बिहार की इन औरतों ने लिखी जिंदगी की नई परिभाषा, प्रदेश को बना दिया अव्वल

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बिहार में जीविका स्वयं सहायता समूह ने देशभर में अव्वल स्थान पाया है। बिहार जो पिछड़ा राज्य कहा जाता है, वहां महिलाएं जीविका के माध्यम से अपनी पहचान बना रही हैं।
पटना। बिहार की वो महिलाएं जो कभी अपने पति के नाम से जानी जाती थीं, जिनकी पहचान उनका अंगूठा था और जिन्होंने कभी बैंक का रास्ता भी नहीं देखा था, आज हस्ताक्षर कर अपने नाम लिख रही हैं। उन्होंने छोटी-सी पूंजी से अपना व्यवसाय शुरू कर ये साबित कर दिया है कि हौसला हो तो ऊंची पढ़ाई और धन की कमी आड़े नहीं आती।
गरीबी और अशिक्षा का दंश झेलने वाली ये महिलाएं कभी अपने शराबी पति से पीटी जाती थीं। ससुराल में प्रताड़ित की जाती थीं। आज उनकी खुद की पहचान है और वो बैंक में खुद का ही नहीं, आसपास की महिलाओं के खातों का भी लेखा-जोखा रखती हैं। वे बिजनेस करने के हुनर से वाकिफ हैं। आज इन महिलाओं ने ऐसी मिसाल कायम की है, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई दे रही है।
आज इन महिलाओं को अपने प्रदेश, अपने देश और समाज में हो रहे बदलावों की जानकारी है। ये वही अनपढ महिलाएं हैं, जिनकी एक आवाज पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शराबबंदी जैसा साहसिक कदम उठाया। ये महिलाएं हैं- जीविका संगठन से जुड़ी जीविका दीदी।
विकास का सपना आधी आबादी के विकास से ही संभव : नीतीश
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अनुसार आधी आबादी को विकसित किए बिना विकास का सपना साकार नहीं किया जा सकता है। उनके इस कथन को साकार करने में जीविका दीदियों का सहयोग सराहनीय है। बिहार की अनपढ़ और कम पढ़ी-लिखी ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का काम कर रहा है जीविका संगठन। जीविका द्वारा महिलाएं स्वरोजगार की ओर बढ़ रही हैं।
घर की चहारदीवारी लांघ दर्ज की पहचान
ऐसी कई महिलाएं हैं, जो आज घर की चहारदीवारी से निकलकर अपनी पहचान बना रही हैं, अपना खुद का व्यवसाय कर रही हैं। कोई अचार-मुरब्बा बनाकर अन्य महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं तो कोई मुर्गी पालन कर अपने परिवार के उत्तरदायित्व को निभा रही हैं। ये महिलाएं केवल व्यवसाय ही नहीं कर रहीं, बल्कि समाज में फैली बुराई को भी मिटाने के लिए अग्रसर हैं।
बिहार में शौचालय निर्माण हो या शराब की तस्करी को रोकना, दहेज के खिलाफ आवाज बुलंद करनी हो या बाल विवाह को खत्म करने का संकल्प, स्वच्छता का संदेश देने में भी ये महिलाएं अहम भूमिका निभा रही हैं।
सरैया की किसान चाची, साइकिल चलाकर जाती हैं खेत
मुजफ्फरपुर के सरैया प्रखंड की राजकुमारी देवी, जिन्हें आज पूरी दुनिया ‘किसान चाची’ के नाम से जानती है, गांव-गांव साइकिल से घूमकर वे महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और शिक्षा के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं।
खुद किसान चाची का जीवन का सफर बहुत मुश्किलों से घिरा रहा है। ससुराल से निकाल दिए जाने के बाद किसान चाची को घर से लेकर समाज में भी कड़ी लड़ाई लड़नी पड़ी। उन्होंने खेत में पैदा होने वाले ओल से अपने जीवन के बदलाव की शुरूआत की।

उन्होंने ओल से आटा और अचार बनाकर बेचना शुरू किया और आज उनके बनाए अचार और मुरब्बे की दुनिया दीवानी है। अचार के बिजनेस से राजकुमारी को अच्छी आय होने लगी और आज वो न केवल बिहार में लोकप्रिय हैं, बल्कि देश भर की महिलाओं के लिए प्रेरणा का केंद्र हैं। आज किसान चाची जाना-पहचाना नाम है, जो रोजगार के लिए और महिलाओं को जरूरत के हिसाब से ऋण मुहैया कराती हैं।
