शारदीय नवरात्र पहला दिन : आज होगी मां शैलपुत्री की पूजा

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मैं मनोवांछित लाभ के लिए मस्तक पर अर्धचंद्र धारण करनेवाली, वृष पर आरूढ़ होनेवाली, शूलधारिणी, यशस्विनी शैलपुत्री दुर्गा की वंदना करता हूं.’

दस महाविद्याओं की महिमा-1

नवरात्र के इस अवसर पर श्रद्धा भक्तिपूर्वक दस महाविद्याओं की उपासना करने से यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्र्छितम् अर्थात् मनुष्य जिस कामना से जिस वस्तु की इच्छा करता है, उसकी वह मनोकामना अवश्य सिद्ध होती है. दस महाविद्याओं का संबंध पराम्परातः सती, शिवा और पार्वती से है. ये ही अन्यत्र नवदुर्गा, शक्ति, चामुण्डा, विष्णुप्रिया, सीता, राधा आदि नामों से पूजित और अर्चित होती हैं.

महाभागवत में कथा आती है कि दक्ष प्रजापति ने अपने यज्ञ में शिव को आमंत्रित नहीं किया. सती ने शिव से उस यज्ञ में जाने की अनुमति मांगी. शिव ने अनुचित बताकर उन्हें जाने से रोका, पर सती ने अपने निश्चय पर अटल रही.

उन्होंने कहा- ततोअहं तत्र यास्यामि तदाज्ञापय वा न वा। प्राप्स्यामि यज्ञभागं वा नाशयिष्यामि वा मखम्।। अर्थात् मैं प्रजापति के यज्ञ में अवश्य जाऊंगी और वहां या तो अपने प्राणेश्वर देवाधिदेव के लिए यज्ञभाग प्राप्त करूंगी या यज्ञ को ही नष्ट कर दूंगी. यह कहते हुए उमा के नेत्र लाल हो गये. वे शिव को उग्र दृष्टि से देखने लगीं. उनके अधर फड़कने लगे, वर्ण कृष्ण हो गया. क्रोधाग्नि से दग्ध शरीर महाभयानक एवं उग्र दिखने लगा. उस समय महामाया का विग्रह प्रचंड तेज से तमतमा रहा था.

शरीर वृद्धावस्था को सम्प्राप्त-सा, केशराशि बिखरी हुई, चार भुजाओं से सुशोभित वे महादेवी पराक्रम की वर्षा करती-सी प्रतीत हो रही थीं. कालाग्नि के समान महाभयानक रूप में देवी मुण्डमाला पहने हुई थीं और उनकी भयानक जिह्वा बाहर निकली हुई थी. शीश पर अर्धचंद्र सुशोभित था और उनका संपूर्ण व्यक्तित्व विकराल लग रहा था. वे बार-बार विकट हुंकार कर रही थीं.

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