प्राइवेट लिमिटेड में बदलेगी टाटा संस, मिस्त्री परिवार ने किया विरोध

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टाटा संस खुद को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में बदलने की तैयारी में है। टाटा समूह की कंपनियों की यह होल्डिंग फर्म है। टाटा संस फिलहाल पब्लिक लिमिटेड कंपनी है। कंपनी ने 21 सितंबर को होने जा रही सालाना आम बैठक (एजीएम) से पहले शेयरधारकों को इस संबंध में एक नोटिस भेजा है।

इसमें निदेशक बोर्ड ने विशेष प्रस्ताव के जरिए उक्त बदलाव के लिए कंपनी के संविधान यानी आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन में संशोधन करने की मंजूरी मांगी है। मिस्त्री परिवार ने इस योजना का विरोध किया है।

इस परिवार की टाटा संस में करीब 18 फीसदी हिस्सेदारी है।कंपनी की ओर से शेयरधारकों को भेजे गए नोटिस में नाम बदलकर टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड करने को लेकर अपने गठन से संबंधित नियम एवं शर्तें मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन में संशोधन की मांग की गई है। अभी इसका नाम टाटा संस लिमिटेड है।

इस बदलाव को लेकर टाटा संस के प्रवक्ता ने कहा कि फिर से प्राइवेट कंपनी में बदलने के प्रस्ताव पर बोर्ड ने विचार किया था। बोर्ड ने प्रस्तावित बदलाव को कंपनी के हित में माना है। टाटा संस ने प्रस्तावित बदलाव के लिए एक ठोस वजह बताई है। इसके मुताबिक टाटा संस का दर्जा “मान्य पब्लिक कंपनी” का है। इसे कंपनी कानून 2013 के तहत वैधानिक मान्यता प्राप्त नहीं है।

हालांकि कंपनी के इस बदलाव को लेकर टाटा संस के पूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री के परिवार ने आपत्ति जताई है। टाटा संस के बोर्ड को लिखे पत्र में साइरस इनवेस्टमेंट्स ने इसे मेजॉरिटी की ओर से माइनॉरिटी शेयरधारकों के दमन की कार्रवाई बताया है। इस विरोध पत्र में आरोप लगाया गया है कि एजीएम को बुलाने का असल मकसद दुर्भावनापूर्ण है। यह टाटा संस के हित में नहीं है।

टाटा संस के प्रवक्ता ने मिस्त्री परिवार की तरफ से लगाए गए आरोप पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।इस होल्डिंग कंपनी में विभिन्न टाटा ट्रस्टों की 66 फीसदी औ मिस्त्री परिवार की 18.4 प्रतिशत हिस्सेदारी है। मिस्त्री को पिछले साल टाटा संस के चेयरमैन पद से अचानक हटा दिया गया था। बर्खास्तगी के खिलाफ मिस्त्री परिवार की दो फर्में- साइरस इनवेस्टमेंट्स और स्टर्लिंग इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल यानी एनसीएलटी कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं।

यह होता है अंतर

किसी भी पब्लिक लिमिटेड कंपनी के शेयरधारकों की संख्या अधिक होती है। ऐसी कंपनियों को अपनी ज्यादा सूचनाएं सार्वजनिक करनी पड़ती हैं। इनमें नियामकों का दखल बढ़ जाता है। इसके उलट प्राइवेट लिमिटेड में इनसे काफी बचाव हो जाता है। ऐसी कंपनियों के शेयरधारकों की संख्या काफी कम होती है।

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