अयोध्या 25 साल: सुप्रीम कोर्ट का निर्णय स्वीकार्य, राजनीति न हो

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‘हिंदू कहीं के हैं न मुसलमां कहीं के हैं, दोनों यहीं रहेंगे दोनों यहीं के हैं…’ वैसे तो यह शेर मरहूम जफर बनारसी साहब का है लेकिन सोमवार को यह शेर बतौर संदेश आप के अपने अखबार ‘हिन्दुस्तान’ के दफ्तर में आयोजित संवाद में मुखर हुआ। श्रीराम मंदिर-बाबारी मस्जिद मसले पर केंद्रित इस संवाद में सभी धर्मों के धर्माचायों ने शिरकत की और एक स्वर में यह संदेश दिया कि राम मंदिर के मसले पर अदालत का जो भी फैसला हो उसपर अमन के साथ अमल में लाया जाए। देश की सबसे बड़ी अदालत इस मसले पर जो भी फैसला दे उसे दोनों कौम के लोगों को मानना चाहिए।
इस संवाद की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और जैन समाज की धार्मिक मान्यताओं में आस्था रखने वालों ने अपनी बातों को रखने के लिए शेर-ओ-शायरी का भरपूर सहारा लिया। संवाद में जिस राय पर सभी सहमत थे वह यह कि मंदिर-मस्जिद के मसले से सियासी पार्टियों को दूर कर दिया जाए। अदालत को ऐसी पहल करनी चाहिए कि यदि कोई राजनीतिक दल इस मसल पर बोलेगा तो उसके खिलाफ कनून की धाराओं के तहत कड़ा कदम उठाया जाएगा। उसपर जुर्माना लगाया जाएगा या उसे प्रतिबंधित किया जाएगा।
अन्नपूर्णा मंदिर के श्रीमहंत रामेश्वर पुरी महाराज ने आपस में लड़ने की बजाय इंसानियत के रास्ते पर चलने की हिमायत की। उन्होंने कहा धर्म कोई भी वह समाज को आपस में जोड़ने का काम करता है। जो समाज को किसी भी बहाने से तोड़ने की पहल करता है वह धर्म ही नहीं है। सबसे युवा धर्माचार्य अर्दली बाजार के इमाम-ए-जुमा यैयद हैदर अब्बास ने सर सैयद अहमद खान के हवाले से कहा कि हिंदू और मुसलमान इस देश की दो आंखें हैं तो शिया जामा मस्जिद के प्रवक्ता मौलाना फरमान हैदर ने यह संदेश दिया कि जातिभेद को सामने रख कर जो लोग हमें लड़ाने की कोशिश करते हैं उन्हें मुंहतोड़ जवाब देने का वक्त आ गया है।
इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए इमाम-ए-जुमा जहीन हैदर ‘दिलकश गाजीपुरी’ ने सियासी पार्टियों को मंदिर-मस्जिद से दूर रखने के सुझाव की पुरजोर हिमायत की। समाजसेवी अतीक अंसारी ने भी एक शेर के जरिए यह पैगाम दिया कि हमें मंदिर-मस्जिद के मसले पर लड़ने की जगह देश के दूसरे तमाम संजीदा मसलों पर गौर फरमाना चाहिए। हिन्दुस्तान की यह पहल एक समाचार पत्र की मौलिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
बजरिए शेर-ओ-शायरी हर शख्स ने इसी बात पर जोर दिया कि सियासत करने वाले अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए ऐसे हालात पैदा कर देते हैं कि आम आदमी अपनी रोजी-रोटी के मसलों से हट जाता है। तो हम ऐसे हालात क्यों नहीं बना सकते कि सियासत करने वालों को हमारे अमन के चूल्हों पर बंटवारे की रोटियां सेंकने का मौका ही न मिले। जब मसला अदालत के पास है तो अदालत ही इस बारे में बोले। किसी भी सियासी इकाई को इस मसले पर बोलने का हक ही न दिया जाए। जो ऐसा करने की हिमाकत करे उसपर कानूनी कार्रवाई की जाए।
