गुजरात चुनाव: लास्ट फेज में पटेल वोटों पर नजर, हार्दिक इफेक्ट की भी परीक्षा

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अहमदाबाद
आज गुजरात में दूसरे और अंतिम चरण में 93 सीटों के लिए वोटिंग चल रही है। सेंट्रल और नॉर्थ गुजरात में करीब 2.22 करोड़ मतदाता हैं, जिनके सामने 851 उम्मीदवार मैदान में हैं। लास्ट फेज में नॉर्थ गुजरात में 61 सीटों और सेंट्रल गुजरात की 32 सीटों के लिए वोटिंग चल रही है। इस फेज में बीजेपी और कांग्रेस, दोनों ही पार्टियां के बीच पटेल वोटों पर कब्जा जमाने की होड़ है। इस फेज में हार्दिक पटेल इफेक्ट की भी परीक्षा है कि वह पाटीदारों को बीजेपी को वोट करने से रोक पाने में सक्षम होते हैं या नहीं।

सबका गणित, सबकी सोच…. सबकी प्लॅनिंग धरी की धरी रह जायेगी… और गुजरात मे पूर्ण बहुमत से भाजपा फिर से सरकार बनायेगी… और छॉंग्रेस को एक बार फिर धूल चटाएगी…..
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93 सीटों में 19 पर पाटीदार वोट सबसे अहम
इस बार गुजरात चुनावों में हार्दिक पटेल सबसे अधिक चर्चा का विषय रहे हैं। पाटीदार आरक्षण के लिए आंदोलन कर हार्दिक ने पाटीदारों को बीजेपी सरकार के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की है। लास्ट फेज की 93 सीटों में से 19 सीटें ऐसी हैं जहां पाटीदारों की जनसंख्या 20 फीसदी या उससे अधिक है। बीजेपी और कांग्रेस, दोनों को ही इसका महत्व पता है। बीजेपी ने जहां 23 पाटीदार उम्मीदवार खड़े किए हैं वहीं कांग्रेस ने 22 पाटीदारों को टिकट दिया है। बीजेपी ने पिछली बार इन 19 सीटों में से 13 पर कब्जा जमाया था। इस बार हार्दिक ने लगातार अभियान चला और मेगा रैलियां कर बीजेपी के लिए लड़ाई को मुश्किल बना दिया है।

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क्या अन्य पिछड़ी जातियां कांग्रेस की तरफ जाएंगी?
पाटीदारों के अलावा अन्य पिछड़ी जातियों का गणित उसमें भी ठाकोर वोट काफी अहम है। पिछले वर्षों में अन्य ओबीसी जातियों को एक मोर्चे के तहत लाने की कोशिश में जुटे अल्पेश ठाकोर कांग्रेस का हिस्सा बन चुके हैं। कांग्रेस ने 16 ठाकोर उम्मीदवारों को टिकट दिए हैं। अंतिम चरण में खुद अल्पेश ठाकोर भी कांग्रेस के टिकट पर मैदान में हैं। ठाकोरों को अपने पाले में करने की पहली लड़ाई में सीट बंटवारे के हिसाब से कांग्रेस बीजेपी से आगे नजर आ रही है। बीजेपी ने केवल 8 ठाकोर उम्मीदवारों को टिकट दिया है। अब यह देखना रोचक होगा कि अन्य पिछड़ी जातियों की गोलबंदी क्या कांग्रेस के पक्ष में जाएगी या नहीं।

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क्या दलित वोटरों को प्रभावित कर पाएंगे जिग्नेश मेवाणी?
गुजरात में पाटीदारों के अलावा दलित भी आंदोलनरत रहे हैं। उना में दलितों के खिलाफ हुई हिंसा के बाद से ही जिग्नेश मेवाणी और उनके साथी इस आंदोलन को तेज किए हुए हैं। लास्ट फेज में जिग्नेश निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उतरे हैं, जबकि कांग्रेस ने उन्हें समर्थन देने का ऐलान किया है। चर्चा इस बात की है कि क्या जिग्नेश दलित वोटरों को कांग्रेस की दिशा में मोड़ पाएंगे या नहीं।

