने हाथ में पूरी कंट्रोलिंग व तेज निर्णय नहीं लिए।

यहां भी हुई चूक

तब भी किसी ने नहीं दिया ध्यान

4 जून को पिपलियामंडी की बैठक में जब किसानों ने उग्र भाषण में कह रहे थे कि अब मंदसौर को निशाना बनाना है और उसके बाद पिपलियामंडी को भी निशाना बनाएंगे। तब भी कुछ पटवारियों व अन्य मैदानी कर्मचारियों का दावा है कि हमने अधिकारियों को इसकी सूचना दे दी थी। फिर भी सैकड़ों किसानों को मंदसौर में आने दिया गया और वे तोड़-फोड़ कर चले गए।

एक माह पहले से ही चल रहा था मूवमेंट

वॉट्स एप व फेसबुक पर 1 जून से 10 तक मंडी के साथ ही शहरों में दूध व सब्जी की बिक्री पर रोक लगाने का मैसेज चल रहा है, जो तेजी से वायरल भी हो रहा था। उस समय पुलिस के खुफिया तंत्र और न ही प्रशासनिक अमले ने इसे गंभीरता से लिया। 1 जून से ही किसान सड़कों पर उतर आए। पहले तीन दिन तक वे दूध विक्रेताओं को रोककर दूध ढोलते रहे।

ऐसे बढ़ा घटनाक्रम

1 जून- भारतीय किसान यूनियन की प्रदेश इकाई के आह्वान पर गुरुवार से किसानों की हड़ताल प्रारंभ हुई। पहले ही दिन मंडी में 15 लाख रुपए का व्यवसाय हुआ, जबकि 30 जून को 15 करोड़ रुपए का व्यवसाय हुआ था। थोक सब्जी मंडी में भी केवल 50 किसान ही पहुंचे। सुवासरा में सब्जी बेचने आए किसानों और हड़ताल कर रहे किसानों में नोक-झोक हुई। दलौदा क्षेत्र में कुछ दुग्ध उत्पादकों को दूध बेचने से रोका गया। तो कुछ का दूध बहाया। हड़ताली किसानों ने डेरियों को भी बंद कराया है।

2जून- किसान हड़ताल कुछ उग्र हुई। थोक सब्जी मंडी में आ रहे किसानों की लगभग 100 किलों से अधिक सब्जियां सड़कों पर फेंक दी। जहां भी विक्रेता दिखे पकड़कर दूध बहा दिया। दुकानों में जबरन घुसकर दूध बहाया। एसपी ओपी त्रिपाठी ने दावा किया कि सभी थाना प्रभारियों को निर्देश जारी किए हंै कि हड़ताल में शामिल नहीं होेने वाले किसानों पर जबरन दबाव बनाने वालों और सब्जियां फेकने व दूध बहाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

3 जून- हड़ताल के तीसरे दिन और उग्र हो गई। किसानों की भीड़ में शामिल हुड़दंगियों ने खुलेआम धमाल मचाई। जिले के मंदसौर के साथ ही आंदोलन की चिंगारी सीतामऊ, सुवासरा, भानपुरा, बोलिया, गरोठ तक पहुंच गई। दूध विके्रेताओं व सब्जी विक्रेताओं को सुरक्षा मुहैया कराने के लिए न तो पुलिस मौजूद थी और न ही प्रशासन का कोई नुमाइंदा। 80 लीटर दूध छीनकर जिला अस्पताल में वितरित किया गया।

4 जून- पिपलियामंडी में बैठक के बाद शाम को शहर में पहुंचे हड़ताली किसानों ने जमकर उत्पात मचाया। सैकड़ों दुपहिया वाहनों पर आए किसानों को रोकने के बजाय पुलिस प्रशासन हाथ बांधे खड़ा रहा। जिला प्रशासन का कोई अधिकारी मैदान में नहीं आया। हुड़दंगी किसानों ने महू-नीमच राजमार्ग से लेकर गणपति चौक तक लगभग 20 से अधिक फल व सब्जी व्यवसायियों के ठैलों से सारे फल फेंक दिए और कुछ लूटकर चले गए। एक ज्यूस सेंटर पर सारी मोसंबियां नीचे बिखेर दी। लगभग एक घंटे तक किसान शहर में घूमकर हंगामा करते रहे और 5 जून को शहर बंद रखने की चेतावनी भी दे गए। बाद में व्यवसायियों ने कोतवाली का घेराव भी किया। और पुलिस द्वारा सुरक्षा का आश्वासन नहीं देने पर 5 जून को शहर बंद रखने का फैसला भी लिया।

