नीतीश ने शुरू की सामाजिक समस्या पर नयी सियासत, आलोचना के साथ क्रेडिट लेने में जुटे विरोधी

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पटना : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को समकालीन राजनीति में सामाजिक मुद्दों पर सियासत करने वाले राजनेता के तौर पर जाना जाता है. नीतीश कुमार द्वारा पूर्व में लिए गये कई सामाजिक बदलाव के फैसलों ने यह साफ जता दिया है कि वह सियासत की घिसे पिटे ट्रेंड पर नहीं चलकर, सामाजिक बदलाव की सियासत में यकीन रखते हैं. कड़ी आलोचनाओं और असफलता जैसी बातों से इतर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू की. साथ ही इस फैसले के समर्थन में लोगों को जागरूक करने के लिए नुक्कड़ नाटकों की टोली को तैयार किया और सामाज के अंतिम वर्ग तक यह बात पहुंचाने में सफल रहे कि शराब एक बुराई है और इससे सामाज के साथ राज्य को काफी नुकसान हो रहा है. कुछ घटनाओं को छोड़ दें, तो बिहार एक ऐसा राज्य है, जहां शराबबंदी सफलतापूर्वक लागू है. करोड़ों की शराब को नष्ट कर दिया गया और धीरे-धीरे शराब तस्करों की कमर तोड़ने की कवायद जारी है. शराबबंदी के बाद नीतीश कुमार एक और सामाजिक बुराई को लेकर अभियान छेड़ने की ओर अग्रसर हैं, उन्होंने इस दिशा में कदम बढ़ा दिया है.

नीतीश कुमार बिहार की सियासत में उन सामाजिक मुद्दों को अपने अभियान में शामिल करते हैं, जो मुद्दा आम लोगों के जीवन को प्रभावित करता है. उन्होंने एक बार फिर ऐसे ही एक सामाजिक बुराई वाले मुद्दे को अभियान बनाने की ओर बढ़ रहे हैं, जो दहेज से जुड़ा हुआ मुद्दा है. जानकारी के मुताबिक जनता दल यूनाइटेड बिहार में दो अक्तूबर से दहेज मुक्त बिहार और बाल विवाह के खिलाफ बड़ा अभियान छेड़ने की तैयारी में है. सरकारी योजनाओं को आम लोगों के हितों से जोड़कर हमेशा उसे अभियान बना देने वाले नीतीश कुमार इस बार इस सामाजिक बुराई की अंत के लिए कमर कस चुके हैं. दहेज एक ऐसा मसला है, जिसका विरोध शायद ही कोई राजनीतिक दल करे. उन्होंने इससे पूर्व भी कई ऐसे सामाजिक मुद्दों को हवा दी है, जिसके बारे में जानकर बाद में विरोधी पस्त हो गये. महिला सशक्तिकरण की मंच से बात करने वाले राजनीतिक दलों और नेताओं को नीतीश कुमार ने सबक सिखाया और महिलाओं को पचास फीसदी आरक्षण दे डाला. बिहार ने सबसे पहले यह
कदम उठाकर देश के सामने एक नजीर पेश कर दी.

वहीं दूसरी ओर नीतीश कुमार द्वारा इस सामाजिक बुराई के मुद्दे को राजनीतिक मुद्दा बनाने पर कांग्रेस की ओर से हंसी उड़ाई जा रही है, प्रदेश कांग्रेस के कई नेताओं ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है कि इस मुद्दे को सबसे पहले कांग्रेस ने उठाया. जबकि राजद की ओर कहा जा रहा है कि जदयू इसे राजनीतिक लाभ के लिए सामने ला रही है. जानकार बताते हैं कि नीतीश कुमार ने जिस मुद्दे को सूबे के सामने लाने की कोशिश की है, और इसके खात्मे के लिए जो अभियान चलाने वाले हैं, उसका राजनीतिक लाभ मिलना तय है. इस बात से जदयू के अंदर काफी उत्साह है. जदयू शराबबंदी की सफलता से उत्साहित है और उसे साफ दिख रहा है कि यदि दहेज जैसे सामाजिक मुद्दे को सियासत के जरिये सार्थक परिणति तक पहुंचा दिया जाये, तो पार्टी सूबे के साथ-साथ पूरे देश के लिए एक नजीर पेश करेगी.

वैसे भी, नीतीश कुमार को करीब से जानने वाले राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि राजनीति में अपने अलग सिद्धांत, नैतिकता और स्टैंड के लिए नीतीश कुमार को जाना जाता है. वह सियासी मुद्दों को आम लोगों के हितों से जोड़कर देखते हैं और इसलिए उनका फैसला कई बार खुद के एक खास लॉजिक पर आधारित होता है. नोटबंदी, राष्ट्रपति चुनाव और अब जीएसटी का खुलकर समर्थन करना, यह प्रमाणित करता है कि वह राजनीति में दलीय स्वार्थ से ऊपर उठकर कई फैसले लेते हैं. फिलहाल, सामाजिक मुद्दे के राजनीतिक बनने की बात पर ही सही, बिहार में एक सार्थक समस्या पर चर्चा तो शुरू हो ही गयी है.

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