रॉफेल पर रक्षा मंत्री ने कहा-डील पूरी तरह पारदर्शी, किसी प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं

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रक्षामंत्री ने कांग्रेस के आरोपों को शर्मनाक करार देते हुए कहा कि राजनीति से प्रेरित आरोप लगाकर वह देश का नुकसान कर रही है।

नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। राफेल लड़ाकू विमान सौदे में गड़बड़ी के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए सरकार ने कांग्रेस पर जोरदार पलटवार किया है। रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को कहा कि निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही राफेल सौदा किया गया है।

उन्होंने कांग्रेस को ही कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि संप्रग सरकार ने देश की रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए 10 साल में कुछ नहीं किया। इसीलिए वायुसेना की आपात जरूरतों को देखते हुए राजग सरकार ने पूरी पारदर्शिता के साथ राफेल सौदे को मंजूरी दी है।

रक्षा मंत्री ने कांग्रेस के आरोपों को शर्मनाक करार देते हुए कहा कि वह देश का नुकसान कर रही है। रक्षा मंत्री ने शुक्रवार को राफेल सौदे को लेकर जानकारी देते हुए कहा कि वायु सेना की जरूरतों को देखते हुए पूरी तरह से हथियारों से लैस 36 राफेल लड़ाकू विमानों की आपात खरीद करनी पड़ी।
कांग्रेस का आरोप
राफेल की खरीद में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
निर्मला का जवाब
कैबिनेट की सुरक्षा मामलों की समिति की मंजूरी के बाद सारी प्रक्रिया पूरी कर सौदे को अंजाम दिया गया। राफेल डील पर हस्ताक्षर से पहले भी कीमत से लेकर तमाम पहलुओं पर पांच दौर की बैठकें हुई और एक भी प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं हुआ।
कांग्रेस का आरोप
संप्रग शासन में तय कीमत के मुकाबले विमान ज्यादा दाम पर खरीदे गए।
निर्मला का जवाब
मौजूदा डील संप्रग के मुकाबले कहीं बेहतर है। कांग्रेस का कहना है कि हमने 8.7 अरब डॉलर यानी करीब 59 हजार करोड़ रुपये में 36 विमान खरीदे हैं, जबकि संप्रग ने 10.2 अरब डॉलर में ही 126 विमानों की खरीद तय की थी। हकीकत यह है कि संप्रग के समय यह केवल विमान की कीमत थी। राजग ने विमान के साथ इसके तमाम हथियार और मिसाइल से लेकर इसकी मेंटीनेंस का समग्र सौदा किया है।
कांग्रेस का आरोप
सौदे में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को शामिल नहीं किया गया।
निर्मला का जवाब
126 विमानों की खरीद पर तो टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की बात समझ में आती है, मगर 36 विमानों की आपात खरीद के लिए तकनीकी ट्रांसफर का औचित्य नहीं बनता।
कांग्रेस का आरोप
सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स की जगह रिलायंस डिफेंस को फायदा पहुंचाया गया।
निर्मला का जवाब
प्रधानमंत्री के डेलीगेशन में अधिकारियों के साथ व्यापार जगत के तमाम लोग होते हैं। इसमें कौन है यह मायने नहीं रखता। अभी ऑफसेट कांट्रैक्ट पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। मगर जब दो निजी कंपनी औद्योगिक नीति एवं संव‌र्द्धन विभाग (डीआइपीपी) के नियम के तहत संयुक्त उद्यम स्थापित करते हैं, तो इसमें रक्षा मंत्रालय की मंजूरी की जरूरत नहीं होती। इसे सरकार के साथ जोड़ना राजनीति से प्रेरित है।
संप्रग के समय निविदा के जरिये हुआ था राफेल का चयन
रक्षा मंत्री ने राफेल सौदे से जुड़े तथ्यों को रखा। उन्होंने कहा कि संप्रग सरकार के समय 12 दिसंबर, 2012 को निविदा में एल-1 में राफेल को चुना गया। कीमत को लेकर बातचीत शुरू हुई, मगर अंतिम समझौता नहीं हुआ। 2014 में राजग के सत्ता में आने के बाद रक्षा मंत्रालय ने प्रधानमंत्री को इस डील के तथ्यों से रूबरू कराया।

अप्रैल 2015 में पीएम मोदी की फ्रांस यात्रा के दौरान फ्रांस सरकार से बातचीत हुई। इसके बाद सीसीएस ने राफेल खरीद को मंजूरी दी और फिर भारत और फ्रांस के रक्षा मंत्रियों की मौजूदगी में भारतीय वायुसेना के उप प्रमुख और डीजीए फ्रांस ने सितंबर 2016 में समझौते पर हस्ताक्षर किए। साफ है कि खरीद को दो देशों के बीच समझौते के जरिये अंजाम दिया गया है।

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