मौलाना हसीन अहमद हबीबी ने बनारस की गंगा जमुनी तहजीब का हवाला देते हुए कहा कि जिन बातों की चर्चा आवाम में नहीं होती हैं सियासी ताकतें इलेक्शन के समय उन्हीं मसलों की पुड़िया खोल कर हमें आपस में उलझा देती हैं। संवाद का समापन भी एक शानदार शेर के साथ ही हुआ। यह शेर था ‘बैठे हैं ऐसे लोग यहां इस कतार में,ऐसे तो फूल भी नहीं खिलते बहार में।’संवाद में मौलाना अब्दुर्र रहीम रियाजी, सुरेंद्र जैन, सेंट जॉन चर्च के फादर एवं डीन ऑफ बनारस सैम जोसुवा, गुरुद्वारा नीचीबाग के मुख्य ग्रंथी अमरप्रीत सिंह, विहिप के प्रवक्ता सोहनलाल ने भी विचार व्यक्त किए।
चर्चा हुई लाल बहादुर शास्त्री की भी
संवाद के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जिक्र भी आया। प्रधानमंत्री बनने के बाद जब वह बनारस आए तो खुली जीप में मदनपुरा इलाके से गुजरे। जब वह मदनपुरा के मदरसे के पास पहुंचे तो उन्हें नजीर की याद आई। उन्होंने वहीं जीप रुकवाई और पूछा क्या नजीर बनारसी साहब का घर पीछे छूट गया। आज के दौर का कोई सियासत दां शायद ही ऐसे सवाल करे।
जब महंत और मुफ्ती एक साथ घूमे
संकट मोचन मंदिर और कैंट रेलवे स्टेशन पर एक ही दिन कुछ मिनटों के अंतर पर हुए बम विस्फोट के बाद शहर का माहौल बिगड़ने का खतरा उत्पन्न हो गया था। तब संकट मोचन मंदिर के तत्कालीन महंत डा.वीरभद्र मिश्र और मुफ्ती-ए-बनारस मौलाना अब्दुल बातिन नोमानी एक साथ शहर की गलियों में घूम-घूम कर शांति और सौहार्द बनाए रखने की गुजारिश की थी।
इस समस्या की जड़ में हमारी आदत है। हम वर्तमान में जीना भूल गए हैं। हम भूतकाल और भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं। जबकि भूत हमेशा परेशान करता है। उसके पास किसी समस्या का समाधान नहीं है। भविष्य चिंताएं बढ़ाता है। अत: जब तक हम वर्तमान में जीने के आदती नहीं होंगे ऐसी समस्याएं बनी रहेंगी। संत कबीर ने कहा है कि ‘कबिरा जब हम पैदा हुए जग हसा हम रोए, करनी ऐसी कर चलो हम हसें जग रोए।’हमें काम ऐसा करना चाहिए जिससे सभी को सुख मिले। कोई दुखी न हो।
रामेश्वर पुरी, श्रीमहंत, अन्नपूर्णा मंदिर
मंदिर और मस्जिद तो टूटते-बनते रहेंगे। मंदिर और मस्जिद ईंट, गारे और मिट्टी से बनी दीवारें हैं। इन्हें दिलों में दरार नहीं पड़नी चाहिए। स्वामी विवेकानंद ने कहा था मुझे एक फुटबाल दे दो मैं पूरी दुनिया को एक कर दूंगा। हिंदू, मुसलमान को पास देगा, मुसलमान सिख को तथा सिख ईसाई को पास देगा और अंतत: हम गोल करने में कामयाब होंगे। मैं परवीन शाकिर के दो मिसरों पढ़ना चाहता हूं। अर्ज किया है-‘बज्म-ए-अंजुमन में कबा खाक की पहनी मैंने, मेरी सारी फजीलत इसी पोशाक में है’
-फरमान हैदर, प्रवक्ता, शिया जामा मस्जिद
अयोध्या का मसला उठना ही नहीं चाहिए। मैं तो कहता हूं इस बात की क्या गारंटी है कि अयोध्या का मसला हल होने के बाद बाकी के विवादों को तूल नहीं दिया जाएगा। ऐसे में बेहतर होगा कि इन मामलात से सियासी पार्टियों को दूर ही रखा जाए। एक सही कोशिश पूरे सूरत-ए-हाल को बदल देगी। मैं अपने एक शेर के जरिए यह इस देश की रवायत इस देश के लोगों को याद दिलाना चाहता हूं। ‘अजान सुनते हैं हम शंख की सदाओं में, ये प्यार मिलता है बस हिंद की फजाओं में।’
-जहीन हैदर ‘दिलकश गाजीपुरी’, इमाम-ए-जुमा बादशाहबाग
