बिहार सृजन घोटाले पर स्पेशल स्टोरी : पशुपालन व शेयर घोटाले की याद करा दी ताजा

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भागलपुर का चर्चित सृजन घोटाला करीब एक हजार करोड़ तक का पहुंच गया है. घोटाले के बाद राज्य में सियासी घमासान मचा है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस घोटाले की जांच सीबीआइ से कराने की सिफारिश भी कर दी है. सृजन घोटाले की शुरुआत तो बहुत पहले हो गयी थी.

2013 में यह मामला सामने आया जरूर, पर उस समय जांच आगे नहीं बढ़ पायी. यूं कहें कि इस मामले से जुड़े सफेदपोश, अधिकारियों ने इस घोटाले को बाहर निकलने ही नहीं दिया. जांच रिपोर्ट पर गौर करें तो सृजन के खाते में सरकारी राशि का फर्जी तरीके से ट्रांसफर आठ डीएम के कार्यकाल में हुआ. सृजन घोटाले के घटनाक्रमों से जुड़ी कहानी पर परत-दर -परत प्रकाश डालती यह स्पेशल स्टोरी :
चार अगस्त, 2017. शुक्रवार का दिन. भागलपुर के डीएम आदेश तितिरमारे की गोपनीय रिपोर्ट जब राज्य मुख्यालय को मिली तो अफसरों की नींद हराम हो गयी. आनन फानन में मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह, गृह सचिव आमीर सुबहानी,डीजीपी पीके ठाकुर, इओयू के आइजी जीएस गंगवार ने आपात बैठक की. अधिकारियों की सहमति बनी कि तुरत इस सूचना को मुख्यमंत्री काे दी जाये. अधिकारियोंं ने जब सीएम को यह जानकारी दी तो उन्होंने तत्काल पुलिस और वित्त विभाग के वरिष्ठ अधिकािरयों को भागलपुर रवाना होने का आदेश दिया.

जो चौंकाने वाली सूचना भागलपुर से आयी थी उस पर मुख्यमंत्री ने तत्काल कार्रवाई करने का निर्देश दिया. राज्य सरकार के हेलीकाप्टर से अधिकारी भागलपुर भेजे गये. अंदेशा था कि कहीं आरोपी हाथ से निकल नहीं जायें. दोपहर बाद मुख्यमंत्री राजधानी में पृथ्वी दिवस के मौके पर आयोजित ज्ञान भवन के समारोह में कहा कि एक बड़े घोटाले की जानकारी मिली है, अधिकारियों को भागलपुर भेजा गया है. सरकार के खजाने से निकल कर राशि सृजन नाम की गैर सरकारी संस्था के खाते में जमा हुई और वह रकम अफसर व रोजनेताओं के करीबियों के खाते में जमा होते गयी.

भागलपुर के इस सृजन घोटाले ने नब्बे के दशक के चारा घोटाला और हर्षद मेहता के शेयर घोटाले की याद ताजा कर दी . दरअसल, सृजन घोटाले का मैकेनिज्म भी कुछ-कुछ शेयर घोटाले की तर्ज पर ही सामने आया है. सरकारी रकम जो विकास योजनाओं के लिए राज्य सरकार व केंद्र सरकार ने जिले को भेजे, वह रकम सीधे सृजन के खाते में जमा होने लगी.

अब सबकी नजर सीबीआइ पर टिकी है. हालांकि, सीबीआइ के समक्ष पहले से ही राज्य के कई मामले लंबित हैं, पर इसकी जांच खुद सीबीआइ के लिए भी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है. जानकार बता रहे हैं कि सीबीआइ ने घोटालेबाजों के लिंक को खोज निकाला तो रकम बारह से पंद्रह हजार करोड़ रुपये को पार कर सकती है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस मामले को सीबीआइ को सौंपने का बेहतर फैसला लिया है. सीबीआइ ही यह राज खोल सकती है कि मनोरमा देवी के रिश्ते भागलपुर में तैनात होने वाले अफसरों और बैंक मैनेजरों से किस तरह थे.
ऐसे खुलती गयी परत-दर-परत

सृजन ने घोटाले का सृजन तो वर्षों पूर्व कर दिया था पर बाहरी चमक-दमक ने लोगों को इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि यहां इतने बड़े घोटाले का सृजन हो रहा है. कई ऐसे सवाल अभी भी लोगों की जेहन में है जिनका जवाब न तो अफसर दे पा रहे हैं और ना ही बैंक. ऐसा भी नहीं कि पूर्व में यह मामला नहीं आया. आया तो जरूर पर, इसे उस समय दबा दिया गया. इस मामले से जुड़े सफेदपोश और अफसर गंठजोड़ ने इस घोटाले को बाहर निकलने नहीं दिया.

ऐसा इसलिए कि चर्चित जयश्री ठाकुर का मामला भी सृजन से जुड़ा था . जयश्री पर गलत तरीके से संपत्ति हस्तांतरण का मामला दर्ज तो हुआ लेकिन सृजन से जुड़े मामले की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया. सवाल यह है कि ध्यान नहीं दिया या फिर ध्यान नहीं देने दिया गया.

