नेपाल को भारत विरोधी अभियान का हिस्सा न बनने दें

0
154

नेपाल के संसदीय चुनाव में वामपंथी गठबंधन की भारी जीत से भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया की राजनीति में एक नया मोड़ आया है। एकीकृत वामपंथी गठबंधन की, वर्षों से नेपाली राजनीति में पैठ बनाए नेपाली कांग्रेस पर जीत, नेपाल के युवा वर्ग की नई राजनीतिक सोच को दिखाती है। नेपाली जनता खासकर पहाड़ी क्षेत्र के लोगों ने नेपाली कांग्रेस पार्टी को सिरे से खारिज कर दिया है। एमाले की जीत दक्षिण-पूर्व एशिया के राजनीतिक एवं आॢथक रूप से मजबूत देशों के बीच चल रहे क्षेत्रीय वर्चस्व का द्योतक है।

पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली के नेतृत्व वाले वामपंथी गठबंधन की जीत से सबसे बड़ा धक्का नेपाली कांग्रेस को लगा है। वामपंथी गठबंधन को मिले स्पष्ट बहुमत से नेपाल में पिछले 27 वर्षों से चली आ रही राजनीतिक अस्थिरता का दौर खत्म होने की उम्मीद जगी है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था लागू होने के बाद नेपाल में कई सरकारें बनीं और गिरीं, कई प्रधानमंत्री बने लेकिन किसी को भी कार्यकाल पूरा करने का मौका नहीं मिला। राजनीतिक अस्थिरता के कारण क्षेत्र को काफी नुकसान उठाना पड़ा है। विकास की गति मंद हो गई है और कल्याणकारी योजनाएं करीब-करीब बंद पड़ी हैं।

वाम गठबंधन के मुख्य दल-कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत माक्र्सवादी-लेनिनवादी)-की पहली प्राथमिकता देश में राजनीतिक स्थिरता लाना होगी। आॢथक प्रगति के साथ-साथ सामाजिक व सांस्कृतिक एकजुटता को मजबूत करने के प्रयास करने होंगे। मूलभूत सुविधाओं के साथ-साथ युवाओं के लिए रोजगार मुहैया कराने की भी चुनौती होगी। साथ ही नये संविधान को लेकर पैदा हुए संकट को भी दूर करना होगा।

नये संविधान के कुछ प्रावधानों को लेकर तराई इलाकों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों में रोष है। मधेसी कहे जाने वाले इन लोगों को नागरिकता के प्रावधान अनुचित लगते हैं। इसके विरोध में इन लोगों ने कई माह तक तराई-मधेस इलाकों में आॢथक नाकेबंदी कर रोष भी जताया था। इनका कहना है कि जनसंख्या के आधार पर इन्हें प्रतिनिधित्व नहीं मिला। नये संविधान को अन्यायपूर्ण कहते हुए मधेसी लोग संविधान संशोधन की मांग कर रहे हैं।

नये सात प्रांतों के सीमांकन को लेकर भी विवाद जारी है। वाम गठबंधन सरकार को मधेसी जनता के साथ बातचीत कर इस समस्या को सुलझाना होगा, अन्यथा राजनीतिक अस्थिरता का दौर जारी रहेगा। तराई क्षेत्र में वाम गठबंधन के कुछ सीटों पर जीतने से स्पष्ट है कि मधेसियों ने भी इस पार्टी का समर्थन किया है। अब यह देखना होगा कि किस प्रकार वाम गठबंधन सरकार अपने मधेसी समर्थकों की समस्याओं का हल निकालती है।

नेपाल के प्रबुद्ध लोगों का मानना है कि पड़ोसी देशों का राष्ट्र की राजनीतिक अस्थिरता में सबसे बड़ा योगदान है। वामपंथी गठबंधन के पीछे चीन का समर्थन है, वहीं नेपाली कांग्रेस और मधेसी पाॢटयों के पीछे भारत का हाथ है। चीन ने जहां अपने आॢथक सहयोग एवं आधारभूत संरचनाओं में मदद कर पहाड़ी मूल के लोगों में पैठ बना रखी है, वहीं मधेसियों एवं मध्य क्षेत्रीय नेपाली मूल के लोग भारत के साथ वर्षों से चले आ रहे मैत्री के पैरोकार हैं।

ओली सरकार ने करीब छह माह तक चली आॢथक नाकेबंदी के लिए भारत को खुले तौर पर जिम्मेदार ठहराया था। भारत-विरोधी कार्ड खेलकरओली सरकार ने चीन की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था। उन्होंने चीन के साथ आयात संबंधी समझौते किए थे। ओली ने यह कदम भारत पर नेपाल की आॢथक निर्भरता कम करने के लिए उठाया था। ओली के नेतृत्व वाली सरकार अब प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चीन से अपने राजनयिक एवं आॢथक संबंध प्रगाढ़ करेगी।

इसी साल नेपाल सरकार चीन के साथ एक महत्वपूर्ण सड़क योजना-‘एक क्षेत्र, एक सड़क’ पर समझौता किया है। इससे नेपाल व चीन के बीच सड़क मार्ग से आवागमन और सुलभ हो जाएगा। भारत से नाराजगी जाहिर करते हुए ओली ने चीन व नेपाल के बीच बौद्ध धर्म की महत्ता पर काफी जोर दिया था। नेपाल की यह चाल भारत में नरेंद्र मोदी की हिंदुत्ववादी विचारधारा की काट मानी जाती है।

चुनाव प्रचार के दौरान वाम गठबंधन ने नेपाल में चीनी निवेश लाने का वादा किया था। एमाले ने पूर्ववर्ती नेपाली कांग्रेस सरकार द्वारा निरस्त चीन-संपोषित जल-विद्युत योजना को फिर से बहाल करने का वादा किया है। चीन ने 2013 में अपने समॢथत उम्मीदवार की जीत में सहयोग देकर उसे मालदीव का राष्ट्रपति बनवाया था और भारत द्वारा समॢथत उम्मीदवार की हार हुई थी। चीनी प्रभाव बांग्लादेश, श्रीलंका एवं भूटान में भी दिखाई देने लगा है।

भारत को नेपाल से अपने संबंधों व समझौतों पर पुनॢवचार करने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वर्षों से चले आ रहे सामाजिक, आॢथक एवं सांस्कृतिक संबंध बरकरार रहे और चीन अथवा अन्य देश नेपाल को भारत विरोधी अभियान का मोहरा न बना सकें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here