धर्म की नगरी में नक्सलियों की छत्रछाया में सैंकड़ों एकड़ में हो रही अफीम की खेती

0
477

धर्म की नगरी गया में छत्रछाया में अफीम की खेती का रकबा लगातार बढ़ता जा रहा है। नशे के इस कारोबार को नष्ट करने की कई सालों से की जा रही कोशिशें महज सरकारी खानापूर्ति बनकर रह गई है।
पटना । ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता गया’ के तर्ज पर धर्म नगरी गया जिले के बाराचट्टी प्रखंड में नक्सलियों की छत्रछाया में अफीम की खेती का रकबा लगातार बढ़ता जा रहा है। खुफिया एजेंसियों से जुड़े सूत्रों की मानें तो इस साल बाराचट्टी में ढाई सौ एकड़ से भी अधिक के रकबे में अफीम की खेती की जा रही है।

आश्चर्य की बात तो यह है कि बाराचट्टी में होने वाली अफीम की खेती कोई नई बात नहीं है। लेकिन सरकार की तमाम एजेंसियों के नाक के नीचे चल रहे नशे के इस कारोबार को नष्ट करने की पिछले कई सालों से की जा रही तमाम कोशिशें महज सरकारी खानापूर्ति बनकर रह गई है।

खुफिया एजेंसियों के सूत्रों के अनुसार इस साल बाराचट्टी में अफीम की खेती का रकबा पिछले साल से अधिक है। पिछले साल जहां बाराचट्टी में ढाई सौ एकड़ के रकबे में अफीम की खेती किए जाने की सूचना सरकारी एजेंसियों को थी वहीं इस बार इसका रकबा तीन सौ एकड़ को भी पार करने वाला है।

हालांकि बाराचट्टी जैसे सर्वाधिक नक्सल प्रभावित प्रखंड में अफीम की खेती कोई नई बात नहीं है। खुफिया एजेंसियों की सूचनाओं पर बिहार पुलिस व केंद्रीय सुरक्षा बलों द्वारा इसके कुछ हिस्से को नष्ट भी किया जाता है। लेकिन नशे के कारोबार का यह खेल बदस्तूर जारी है।

नक्सलियों की सुरक्षा में होती है अफीम की खेती

बाराचट्टी जैसे इलाके में अफीम की खेती का अपना अलग अर्थशास्त्र है। नक्सली वहां के किसानों को अधिक पैसे का लालच और सुरक्षा की गारंटी देकर हर साल अफीम के पौधे लगवाते हैं। पौधे महज तीन महीने की अल्पावधि में तैयार हो जाती है। नवंबर महीने में बोए जाने वाले बीज जनवरी में पौधे का रूप लेकर उसमें फूल निकल आते हैं और फरवरी में इसकी कटाई कर ली जाती है।

पिछले महीने बाराचट्टी में हुई थी उच्चस्तरीय बैठक

पिछले महीने 4 नवंबर को गया के बाराचट्टी प्रखंड मुख्यालय में अफीम की खेती को नष्ट करने के लिए गया के जिलाधिकारी कुमार रवि की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय बैठक का आयोजन किया गया था। इस बैठक में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के संयुक्त निदेशक टीएन सिंह, गया की एसएसपी गरिमा मल्लिक, सीआरपीएफ, एसएसबी और पर्यावरण एवं वन विभाग के अधिकारियों के साथ स्थानीय जनप्रतिनिधियों को भी बुलाया गया था।

बैठक में तय किया गया था कि अफीम की खेती की सूचना मिलते ही गांव के चौकीदार इसकी जानकारी स्थानीय थाने को देंगे। लेकिन सूत्र बताते हैं कि चौकीदार की सूचना के बावजूद अफीम के पौधों को नष्ट करने की कार्रवाई अभी तक नहीं की गई है। जबकि अगले डेढ़-दो महीने में पौधे की कटाई भी शुरू होने वाली है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here