राजस्थान में कानून को ‘अंधा’ करने की तैयारी!

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    21वीं शताब्दी में पूरी दुनिया में एक शब्द जो सबसे ज्यादा सुनने में आता है वो है गुड गवर्नेंस यानी सुशासन. लोकतंत्र को सुशासन ने नई जीवंतता दी है. प्रश्न पूछने का अधिकार (RTI), सिटीजन चार्टर, नागरिक प्रथम (Citizen First) जैसी अवधारणाओं ने राज्य को पुलिसिया ढर्रे से निकाल कर लोक कल्याणकारी राज्य में तब्दील किया है.

    भारत जैसे बड़े लोकतंत्रों में भ्रष्टाचार पर नकेल और बढ़ती पारदर्शिता के पीछे नागरिक आंदोलनों के साथ ही सरकारी प्रयासों की भी महती भूमिका रही है. ऐसे प्रयास भारत को महानतम लोकतंत्रों में बनाए रखने में महत्वपूर्ण हैं. लेकिन अब भारत पहले (India First) का नारा देने वाली बीजेपी ही लगता है, देश से सुशासन को बाहर निकालने में जुट गई है.

    राजस्थान की बीजेपी सरकार एक ऐसा कानून बनाने जा रही है जिसे विशेषज्ञ भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाला और सुशासन का ताबूत करार दे रहे हैं. 23 अक्टूबर से शुरू होने जा रहे विधानसभा सत्र में आपराधिक प्रक्रिया संहिता (राजस्थान संशोधन), 2017 विधेयक लाया जा रहा है. इसके प्रावधानों पर नजर डालें तो अंधा कानून मुहावरा अपने आप ही याद आ जाएगा.

    सीआरपीसी में ‘काला’ संशोधन

    प्रस्तावित बिल में आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 156 (3) एवं 190 (1) में संशोधन किया गया है. ये बिल सितंबर में लाए गए उस अध्यादेश की जगह लेगा जिसमें किसी जज, मजिस्ट्रेट या लोकसेवक के उस काम के खिलाफ सरकारी मंजूरी के बिना जांच पर प्रतिबंध लगाया गया है, अगर वह उसके आधिकारिक कर्तव्यों को पूरा करने के दौरान किया गया है.

    यानी अब कोई भी मजिस्ट्रेट किसी लोकसेवक के खिलाफ तत्काल जांच के आदेश नहीं दे सकता. जांच के आदेश के लिए सक्षम प्राधिकारी को 180 दिन का समय दिया गया है. हालांकि 180 दिन में मंजूरी नहीं मिलती है तो इसे मंजूरी ही माना जाएगा.

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