नेपाल में वाम गठबंधन की जीत, भारत के लिए क्या हैं मायने?

0
252

काठमांडू
नेपाल की मुख्य कम्युनिस्ट पार्टी और पूर्व माओवादी विद्रोहियों का गठबंधन भारी जीत की ओर बढ़ रहा है और सत्तारुढ़ नेपाली कांग्रेस को बेदखल कर नेपाल में इस गठबंधन की अगली सरकार बनने की संभावना है। वाम गठबंधन ने अधिकांश संसदीय सीटो पर जीत दर्ज कर ली है और इनके नेता के.पी. ओली देश के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं। इतनी बड़ी जीत से नेपाल को स्थिर सरकार मिलने की संभावना है लेकिन नेपाल में इस नए सत्ता समीकरण के भारत के लिए क्या मायने हैं, आइए समझते हैं…

भारत ने नेपाल को हर संभव मदद की है पर नेपाल का कमुनिस्ट नेत्रत्व चीन समर्थक है और यही भारत के लिये बड़ी चिंता का सबब है

पूर्व प्रधानमंत्री के. पी. ओली के नेतृत्व वाले सीपीएन-यूएमएल और पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड के नेतृत्व वाले सीपीएन-माओवादी ने ऐतिहासिक चुनाव के लिए गठबंधन किया था, जिसे नेपाल में दो दशक के संघर्ष और राजनीतिक अस्थिरता के बाद एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। नेपाल में वर्ष 2006 में गृह युद्ध समाप्त होने के बाद से चुनाव परिणाम से नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना में मदद मिलेगी, जिसके लिए वह पिछले 11 सालों से संघर्षरत है। साल 2006 से नेपाल 10 प्रधानमंत्री देख चुका है। शेर बहादुर देबा के नेतृत्व वाली नेपाली कांग्रेस को भारत समर्थक माना जाता है। लेकिन पिछली बार जब 9 महीने के लिए कोली ने प्रधानमंत्री पद संभाला था तो उन्होंने ऐसे कदम उठाए जिससे नेपाल और भारत के रिश्तों में तनाव पैदा हो गया था। इतना ही नहीं नेपाल और चीन की करीबी भी बढ़ गई थी।

नेपाल में बढ़ेगा चीन का प्रभाव?
नेपाल को हमेशा से ही भारत का दोस्त रहा है और यह चीन को नागवार गुजरता है। कई बार यह भी आरोप लगे हैं कि भारत नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है। लेकिन वाम गठबंधन की सरकार से नेपाल में चीन का प्रभाव बढ़ सकता है। दरसअल, ऐसा माना जाता है कि पूर्व माओवादी विद्रोहियों और मुख्य कम्युनिस्ट पार्टी को एक साथ लाने के पीछे चीन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है ताकि यह गठबंधन जीते और उसको फायदा पहुंचे।

भारत की नीति को झटका?
ओली की सत्ता में वापसी से भारत की नीति को भी झटका लग सकता है। कोली ने जब 2015 में प्रधानमंत्री पद संभाला था, उस समय नए संविधान के खिलाफ मधेसियों का विरोध चरम पर था जिसके परिणाणस्वरूप ही भारत-नेपाल के बीच व्यापार रास्ता बंद रहा। इसकी वजह से नेपाल में रोजमर्रा की चीजों के लिए भी लोगों को मुसीबतों से जूझना पड़ा। यह विरोध तकरीबन 6 महीने तक रहा। मधेसियों को मुख्यधारा में लाने के इरादे से तराई इलाके में छह महीने तक रहे बंद का भारत ने अनाधिकारिक तौर पर समर्थन किया था। इस बंद का और मधेसियों का ओली के नेतृत्व वाले संगठन ने जमकर विरोध किया था। इस दौरान के.पी. ओली ने यह मुद्दा जमकर उठाया था कि भारत उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है।

पिछले कार्यकाल में भारत पर निर्भरता घटाई
के.पी. ओली जब अक्टूबर 2015 में नेपाल के प्रधानमंत्री बने थे तो उन्होंने भारतीय ईंधन, दवाइयों और अन्य सामानों पर निर्भरता की स्थिति से निपटने के लिए चीन के साथ एक समझौता किया था। इसके बाद एक्सपर्ट्स ने भी माना कि के.पी. ओली अब चीन की तरफ झुक रहे हैं। हालांकि, पिछले साल कोली के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पास किया गया, जिसके बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here