Qarib Qarib Singlle movie review: करीब करीब सिंगल मजेदार

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जिंदगी के वे सुरीले तार, जो बीच में टूट जाते हैं, क्या फिर से जुड़ सकते हैं या फिर से बज सकते हैं? ‘करीब करीब सिंगल’ इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करती है। फिल्म का मिजाज थोड़ा-सा शायराना यानी काव्यात्मक है। इसलिए आम फिल्मों से कुछ हटकर भी है। एक महिला है जयश्री (पार्वती तिरुवोतू)। विधवा है। तीस के ऊपर की है। आॅनलाइन डेटिंग एप्स के जरिए एक ऐसे साथी की तलाश में है, जो उसके जीवन के बेजान तार को फिर से झंकृत कर दे। ऐसे में उसे एक रेस्तरां में मिलता है योगी (इरफान खान) जो थोड़ा झक्की किस्म का है। योगी उम्रदराज है लेकिन बातूनी भी है और लंबी लंबी हांकता है। शुरू-शुरू में जया को लगता है कि किस बेवड़े के चक्कर में आ गई। योगी कहता है कि उसकी तीन प्रेमिकाएं पहले भी रह चुकी हैं और वो उन पूर्व प्रेमिकाओं से उसको मिलवा भी सकता है। जया हिचकती है पर जिंदगी में कुछ एडवेंचर भी चाहती है इसलिए योगी के कहने पर वो निकल पड़ती है उन तीनों से मिलने। वे जाते हैं ऋषिकेश, अलवर और गंगटोक। कैसी हैं योगी की पुरानी प्रेमिकाएं और इन यात्राओं के दौरान क्या रिश्ता पनपता है दोनों के बीच, इसी के इर्दगिर्द फिल्म आगे बढ़ती है।

यानी फिल्म एक यात्रा-कथा है। कोई आसान-सा नुस्खा नहीं है इसमें जिंदगी के बारे में। बस यही कहा गया है कि जिंदगी में आए खालीपन भरे जा सकते हैं बशर्ते आप ऐसी कोशिश करें। लेकिन ऐसा नही कि यह फटाफट हो जाता है। कुछ झटके भी लग सकते हैं। योगी और जयश्री की यात्रा के दौरान कई पेंच उभरते हैं। यात्रा के दौरान घटित हुए कुछ वाकये तो बेहद मनोरंजक और हंसानेवाले हैं। लेकिन बीच-बीच में सफर क दौरान दोनों में तनाव भी हो जाता है। साथ ही कुछ बोरियत के लम्हें भी हैं।

इसी कारण फिल्म उस गाड़ी की तरह हो जाती है जिसका ब्रेक पूरी तरह तो नहीं लेकिन थोड़ा खराब हो गया है, यानी गाड़ी जहां रूकनी चाहिए वहां रुकती नहीं और जहां नहीं रुकनी चाहिए वहां रुक जाती है। खासकर अलवर वाला प्रसंग कुछ कुछ दिशाहीन हो गया है। कुछ सवाल दर्शक के मन में उभरते हैं कि अगर योगी के रिश्ते पुरानी प्रेमिकाओं से इतने अच्छे थे, तो फिर वे जारी क्यों नही रहे? कम-से-कम एक से।
बहरहाल, कुछ ढीलेपन के साथ ही सही फिल्म ये बताती है कि बीती जिंदगी के गम को छोड़कर आगे बढ़ा जा सकता है। हमेशा की तरह इरफान के अभिनय में सहजता है। अपने कई छोटे-छोटे संवादों से करिश्मा पैदा कर देते हैं। पार्वती भी उस औरत के किरदार में दिल को छूती हैं, जो अपने वतर्मान से असंतुष्ट है लेकिन भविष्य से भयभीत भी। वह बीते कल से बाहर आना चाहती है पर कई तरह की आशंकाएं भी हैं। उसने क्या किया अपनी आशंकाओं के साथ? जवाब तो फिल्म देखने पर ही मिलेगा

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