उच्च न्यायालय ने ‘रेरा’ को ठहराया वैध

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रिपोर्टर/प्रेट्र, मुंबई
मुंबई उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए रियल इस्टेट (रेग्युलेशन ऐंड डिवेलपमेंट) ऐक्ट या ‘रेरा’ को वैध बताया है कि इससे देश में रियल इस्टेट का विकास होगा। न्यायाधीश नरेश पाटील और न्यायाधीश राजेश केतकर ने यह फैसला उन संयुक्त याचिकाओं की सुनवाई पर दिया, जो रियल इस्टेट डिवेलपर और व्यक्तिगत फ्लैट मालिकों ने दायर की थीं। याचिकाओं में कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।गौरतलब है कि देशभर के तमाम उच्च न्यायालयों में रेरा को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं दायर की गई थीं। सितंबर में उच्चतम न्यायालय ने अन्य न्यायालयों में इन याचिकाओं की सुनवाई पर रोक लगाते हुए कहा था कि केवल मुंबई उच्च न्यायालय ही रेरा मामलों की सुनवाई करेगा। उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि अन्य न्यायालयों को रेरा से संबंधित मामलों की सुनवाई करने से पहले मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले को देखना चाहिए।न्यायाधीश पाटील की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने फैसला देते हुए डिवेलपरों को भारी राहत भी दी है। पीठ ने कहा कि राज्य स्तर पर गठित रेरा अथॉरिटी और अपीलेट ट्रिब्यूनल परियोजनाओं के क्रियान्वयन में हुए विलंब को अलग-अलग देखेंगे। ऐसी परियोजनाओं या डिवेलपर के पंजीकरण को निरस्त नहीं किया जा सकेगा, जहां किसी तरह का विलंब अपवाद या उन परिस्थितियों के कारण हुआ हो, जहां उसका बस नहीं चलता हो।उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि जरूरत पड़ी, तो ऐसे मामलों में रेरा अथॉरिटी सरकार से सलाह लेगी। पीठ ने कहा कि यह कानून देश में फ्लैट खरीदने वालों के हितों के संरक्षण के लिए बहुत जरूरी है। रेरा कानून केवल बिल्डर और डिवेलपरों का नियमन करने के लिए ही नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य रियल इस्टेट उद्योग का विकास करना है।न्यायाधीश पाटील ने कहा कि इस क्षेत्र में अनेक समस्याएं हैं। यह वही समय है, जब महात्मा गांधी के सपनों को पूरा किया जा सकता है। यह कानून अन्य बातों के साथ यह भी कहता है कि सभी डिवेलपर और बिल्डर अपने आपको एक राज्य स्तरीय नियमन एजेंसी के साथ पंजीकृत कराएं।गौरतलब है कि अनेक बिल्डरों और डिवेलपरों ने राज्य स्तर पर गठित रेरा अथॉरिटी और अपीलेट ट्रिब्यूनल के गठन का विरोध किया है। उच्च न्यायालय ने अथॉरिटी के गठन का विरोध नहीं किया है, लेकिन यह जरूर कहा है कि ट्रिब्यूनल का प्रमुख कोई न्यायिक अधिकारी होना चाहिए, न कि नौकरशाह। साथ ही ट्रिब्यूनल के अधिकांश अधिकारी या सदस्य न्यायपालिका से ही होने चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों ने इस कानून का जोरदार बचाव किया है और कहा है कि इस कानून की व्यवस्थाएं सही हैं।

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