अगरबत्ती की सुगंध फैलाकर साधना देवी ला रहीं समृद्धि
पंडौल प्रखंड की श्रीपुरहाटी मध्य पंचायत के श्रीपुरहाटी गांव की साधना देवी सुबह होते ही घरेलू कार्यों को निपटाकर अपने आंगन में अगरबत्ती निर्माण में जुट जाती हैं। अगरबत्ती की सींक को विभिन्न प्रकार की खुशबू वाले घोल में लपेटने के साथ उसकी पैकिंग चलती रहती है। दो से तीन घंटे तक चले अगरबत्ती निर्माण का कार्य पूरा होने के बाद फिर ये पुन: अपने घरेलू कार्य में जुट जाती हैं।
पंडौल जीविका कम्यूनिटी कॉर्डिनेटर पिंकी कुमारी का कहना है कि पांच हजार से प्रारंभ अगरबत्ती उद्योग के लिए डेढ़ लाख की पूंजी काफी होती है। डेढ़ लाख से स्थापित अगरबत्ती उद्योग से ढाई दर्जन से अधिक महिलाओं के लिए रोजगार का बेहतर जरिया साबित होगा। इन अगरबत्ती उद्योग से जुड़ी स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को अगरबत्ती उद्योग के लिए जीविका द्वारा समय-समय पर धन के अलावा प्रशिक्षण की सुविधा प्रदान की जाती है।
इन महिलाओं के लिए आसान नहीं थी राह
शोभा देवी ने अपनी आप-बीती सुनाते हुए बताया, “मेरे पति ने मुझे मारा-पीटा, लेकिन मैं अपनी ज़िद पर डटी रही। मैं जीविका की बैठकों में शामिल होती रही। प्रत्येक स्वयं-सहायता समूह की नियमित रूप से बैठकें होती हैं और इनमें शामिल न होने वाले सदस्यों को जुर्माना भरना पड़ता है। आखिरकार, जब मैंने अपना पुराना कर्ज़ उतारने के लिए 20,000 रुपये का ऋण लिया, तब जाकर कहीं मेरे कार्यों का महत्त्व मेरे पति की समझ में आया।”
पति ने दी थी धमकी, जीविका की बैठक में गई तो घर से निकाल देंगे
शेखवाड़ा गांव की निवासी शोभा देवी एक स्वयं सहायता समूह में शामिल होना चाहती थीं, जिसके लिए उसे पांच रुपये मासिक चंदा देना था। लेकिन, उसके पति ने धमकी दे डाली कि अगर वह उसमें शामिल होने की ज़िद करेगी, तो वह उसे घर से निकाल बाहर करेगा।
जीविका से जुड़कर पढ़ा रही बच्चों को
कुंती देवी ने जो कि कभी भी स्कूल का चेहरा नहीं देख पाईं और बैंक क्या होता है? वो भी नहीं जानती थीं। लेकिन, आठ बच्चों की मां मुशहर कुंती देवी के दो बच्चे बीमार पड़ गए और उन्होंने दम तोड़ दिया क्योंकि दवाओं के पैसे नहीं थे। पति जो खेत में मजदूरी करता था, उसे लोग अछूत समझते थे। लेकिन, आज जीविका से जुड़कर वह अपने बच्चों को स्कूल भेज पाई।
दशा-दिशा बदलने में नजीर बनीं सुमित्रा
गरीबी से जूझती सुमित्रा ने हिम्मत नहीं हारी और अपने हौसले के सहारे विकास की मंजिलें हासिल करने को आगे बढ़ रही हैं। पति को मजदूरी करने के कारण बच्चों का भरण-पोषण में आ रही बाधा को दूर करने की दिशा में वह कुछ करने की चाहत के साथ आगे बढ़ने लगी। सुमित्रा प्रतिमाह हजारों रुपये की आमदनी पर ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं के बीच मिसाल बन चुकी हैं।
बच्चों को शिक्षा के लिए करती प्रोत्साहित
सिर्फ अपना नाम लिखने वाली सुमित्रा अपने सभी चारो बच्चों को पठन-पाठन के प्रति काफी सजग रहती हैं। उनका एक पुत्र रंजीत पासवान इंटर का छात्र है। तीन पुत्री लक्ष्मी कुमारी, आंचल कुमारी व प्रियंका कुमारी निजी स्कूल में शिक्षा ग्रहण कर रही है। सुमित्रा कहती है कि समय के साथ विकास के दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। बच्चों की शिक्षा-दिक्षा के साथ विकास की नई मंजिल हासिल करने को तैयार हैं।
