को-एजुकेशन जरूरी, पैरेंट्स दें बच्चों को सेक्स एजुकेशन – आयुष्मान खुराना

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मुंबई। आयुष्मान खुराना इन दिनों अपनी फिल्म शुभ मंगल सावधान के प्रमोशन में व्यस्त हैं। हाल ही में रिलीज़ हुई उनकी फिल्म बरेली की बर्फी बॉक्स आॅफिस पर कामयाब हो चुकी है। अब आयुष्मान ऐसी ही उम्मीद शुभ मंगल सावधान से भी कर रहे हैं।

आयुष्मान की यह फिल्म पुरुष से जुड़ी एक ऐसी समस्या को मनोरंजक अंदाज़ में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रही है, जिसके बारे में बात करना अब भी टैबू माना जाता है और अगर आप किसी से बातचीत भी करें तो लोग इसका मज़ाक बनाते हैं। आयुष्मान जबकि यह स्वीकारते हैं कि यह बेहद जरूरी है कि इस तरह के मुद्दे पर से टैबू वाला टैग तभी हटेगा, जब परिवार से ही इसकी शुरुआत हो जाये। परिवार के बड़े लोगों को बच्चों को उचित समय पर सेक्स एजुकेशन देना बहुत ज्यादा अनिवार्य है। तभी बच्चे हर तरह से अलर्ट भी रहेंगे और अगर वह किसी परेशानी से जूझ रहे होंगे तो उसके लिए डॉक्टर से मिल पायेंगे। आयुष्मान इस बात पर भी फोकस करते हैं कि कई बार परिवार में ही ऐसे लोग होते हैं, जो शोषण कर रहे होते हैं। लेकिन जानकारी न होने से उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है। इसलिए पैरेंट्स से वह यही कहना चाहते हैं कि बच्चों से खुल कर बात करें।
आयुष्मान अपने पुराने दौर को याद करते हुए कहते हैं कि वह हमेशा आॅल ब्वॉयज़ स्कूल और आॅल ब्वॉयज़ कॉलेज में पढ़े। यह भी एक वजह थी कि वह कई सालों तक शर्मिले थे। लोगों से बात करने में हिचकते थे। आयुष्मान कहते हैं, मैं तो कहना चाहूंगा कि सारे जगह से यह सिस्टम हटाना चाहिए कि लड़के-लड़की अलग पढ़ें।जब आगे चल कर साथ ही रहना है तो यह स्कूल के वक्त से ही विभाजन क्यों। इस वजह से भी कई बार लोगों में इनसेक्योरिटी, इन्फिरियोरिटी कॉम्प्लैक्स आ जाता है। मेरी जब गर्लफ्रेंड बनी तो शुरुआती दौर में वह सोचती थी कि मैं पागल हूं क्यों बात नहीं कर पाता। हिचकता क्यों हूं। वजह यही था कि लड़कों से ही घिरा रहता था। तो यह सब समझ नहीं आता था। को-एजुकेशन न होने से आप लड़कियों से जुड़ी परेशानियों को मज़ाक के रूप में भी लेने लगते हैं, चूंकि आपकी दोस्त नहीं कोई तो आप दर्द नहीं समझ पाते। उनकी साइकॉलोजी नहीं समझ पाते।हमारे स्कूल में भी बायोलॉजी के वह सारे चैप्टर मैम स्किप कर जाती थीं कि लेडी टीचर होकर उन्हें शर्म आती थी। पढ़ाने में तो यह संकोच जब टीचर को है तो पेरेंट्स तो और बच्चों से खुल कर बातें नहीं कर पाते। यही वजह है कि हम इस फिल्म में कह रहे हैं कि गुप्त रोग को गुप्त न रखें।

आयुष्मान कहते हैं कि 2000 के बाद से हालांकि पैरेंट्स सेक्स एजुकेशन को लेकर अलर्ट हुए हैं। पहले आयुष्मान के पैरेंट्स या परिवार वाले बात करने से कतराते थे। लेकिन अब वह सिचुएशन नहीं है। सोच बदली है और इसे और बढ़ावा मिलना ही चाहिए। बच्चों से संही वक्त पर बात करें। परिवार में मोलेशटेंशस नहीं होना चाहिए। इसलिए सही समय पर सेक्स एजुकेशन देना अहम है। फिल्म शुभ मंगल सावधान 1 सितंबर को रिलीज़ हो रही है।

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