इस मसले को लेकर अब तक जो भी बहसें हुईं हैं उनका कोई नतीजा नजर नहीं आ रहा है। खुलासा-ए-कलाम यह है कि आदमी चाहे जिस जमात से जुड़ा हो वह अपनी ही जमात बातें आगे बढ़ाना चाहता है।मैं हिन्दुस्तान अखबार की इस पहल का तहे दिल से इस्तेकबाल करता हूं। यहां हो रही गुफ्तगू बेशक देशभर में जाएगी। मंदिर-मस्जिद के संजीदा मसले पर आवाम में तबादला-ए-ख्याल हो। यह जरूरी है क्योंकि ‘चलते हैं मिल के धारे गंग-ओ-जमन के,लड़-लड़ के हो रहे हैं मोहताज हम कफन के।’
-हसीन अहमद हबीबी, इमाम-ए-जुमा, बजरडीहा
यह मसला बेहद पेंचीदा है। ऐसे मसलों के हल होने में बेशक समय लगता है। हम किसी भी जात-बिरादरी के होने से पहले भारतीय हैं। इस लिहाज से न्यायालय की व्यवस्था में हमें विश्वास रखना चाहिए। अदालत की व्यवस्था को लेकर मन में कोई मैल न हो यही एक सच्चे भारतीय का धर्म है। विवाद चाहे कितना भी गहरा हो लेकिन अदालत जो हल दे हमें उसे अपना लेना चाहिए। नहीं तो तनाव बना ही रहेगा।
-मौलाना अब्दुल रहीम रियाजी, शिक्षक
हमारा धर्म हमें सिखाता है कि हमें आपस में भेदभाव नहीं रखना चाहिए। हमारे द्वारा किया गया ऐसा कोई भी कार्य जिससे दूसरे किसी व्यक्ति को कष्ठ हो, वह धर्म विरुद्ध माना गया है। न्याय करने की कुर्सी पर जो व्यक्ति बैठता है हम उसे भी ईश्वर का प्रतिनिधि मानते हैं। ऐसे में श्रीराम मंदिर और बाबरी मस्जिद के मामले पर अदालत जो फैसला दे, उस फैसले को सभी को स्वीकार करना चाहिए।
-सुरेंद्र जैन, श्याद-वाद महाविद्यालय, शिवाला
एक भारतीय होने के नाते परमेश्वर में मेरी उतनी ही आस्था है जितनी किसी हिंदू, मुस्लिम, सिख या किसी अन्य धर्मावलंबी की है। मैंने बचपन से अब तक सभी जमात के लोगों से बहुत प्यार पाया है। मैं चाहता हूं कि मंदिर-मस्जिद के मसले पर यह यह प्यार किसी कीमत पर बंटने न पाए। भाई-भाई एक दूसरे को नफरत की नजर से देखने की बजाय मोहब्बत की नजर से देखें। यही समय की मांग है।
-फादर सैम ओसुआ, डीन ऑफ बनारस
मैं कहता हूं हर वो चीज जो लड़ाई का कारण बने उसे खत्म कर देना चाहिए। हमारे नबी ने भी ऐसी मिसालें पेश की हैं। एक मर्तबा एक मस्जिद को लेकर दो तबके के लोग आपस में उलझ गए। नबी ने उस मस्जिद को ही गिराने का फरमान जारी कर दिया था। ऐसे में हमे कोर्ट के आदेश का पालन करना चाहिए और वह जो भी फैसला सुनाए उसपर अमल के लिए सभी को काम करना चाहिए।
-सैयद हैदर अब्बास, इमाम-ए-जुमा, अर्दली बाजार
मैं यह नहीं मानता कि मंदिर, मस्जिद सिर्फ ईंट-गारे से खड़ी की गई दीवार है। मेरी नजर में यह आस्था का प्रश्न है। मंदिर हो या मस्जिद। उसमें आस्था रखने वाले उसकी एक-एक ईंट को आदर की दृष्टि से देखते हैं। हमारा स्वर्ण मंदिर सिर्फ एक दीवार नहीं है। एक बार गुरुनानक देव जी से लोगों ने पूछा कि कौन सा धर्म बड़ा है। उनका उत्तर था जिसका अमल बड़ा है वही धर्म बड़ा है।
-अमरप्रीत सिंह, मुख्य ग्रंथी, गुरुद्वारा नीचीबाग
हम आपस में ही बंटे हुए हैं। चाहे हिंदू हों या मुसलमान। इन दोनों ही धर्मों में आज की तारीख में कोई ऐसा धर्माचार्य नहीं जिसकी बात पूरी जमात के लोग एक बार में मान लें। हम कहीं न कहीं अपनी निजी जरूरतों में फंस कर रह गए हैं। सामाजिक नियंत्रण के लिए ही पुलिस और कोर्ट जैसी व्यवस्थाएं बनाई गई हैं। हमें इन व्यवस्थाओं में विश्वास रखना चाहिए और इस गंभीर मसले पर एक राय बनानी चाहिए।

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