बिहार में कुपोषण खतरनाक स्तर पर : कहीं रो नहीं पा रहे बच्‍चें, तो कहीं आंख तक नहीं खोल पा रहें

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पटना : बिहार में कुपोषण किस खतरनाक स्तर पर जा पहुंचा है, इसकी असलियत जाननी है तो किसी दूरस्थ आदिवासी बाहुल्य या फिर जंगली क्षेत्र के गांव में जाने की जरूरत नहीं, बल्कि पीएमसीएच अस्पताल में बने पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) का भ्रमण कर लीजिए.
पिछले तीन दिन में इन एनआरसी में ऐसे कुपोषित बच्चे आये हैं, जिन्हें देखते ही सिहरन उठ जाती है. सरकारी आंकड़ों पर भी गौर करें तो बिहार में बारह में से आठ बच्चे कुपोषित हैं. 26 फीसदी बच्चे अति कुपोषित हैं. मगर न तो राज्य सरकार के निश्चय में इस मुद्दे को उठाया जा रहा और न ही केंद्र सरकार कुपोषण पर ध्यान दे रही. लापरवाही की पोल खोलती रिपोर्ट..

बिना आवाज कांप-कांप कर रोते हैं बच्चे : एनआरसी में भरती इन कुपोषित बच्चों की हालत इतनी नाजुक है, कि वह ठीक से आंख भी नहीं खोल पा रहे हैं. बच्चे रोते तो हैं पर रोने की आवाज भी मुंह से नहीं निकल पाती. बिना आवाज यह बच्चे कांप-कांपकर रोते हैं. कई बच्चे ऐसे हैं जो दो साल से ज्यादा के हैं, लेकिन खड़ा होना तो दूर, ठीक से बैठ भी नहीं पा रहे. कुछ अति कुपोषित ऐसे भी हैं जिनकी आंखें तक ठीक से नहीं खुल पा रहीं.

स्थिति भयावह

स्वास्थ्य विभाग के सरकारी आंकड़ों में बिहार में 12 में से आठ बच्चे कुपोषित हैं, 26 फीसदी बच्चे अति कुपोषित हैं. जबकि 80 फीसदी महिलाएं एनीमिया की शिकार हैं. महिलाएं और बच्चे असमय मौत के चंगुल में फंस रहे हैं. यूनिसेफ व मिशन मानव विकास की सर्वे रिपोर्ट देखें तो राज्य में छह माह से छह वर्ष तक आयु वर्ग के 44% बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, जबकि 15 से 49 वर्ष तक की 50% महिलाएं एनीमिया रोग से ग्रसित हैं.

काम नहीं मिलता तो मांगनी पड़ती है भीख

वैशाली जिले के महनार ढारा चौरी गांव की रहने वाली दो साल की सुप्रिया कुपोषण की शिकार है. दो साल तक तो वह गांव में ही अपनी बीमारी से जूझती रही.

मां ऋतु देवी ने जब सुना कि पीएमसीएच में कुपोषण केंद्र बना है, तो वह जैसे तैसे पटना पहुंची और यहां बेटी को भरती करा इलाज करा रही है. सुप्रिया के पिता जितेंद्र साव मजदूरी का काम करते हैं, जैसे-तैसे घर का पेट भर रहे जितेंद्र ने कहा कि जब काम मिलता है तो घर में अनाज आता है वरना भीख मांगने की नौबत आ जाती है. ऋतु ने कहा कि आज तक न तो उसका राशन कार्ड बना है और न ही जिला व प्रखंड के अस्पतालों से दवा मिलती है. यही वजह है कि आज सुप्रिया कुपोषण की शिकार हो गयी है

यहां फेल हुईं सरकारी व्यवस्थाएं

केवल मां का दूध स्तनपान की गहन मॉनीटरिंग छह माह तक नहीं हो रही
छह माह से तीन साल तक के बच्चों का ग्रोथ मॉनीटरिंग सुनिश्चित नहीं
छह माह से तीन साल तक के बच्चों को नहीं मिल रहा पूरक आहार
पानी उबाल कर पीने एवं सफाई पर जोर के लिए अभियान बंद

आशा कार्यकर्ताओं एवं आंगनबाड़ी सेविकाओं के पास ओआरएस समेत आवश्यक दवाएं नहीं
उप स्वास्थ्य केंद्रों, अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों एवं प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में कुपोषण एवं एनीमिया के प्रबंधन पर ध्यान नहीं
सिर्फ कागजों में ही बाल विवाह में कमी एवं छोटा परिवार को प्रोत्साहन हो रहा

किशोरियों के स्वास्थ्य पर नहीं है विशेष ध्यान

वोटर कार्ड तो बना, लेकिन राशन कार्ड नहीं

छपरा के नगरा गांव के रहने वाले दीपक शर्मा का 10 माह का बेटा कृष्णा शर्मा अति कुपोषण का शिकार है. निमोनिया व डायरिया से ग्रस्त कृष्णा का ग्रोथ होना बंद हो गया है.

कृष्णा की मां रिंकी देवी ने कहा कि गांव में जब चुनाव आता है तो नेता लोग आते हैं, यहां तक कि वोटर आइ कार्ड भी बन चुके हैं, लेकिन अभी तक राशन कार्ड नहीं बने, जबकि हर बार कर्मचारी फोटो लेकर जाते हैं, गांव में मिट्टी का घर और बेरोजगार जीवन व्यतीत कर रहे दीपक को अगर मजदूरी का काम मिलता है तो करता है वरना स्टेशन, बस स्टैंड में भीख मांग परिवार का भोजन जुटाने का काम करता है.

क्या कहते हैं अधिकारी

कुपोषण जड़ से खत्म हो इसके लिए सिर्फ स्वास्थ्य विभाग ही नहीं बल्कि समिति बाल विकास परियोजना, खाद्य आपूर्ति विभाग और अनुसूचित जाति जनजाति विभाग के अधिकारियों ध्यान देना होगा, क्योंकि जब तक बच्चों को सही पोषाहार नहीं मिलेगा कुपोषण खत्म नहीं होगा. रही बात स्वास्थ्य विभाग की तो हम लोग कुपोषण पुनर्वास केंद्र, डायरिया प्रोग्राम आदि का अभियान गांव-गांव तक चला रहे हैं. वहीं आपने बताया तो इस मुद्दे को हम स्वास्थ्य विभाग के समक्ष प्रस्तुत करेंगे.

शशिभूषण कुमार, निदेशक राज्य स्वास्थ्य समिति.

बीमारी के प्रमुख कारण

आंगनबाड़ी केंद्रों पर नाम मात्र सुविधाएं
गरीब परिवारों के बच्चों में कुपोषण ज्यादा
माताओं में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की कमी
पहले छह माह में केवल 49 फीसदी बच्चों को माताओं का दूध नसीब

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