भागलपुर के लोग बताते हैं कि मनोरमा देवी ने सृजन को जीरो से शिखर पर लाया. इसमें उनकी बड़ी भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन उनकी मौत के बाद करोड़ों का मामला उजागर होना इस बात को बल देता है कि कहीं इसमें बड़े सफेदपोश की भूमिका तो नहीं. ऐसा तो नहीं कि मनोरमा का हिसाब-किताब लिखित होता था.

वह कंप्यूटर या फिर आधुनिक सॉफ्टवेयर पर अधिक भरोसा नहीं करती थी. ऐसे में शहर में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि जब वर्षोँ ये यह खेल जारी था तो आज चर्चा में क्यों आया. कहीं कुछ सफेदपोश अपनी गर्दन बचाने की फिराक में तो नहीं, या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि मनोरमा देवी के जाने के बाद संस्था का दारोमदार नये चेहरे पर आने से कुछ को अपनी बादशाहत जाती दिखी.

हालांकि चर्चाओं पर यकीन करें तो ऐसा होना लाजिमी भी है. मनोरमा देवी जब तक जिंदा रहीं, तब तक कुछ गिने-चुने शख्स ही उनके आस-पास रहे. उन पर वह भरोसा भी सबसे अधिक करती थीं. यही नहीं, शहर की कई संपत्तियों की खरीदारी भी इसी शख्स के नाम से हुई. मनोरमा के जाने के बाद इन चेहरों में कुछ की नजदीकी इन दिनों कम थी. ऐसी चर्चा जोरों पर है. ऐसे में शहर में इस बात की चर्चा जोरों पर है सृजन से अपनी नजदीकी को दूर जाते देख, पूरी घटना का ताना-बाना बुना गया.

अब तक

12 गिरफ्तार
ये हैं आरोप
प्रेम कुमार
(डीएम के स्टेनो)
इन्हें धोखाधड़ी के इस मामले में शामिल पाया गया है. मोबाइल पर की गयी बातचीत में इओयू को कई ऐसी बातें पता चली हैं, जिससे यह साबित हुआ है कि बैंक व नजारत शाखा के बीच यह कड़ी का काम करता था.
अरुण
कुमार सिंह
(बैंक ऑफ बड़ौदा के पूर्व मैनेजर)
इनके खिलाफ कई गलत तरीके से तैयार किये गये कागज
पर हस्ताक्षर मिले हैं.
अजय पांडेय को इस धोखाधड़ी का मास्टरमाइंड बताया जा रहा है. वह बैंक कर्मी, नजारत, डीएम के स्टेनो और सृजन के पदाधिकारियों के बीच को-ऑर्डिनेटर का काम करता था.
बंशीधर
फर्जी तरीके से बैंक स्टेटमेंट व पासबुक तैयार किया करता था, जिसका इस्तेमाल विभाग को कागजात उपलब्ध कराने में किया जाता था.
राकेश यादव
(नाजिर, जिला परिषद)
नाजिर राकेश यादव ने प्रेम कुमार, राकेश झा और सृजन के पदाधिकारियों से मिल कर धोखाधड़ी की और उससे लाभ लिया. मोटी रकम मिलने पर उसने कई जगह पर लाखों निवेश किया.
राकेश झा
(नाजिर)
नाजिर राकेश झा नजारत के खाते से अवैध निकासी में बैंककर्मी, प्रेम कुमार और सृजन के पदाधिकारियों के साथ था. सारी जानकारी होने पर वह लाभ लेता रहा, लेकिन जिलाधिकारी को इसकी सूचना नहीं दी.
सरिता झा
(सृजन की प्रबंधक)
सरिता झा को भी इस धोखाधड़ी में शामिल पाया गया है. इस बात का सबूत मिला है कि सृजन से जारी होनेवाले चेक पर सरिता झा के भी हस्ताक्षर होते थे.
एससी झा
(सृजन के ऑडिटर)
एससी झा पर आरोप है कि इतनी बड़ी राशि की धोखाधड़ी और बंशीधर द्वारा बनाये गये बैंक स्टेटमेंट में गड़बड़ी होने के बाद भी उन्होंने उस गलती को नहीं पकड़ा. वे भी उस गिरोह में शामिल थे.
अरुण कुमार
(जिला कल्याण पदाधिकारी)
महेश मंडल
(नाजिर, कल्याण विभाग)
नाजिर महेश मंडल पर आरोप है कि वह कल्याण पदाधिकारी और सृजन की पूर्व सचिव मनोरमा देवी के बीच पुल का काम किया करता था.
विनोद कुमार
(ड्राइवर)
विनोद सृजन की पूर्व सचिव मनोरमा देवी का ड्राइवर था. उस पर आरोप है कि वह चेक और विभिनन कागजात को बताये गये ठिकानों पर पहुंचाने का काम करता था.
अतुल कुमार
(बैंक ऑफ बड़ौदा का असिस्टेंट मैनेजर)
अतुल कुमार पर भी इस धोखाधड़ी मामले में शामिल होने का आरोप है. वह कई सरकारी चेक को पास कर चुका था.

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