घट स्थापना के साथ शारदीय नवरात्र शुरू, पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा

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शक्ति, सामर्थ्य और सफलता के उत्सव नवरात्र गुरुवार से आरंभ हो गए। घर व मंदिरों में घट स्थापना के साथ शारदीय नवरात्र की शुरूआत हो गई जो नौ दिन तक चलेगी। अष्टमी पूजन 28 को किया जाएगा। मंदिरों में तड़के से ही भक्तों की लंबी कतारें लग गईं। जयपुर के आमेर में शिला देवी के मंदिर में बड़ी संख्या में भक्त मां के दर्शन करने पहुुंचे। देवी मंदिर मां के जयकारों से गुंजायमान हो गए। भक्तों की भीड़ को देखते हुए मंदिरों में व्यवस्थाएं की गई हैं। जानिए घट स्थापना के सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त के बारे में….
– शास्त्रों के अनुसार घट स्थापना का समय द्विस्वभाव लग्न युक्ति प्रातःकाल को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सूर्योदय से चार घंटे का समय प्रथा काल होता है।
22 सितंबर : राजयोग पूरे दिन
23 सितंबर : सर्वार्थसिद्धि योग दिनभर-रात 2:15 बजे तक
24 सितंबर : रवि योग सूर्योदय पूर्व सुबह 4:26 से रात तक
25 सितंबर : सर्वार्थसिद्धि योग संपूर्ण दिन-रात, रवि योग भी
26 सितंबर : रवियोग सुबह 7:03 बजे तक
27 सितंबर : रवियोग सुबह 6:05 से 9:58 बजे तक
29 सितंबर : रवियोग दोपहर 3:48 बजे से
30 सितंबर : सर्वार्थ सिद्धि योग, रवि योग और अबूझ मुहूर्त दिन और रात
मानसिक शांति के लिए करें सरस्वती पूजन
– शास्त्रों में शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा के तीन रूपों का मुख्य रूप से पूजन किया करने का उल्लेख है। महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली। बुद्धि विकास और मानसिक शांति के लिए मां सरस्वती, धन ऐश्वर्य के लिए महालक्ष्मी और युद्ध विजय प्राप्ति के लिए महाकाली के पूजन का विधान है। इन तीनों को त्रिगुणित करने से नवरात्रि नवदुर्गा हो जाती हैं।
नवरात्र में कई शुभ-मांगलिक कार्यों के योग
-यूं तो नवरात्र अपने आप में ही शुभ योग होते हैं। इन नौ दिनों में शुभ और मांगलिक कार्यों नई खरीदारी, वस्त्र, आभूषण, भूमि, भवन, वाहन, बर्तन, घर के डेकोरेशन के सामान खरीदने के लिए कई शुभ योग रहेंगे। नया व्यापार, सगाई और शादी जैसे अन्य मांगलिक कार्य भी इन दिनों में किए जा सकते हैं। खरीदारी और मांगलिक कार्यों का विशेष फल मिलेगा।
सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त : सुबह 6:18 से 7:49 बजे तक
विशेष प्रथा कला : सुबह 6:18 से 10:20 बजे तक
अभिजीत: दोपहर 12:00 से 12:44 बजे तक रहेगा
द्विस्वभावकन्या लग्न : सुबह 6:00 से 8:18 बजे तक
द्विस्वभावधनु लग्न : दोपहर 12:52 से 2:56 तक
चौघड़िया अनुसार मुहूर्त
शुभ : सुबह 6:18 से 7:49 बजे तक
चर: सुबह 10:50 से दोपहर 12:20 बजे तक रहेगा
लाभ: दोपहर 12:20 से 1:50 बजे तक
अमृत: दोपहर 1:51 से 3:20 बजे तक
पहले दिन होती है मां शैलपुत्री की पूजा
– मां शैलपुत्री नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। देवी वृषभ पर विराजित हैं। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल है और बाएं हाथ में कमल पुष्प। नवरात्र के प्रथम दिन देवी उपासना के अंतर्गत शैलपुत्री का पूजन करना चाहिए।
– शैलपुत्री का अर्थ है हिमालय की बेटी। आस्था और आत्मविश्वास अगर हिमालय की तरह अचल और स्थिर हो तो सफलता जरूर मिलती है। पुराणों में देवी की महिमा और नवरात्र के महत्व पर कई प्रसंग हैं, लेकिन नवरात्र शक्ति सामर्थ्य और सफलता का उत्सव है। भगवान राम ने नवरात्र के नौ दिनों में शक्ति प्राप्त की, दसवें दिन रावण का वध कर संसार को संकट से बाहर निकाला। ये नौ दिन शक्ति की साधना के हैं और सारी शक्ति हमारी आस्था और आत्मविश्वास पर टिकी है। हम नवरात्र के पहले दिन माता के प्रति आस्था और विश्वास जताकर अपने आत्मविश्वास को पुष्ट करते हैं। इसके बाद अगले आठ दिन अलग-अलग शक्तियों की साधना कर माता को प्रसन्न करते हैं। नौ दिनों के व्रत पालन से जीवन में विजय दशमी का उत्सव आता है। मार्कण्डेय पुराण में हिमालय हमारी शक्ति, दृढ़ता का आधार स्थिरता का प्रतीक है।
महत्व: हमारे जीवन में दृढ़ताएं स्थिरता आधार का महत्व सर्वप्रथम है। अत: नवरात्र के पहले दिन हमें अपने स्थायित्व शक्ति मान होने के लिए माता शैलपुत्री से प्रार्थना करनी चाहिए। शैलपुत्री की आराधना करने से जीवन में स्थिरता आती है। हिमालय की पुत्री होने से यह देवी प्रकृति स्वरूपा भी हैं। स्त्रियों के लिए उनकी पूजा करना श्रेष्ठ और मंगलकारी है।
ध्यान मंत्र….
वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्द्वकृतशेखराम्।
वृषारूढ़ा शूलधरां यशस्विनीम्।।

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