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क्या शहरी सीटों पर बीजेपी के गढ़ में लगेगी सेंध?
पिछले विधानसभा चुनावों में गुजरात की शहरी सीटों पर बीजेपी हमेशा ताकतवर रही है। इस बार यह देखना रोचक है कि क्या कांग्रेस बीजेपी के इस गढ़ में सेंध लगाने में कामयाब हो पाएगी या नहीं। अंतिम चरण की 93 सीटों में से अहमदाबाद, वडोदरा और गांधीनगर नगरपालिका क्षेत्र में 23 सीटें आती हैं। फिलहाल इनमें से 21 सीटों पर बीजेपी का कब्जा है। 1990 के बाद से बीजेपी ने इनमें से अधिकतर सीटों पर 4 से 5 बार जीत दर्ज की है।

ग्रामीण और आदिवासी सीटें बचा पाएगी कांग्रेस?
इस बार गुजरात में सत्ता विरोधी लहर की चर्चा है। ग्रामीण क्षेत्र की सीटों पर कांग्रेस की मजबूत स्थिति का आंकलन किया जा रहा है। फिलहाल ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस के खाते में 28 सीटें हैं जबकि बीजेपी के पास 20 सीटें। इनमें आदिवासियों के लिए आरक्षित 13 सीटें भी हैं, जिनमें 13 पर कांग्रेस का कब्जा है। इस बार के चुनावों में कांग्रेस अगर गुजरात की सत्ता में वापसी का ख्वाब देख रही है तो उसे अपने इस गढ़ को बचाना होगा। कांग्रेस यहां मुश्किल में इसलिए भी है क्योंकि पिछले दो वर्षों में वीएचपी और आरएसएस के जरिए बीजेपी ने पूर्वी गुजरात में आदिवासियों के बीच पैठ बनाई है। वीएचपी की ओर से चलाए जाने वाले एकल विद्यालयों की संख्या में अच्छी वृद्धि हुई है।

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कहीं बागी न बिगाड़ दें कांग्रेस का खेल?
दूसरे चरण के मतदान में 32 सीटों वाला उत्तर गुजरात महत्वपूर्ण है। 2012 के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 32 में से 17 सीटें जीती थीं, लेकिन इस बार पार्टी को आंतरिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। 13 सीटों पर कम से कम 16 बागी पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ मैदान में हैं। सबसे बड़ी चुनौती बनासकांठा जिले में है, जहां कांग्रेस नौ में से पांच सीटों पर बागियों का सामना कर रही है। पिछले चुनाव में बहुत सी सीटों पर कांग्रेस 1,000 या इससे कम वोटों के अंतर से जीती थी और इसके मद्देनजर इन सीटों पर मुकाबला कड़ा हो सकता है।

2012 में ऐसी थी स्थिति
लास्ट फेज की इस लड़ाई को अगर 2012 के नजर से देखें तो मामला काफी रोचक है। 2012 में इन 93 सीटों में बीजेपी ने 52 और कांग्रेस ने 39 सीटें जीती थीं। इस बार कांग्रेस की तरफ से भी काफी आक्रामक प्रचार किया गया है। ऐसे में कांग्रेस को उम्मीद है कि सीटों का यह गैप न केवल कम होगा बल्कि पार्टी को जीत मिलेगी। हालांकि पिछले चुनावों की तुलना में पहले चरण में हुई कम वोटिंग ने चुनावी पंडितों की गणना को भी जटिल बना दिया है।

अंतिम चरण की बात करें तो 2012 के चुनावों में 72.64 फीसदी मतदान हुआ था। इस बार पहले चरण में सौराष्ट्र और साउथ गुजरात की 89 सीटों के लिए हुए चुनाव में वोटिंग का प्रतिशत घटकर 66.75 फीसदी रहा है। वोटों का प्रतिशत घटना दोनों बड़ी पार्टियों के लिहाज से खतरनाक हो सकता है। ऐसे में बीजेपी की तरफ पीएम नरेंद्र मोदी और कांग्रेस से खुद राहुल गांधी लोगों से बाहर निकल वोट करने की अपील करते नजर आ रहे हैं। हर बार की तरह इस बार भी लड़ाई बीजेपी और कांग्रेस के ही बीच है।

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