5 जून- किसानों की चेतावनी के चलते मंदसौर सहित जिले के कई कस्बे पूरी तरह बंद रहे। किसानों ने दलौदा, मल्हारगढ़, पिपलियामंडी, डिगांव, रुपनी, गुर्जरबर्डिया में सड़कों पर चक्काजाम किया। दलौदा में महू-नीमच राजमार्ग पर 12 घंटे तक जाम लगा रहा। सड़क पर दोनों ओर करीब 10-10 किलोमीटर लंबी वाहनों की कतारें लग गई। रात में किसानों ने दलौदा में रेलवे फाटक तोड़ दी। पटरियों के क्लिप निकालकर सिगनल केबल जला दी। सिगनल को जला दिया। रात लगभग 1.30 घंटे तक रतलाम-अजमेर रेलमार्ग पर ट्रेनों व मालगाड़ियों का आवागमन बंद रहा। रात 2 बजे पुलिस ने लाठीचार्ज कर चक्काजाम खत्म कराया। मंदसौर में कुछ दुकानों में तोड-फोड़ भी हुई। पिपलियामंडी, मल्हारगढ़ सहित लगभग पूरे जिले में किसानों के रूप में भीड़ ने उत्पात मचाया। पिपलियामंडी में रात में व्यापारियों से झड़प के बाद एक मकान व दुकान में आग लगाने की कोशिश की गई।

6 जून- किसान आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया। पिपलियामंडी व बही चौपाटी के बची पुलिस से झड़प के बाद चली गोली में पांच किसानों की मौत हो गई। दो गंभीर घायल हुए। गोलीबारी के बाद हिंसक हुए किसानों ने पिपलियामंडी थाना जलाने की कोशिश्ा की। बूढ़ा में पुलिस चौकी व मेलखेड़ा में सहायता केंद्र, बीएसएनएल के कार्यालय में आग लगा दी। शामगढ़ की पेयजल पाइप लाइन फोड़ दी। महू-नीमच राजमार्ग पर 30 ट्रकों में आग लगा दी गई। डिगांव में भी किसान व पुलिस आमने-सामने हो गए। यहां भी झड़प के बाद पुलिस पर पथराव हुआ। सीआरपीएफ की एक कंपनी जिले में आ गई।

7 जून- किसानों की मौत के मामले में पुलिस के गोली चालन के इंकार से किसान और उग्र हो गए। बरखेड़ा पंथ में मृतक अभिषेक के अंतिम संस्कार से पहले महू-नीमच राजमार्ग पर जाम लगाकर किसानों ने कलेक्टर व एसपी को बुलाया। कलेक्टर के साथ झूमा झटकी कर कपड़े भी फाड़ दिए। इसके बाद फिर बही फंटे पर 20 ट्रकों में आग लगाई गई। कयामपुर में तीन बैंक शाखाओं में आग लगा दी गई। देशी शराब की दुकान 20 दुकाने व 100 वाहन किए आग के हवाले। भानपुरा में पाटीदार समाज व व्यापारी आमने-सामने हो गए। यहां पहले आंदोलनकारियों ने सब्जी मंडी में 50 दुकाने फूंक दी और 6 से अधिक वाहनों में आग लगा दी। बाद में आक्रोशित सब्जी व फल व्यवसायियों ने पाटीदार समाज की दुकानों में आग लगा दी। सुवासरा में भी किसान व व्यापारी आमने-सामने हुए। यहां भी आगजनी की घटनाए हुई। सुवासरा टीआई श्यामबाबू शर्मा भी झड़प में घायल हुए। ग्राम टकरावद में अंतिम संस्कार में पहुंचे पूर्व विधायक राधेश्याम पाटीदार के साथ भी ग्रामीणों ने अभद्र व्यवहार किया। रुपनी चौराहे पर उनके वाहन में आग लगा दी गई।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here