देर रात 2 बजे हुई बैठक ने रखी भारत-चीन संबंधों की नई सुबह की नींव

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पिछले महीने का आखिरी सप्ताह। 27 अगस्त की शाम को चीन में भारत के राजदूत विजय गोखले को बताया जाता है कि चीनी यह जानने को उत्सुक हैं कि उनसे किस तरह जल्द से जल्द मुलाकात हो सकती है। गोखले ने संदेश दिया कि वह हॉन्ग कॉन्ग में हैं और अगर वह उस समय पेइचिंग जाने वाली पहली फ्लाइट पकड़ें तब भी आधी रात को ही पहुंच सकते हैं। उनसे जितना जल्दी संभव हो सके, पेइचिंग पहुंचने को कहा गया। यह डोकलाम पर गतिरोध को खत्म करने की कोशिश की दिशा में पहला स्पष्ट और गंभीर संकेत था। तड़के 2 बजे का वक्त था जब गोखले डोकलाम विवाद पर चर्चा के लिए चीन के विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के साथ मीटिंग के लिए बैठे। दोनों पक्षों को मसले के आपसी स्वीकार्य हल तक पहुंचने में 3 घंटे का वक्त लगा और इसी तीन घंटे ने इन दो बड़े पड़ोसियों के बीच संबंधों की एक नई शुरुआत की नींव रखी। अगले दिन दोनों सरकारों द्वारा किए गए ऐलान ने न सिर्फ दोनों देशों के बीच हाल के दशकों के सबसे बुरे और लंबे वक्त तक चले गतिरोध को खत्म किया, बल्कि द्विपक्षीय संबंधों की मजबूती और बेहतर आपसी समझ का इशारा भी था जहां संघर्ष को टालने और विकास पर फोकस करने की प्रतिबद्धता दिखी। सरकार से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि तनाव को खत्म करने में दोनों देशों के प्रमुखों- पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की सक्रिय भूमिका रही। दोनों नेता द्विपक्षीय संबंधों को एक दूसरे के लिए लाभकारी मौके और विकास को गति देने वाले वाहक में तब्दील करने की सहमति दी। मामले से जुड़े एक प्रमुख सरकारी अधिकारी ने बताया, ‘दोनों नेता इस बात पर सहमत थे कि दोनों ही पक्षों के पास साझेदारी के जरिए बहुत कुछ हासिल करने के मौके हैं, जिससे दोनों तेजी से आगे बढ़ेंगे। दोनों नेताओं का यह रुख रहा कि किसी एक का फायदा दूसरे की कीमत पर ही है, यह धारणा मूर्खतापूर्ण होगी। यही वह चीज थी जिससे दोनों पक्षों को गतिरोध खत्म करने और BRICS समिट से इतर सकारात्मक बातचीत का आधार रखी।’ इस गुरुवार को चीन के विदेश मंत्री वॉन्ग यी ने भी करीब-करीब यही बातें दोहराईं जब उन्होंने पेइचिंग में पत्रकारों से कहा कि शी और मोदी BRICS समिट से इतर ‘सफल’ द्विपक्षीय बातचीत में स्वस्थ और स्थायी विकास को सुनिश्चित करने के लिए सीमा पर तनातनी को टालने पर सहमत हुए। डोकलाम विवाद पर समझौते के बाद अपने पहले बयान में यीन ने कहा, ‘चीन-भारत संबंधों की गाड़ी बेपटरी नहीं हुई है। चीन और भारत का विकास दुनिया के भविष्य का प्रतिनिधित्व करता है…दोनों देशों के बीच सहयोग ही अनिवार्य विकल्प है और यही सही दिशा है जो दोनों ही देशों के लिए लाभदायक है।’ दोनों देशों के बीच 73 दिनों तक चला गतिरोध आखिरकार खत्म हुआ और प्रधानमंत्री के इस धारणा की जीत हुई कि दोनों ही पक्षों को तनाव भड़काने से कोई फायदा नहीं होने वाला। मोदी जहां इस बात पर अटल थे कि ताकत के जरिए सीमा पर यथास्थिति में बदलाव नहीं होने दिया जाएगा, वहीं वह यह भी नहीं चाहते थे कि विवाद दोनों देशों के बीच युद्ध का रूप ले। ऐसे में उन्होंने बेहद सधा हुआ रास्ता अख्तियार किया और विदेश मंत्रालय को बयानों में संयम बरतने का निर्देश दिया। बीजेपी को भी संयम बरतने का संदेश दिया। पार्टी के साथ-साथ संघ परिवार से जुड़े संगठनों के लोग भी डोकलाम गतिरोध पर चुप्पी साधे रहे। यहां तक कि चीन के सरकारी मीडिया की तरफ से भड़काऊ बयानों पर भी उस तरह की शाब्दिक प्रतिक्रिया नहीं देखने को मिली। मोदी ने चीन के साथ नॉर्मल बिजनस पर डोकलाम विवाद की छाया नहीं पड़ने दी। विवाद के दौरान ही करीब आधा दर्जन मंत्रियों ने पेइचिंग का दौरा किया और उन्हों स्पष्ट निर्देश दिया गया कि वे सहयोग के लिए अवसरों पर फोकस करें। एक शीर्ष सूत्र ने बताया कि इस दृढ़ता और संयम का फायदा भी मिला जब शी चिनफिंग की तरफ से श्यामन में मोदी के साथ मुलाकात में ‘बेहद सकारात्मक प्रतिक्रिया’ मिली।

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