डोकलाम विवाद का असर? मोदी सरकार 83 अरब रुपये के फॉसुन-ग्लैंड डील पर लगाएगी रोक

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मोदी सरकार शंघाई फॉसुन फार्मास्युटिकल ग्रुप कंपनी की ओर से भारतीय दवा निर्माता कंपनी ग्लैंड फार्मा के प्रस्तावित अधिग्रहण पर रोक लागने जा रही है। मामले से वाकिफ एक व्यक्ति के मुताबिक, सरकार देश में चीन के अब तक के सबसे बड़े अधिग्रहण प्रस्ताव पर पाबंदी लगाने ही वाली है। उस व्यक्ति ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमिटी ने चीनी कंपनी की ओर से ग्लैंड फार्मा में 86 प्रतिशत खरीद पर ब्रेक लगाने का फैसला किया है।

पहचान उजागर नहीं करने की शर्त पर उस व्यक्ति ने कहा कि अभी दोनों कंपनियों को इसकी औपचारिक सूचना नहीं दी गई है। दक्षिण एशिया के दो सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार देश भारत और चीन के बीच जारी तनाव से सीमा विवाद को ताजी हवा मिल गई है। अधिग्रहण नहीं हो पाया तो फॉसुन फार्मा को बड़ा झटका लगेगा जो ग्लैंड फार्मा की जेनरिक इंजेक्टेबल मेडिसिन्स और फसीलटीज में अमेरिका में बिक्री के लिए उत्पादों के निर्माण कोस्वीकृति दिलाने की कोशिश में था।

मुंबई के वेरिटास लीगल में मैनेजिंग पार्टनर एवं विलय तथा अधिग्रहण के वकील अभिजीत जोशी ने कहा, ‘यह करीब-करीब प्रतिबंध जैसा है। इस तरह की डील को खारिज करने का कुल मिलाकर मतलब चीनी कंपनी को नहीं का इशारा देना है। इसका मतलब है कि जवाबी कार्रवाई में चीन भी कोई कदम उठा सकता है।’ चीनी अरबपति बिजनसमेन गुओ ग्वांगचांग समर्थित फॉसुन फार्मा ने एक्सचेंज फाइलिंग में मंगलवार को कहा था कि ग्लैंड फार्मा को भारत सरकार की ओर से अधिग्रहण सीमक्षा के परिणाम पर कोई नोटिस नहीं मिला है। चीन का दिग्गज बिजनस ग्रुप फॉसुन इंटरनैशनल लि. की इस कंपनी ने पिछले साल जुलाई में केकेआर ऐंड कंपनी समेत अन्य निवेशकों के ग्रुप से ग्लैंड फार्मा का मालिकाना हक खरीदने पर हामी भरी थी। इस ताजा झटके से कभी अधिग्रहण में माहिर चीन की इस दिग्गज कंपनी की कठिनाइयों का अंदाजा लगाया जा सकता है जो अपने देश और विदेशों में बढ़ते दबाव का सामना कर रही है। एचएनए ग्रुप कंपनी हाल ही में फ्लाइट के अंदर मनोरंजन मुहैया करानेवाली कंपनी के अधिग्रहण से पीछे हट गई जबकि डैलियन वांडा ग्रुप कंपनी ने रेग्युलेटरों की जांच-पड़ताल के बीच अपने ज्यादातर थीम पार्क की बिक्री की हामी भर दी।

ग्लैंड फार्मा की बिक्री को लेकर ऐंटी ट्रस्ट फाइलिंग्स की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी और देश के विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड ने इसकी समीक्षा भी कर ली थी। गुरुवार को विदेश राज्य मंत्री वी के सिंह ने संसद में कहा, ‘चीन के साथ भारत का बहुआयामी संबंध है। जिन क्षेत्रों में हमारे नजरिए मिलते हैं, वहां हाल के वर्षों में आपसी सहयोग को बढ़ावा मिला है।’ सिंह ने कहा कि दोनों देशों को पहले से मान्य सिद्धातों के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘भारत और चीन को अपने संबंध में मतभेद को विवाद में परिवर्तित नहीं होने देना चाहिए।’

हॉन्ग कॉन्ग शेयर बाजार को सौंपी गई 27 जुलाई की फाइलिंग में फॉसुन फार्मा ने कहा कि उसे चीनी अथॉरिटीज से जरूरी स्वीकृतियां मिल गई हैं। फाइलिंग में कहा गया है कि चूंकि अधिग्रहण के लिए भारत की आर्थिक मामलों की कैबनिट कमिटी की समीक्षा एंव स्वीकृति मिलनी बाकी है, इसलिए टर्मिनेशन की तारीख बढ़ाकर 26 सितंबर कर दी गई है।

चीनी दवा निर्माता कंपनियां वैसी डील को लेकर बेकरार दिख रही हैं जो उन्हें दुनिया की सबसे बड़े दवा बाजार अमेरिका में प्रवेश दिला सके। इसी क्रम में चीन की सैनपावर ग्रुप कंपनी ने इसी साल वैलियंट फार्मास्युटिकल्स इंटरनैशनल इंक की डेंड्रियन फार्मास्युटिकल यूनिट को 82 करोड़ डॉलर (करीब 52 अरब रुपये) में खरीदा था। वहीं, बेहोशी की दवाइयां एवं गर्भनिरोधक बनानेवाली कंपनी ह्युमनवेल हेल्थकेयर ग्रुप कंपनी उस कंशोर्सियम की हिस्सा रही जिसने जून महीने में अमेरिकी कंपनी राइटडोज को करीब 605 मिलियन डॉलर (करीब 38 अरब रुपये) में खरीदने पर सहमति प्रदान की।

अलीबाबा ग्रुप होल्डिंग लि., टेन्संट होल्डिंग्स लि. और श्याओमी कॉर्प जैसी चीनी कंपनियां भारत में निवेश कर रही हैं। अलीबाबा की फाइनैंस यूनिट भारत के सबसे बड़े डिजिटल पेमेंट स्टार्टअप पेटीएम के बोर्ड में शामिल है जबकि टेन्संट ने फ्लिकपकार्ट में निवेश कर रखा है। उधर, मोबाइल हैंडसेट बनानेवाली कंपनी श्याओमी ने भारत में 50 करोड़ डॉलर (करीब 32 अरब रुपये) का निवेश कर चुकी है और उसकी अगले तीन से पांच सालों में और निवेश की योजना है।

वेरिटास के जोशी ने कहा, ‘विलय एवं अधिग्रहण के जरिए भारत में चीनी निवेश पर असर होने जा रहा है। भारत में निवेश को लेकर उनकी उलझन बढ़ती जा रही है। उन्होंने चीन से जो पूंजी जुटाई थी, वह अब कम-से-कम निकट भविष्य में तो उपलब्ध नहीं होने जा रही है। इसका मतलब है कि कोई डील करना बेहद मुश्किल होगा।’

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