इन महिलाओं की ही तरह आज बिहार में आठ लाख ग्रामीण महिलाएं जीविका से जुड़ी हैं और स्वयं सहायता समूह से 10 रुपये की राशि हर सप्ताह एक दूसरे से इकट्ठा कर आज 64 मिलियन डॉलर यानि 418.5 रुपये जमा कर 3,270 करोड़ रुपये बैंक से लोन लेकर अपना काम कर स्वावलंबी बन रही हैं। जीविका ने 600,000 महिला किसान और व्यवसायी तैयार किया है जो बिहार की सामाजिक मजबूती की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
जीविका ने बदल दी ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी
साल 2007 में दो अक्टूबर के दिन विश्व बैंक की आर्थिक सहायता से बिहार रूरल लाइवलिहुड प्रोजेक्ट, यानी जीविका की शुरूआत हुई। राज्य के छह जिले गया, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया, खगड़िया, मधुबनी और नालंदा के 18 प्रखंडों में पायलट प्रोजेक्ट के तहत इसकी शुरुआत हुई और आज इसकी पहुंच आज बिहार के सभी प्रखंडों में है। समूह की महिलाएं न सिर्फ आर्थिक रूप से सक्षम बन रहीं, बल्कि उनके अंदर नेतृत्व शक्ति का भी विकास हुआ है।
कैसे काम करती है जीविका परियोजना
भागलपुर जिले के सन्हौला प्रखंड के एरिया को-अॉर्डिनेटर राजीव राय ने बताया कि जीविका एक स्वयं सहायता समूह है जो वर्ल्ड बैंक की मदद से संचालित हो रहा है। इसके अंतर्गत महिलाएं स्वयं सहायता समूह बनाती हैं, जिसमें 10 से 12 महिलाओं का एक ग्रुप होता है जो महिलाओं को समस्या से निपटने के लिए स्वरोजगार के लिए लोन मुहैया कराता है।
अपने घर के जरूरी काम को निपटाकर ये महिलाएं एक-दूसरे की मदद करने, अपने गांव और प्रखंड के विकास के लिए काम करने के लिए बैठकें करती हैं। फिर ये महिलाएं एक-दूसरे के साथ मिलकर दूसरी महिलाओं को भी इससे जुड़ने और उन्हें बेहतर जीवन जीने के उपाय बताती हैं।
इस स्वयं सहायता समूह में महिलाओं द्वारा जमा किए गए पैसे से ही लेन-देन होता है। इन पैसे से महिलाएं छोटे-मोटे व्यवसाय शुरू करने के लिए या जिन्हें जरूरत हो उन्हें लोन देती हैं।
जीविका से जुड़ने के बाद बही खाते और महिलाओं के प्रशिक्षण आदि का काम संभालने के लिए उनका शिक्षित होना भी जरूरी है, इसलिए समूह में जुड़ने के बाद पहले चार महीने महिलाओं को शिक्षित किया जाता है जहां वर्ष 2008 में केवल 22.2 प्रतिशत महिलाएं हस्ताक्षर करने में सक्षम थीं, वहीं वे वर्ष 2010 में बढ़ कर 67.2 प्रतिशत हो गईं।

उन्होंने बताया कि अब जीविका परियोजना को स्थानीय बैंकों से जोड़ दिया गया है, जो इन्हें ऋण मुहैया कराते हैं। इसके बाद यही पैसा ज़रूरत के मुताबिक समूह के सदस्यों के बीच ऋण के तौर पर बांट दिया जाता है। सदस्य बैंठकें करते रहते हैं और इनके दौरान एक-दूसरे की ज़रूरतों का जायज़ा लेते रहते हैं और तय करते हैं कि कौन सबसे ज़्यादा ज़रूरतमंद है तथा उसको ही ऋण-राशि दे देते हैं।
स्वयं सहायता समूह के जरिए दिए गए लोन को लोन लेने वाला चुकाता है या नहीं, ये ध्यान दिया जाता है। इन स्वयं सहायता समूहों के पास अपना रजिस्टर होता है, जिसमें सभी जानकारियां लिखी जाती हैं। इससे पारदर्शिता बनी रहती है। एक पैसे का भी हेर-फेर नहीं होता। गांवों में बने छोटे-छोटे ग्रुप के बाद एक कमेटी बनाई जाती है, जो सही से संचालन करती है।
सभी कर्ताधर्ता महिलाएं
तरक्की का यह रास्ता बिहार में हर महिला के लिए खुला है। इस प्रोजेक्ट ने नौ जिले में 55 ब्लॉक के 7.5 लाख घरों में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है। ग्राम संगठन (विलेज आर्गेनाइजेशन) स्तर पर सीता, गुलाब, गंगा, अन्नपूर्णा, राधा आदि नाम से बनाए गए स्वयं सहायता समूह की कर्ताधर्ता भी महिलाएं ही हैं। इन्हीं महिलाओं में कोई बैंक मित्र का काम संभाल रही हैं तो कोई समूह को प्रशिक्षित करने का और कोई रिर्सोस पर्सन है।
कम पढ़ी-लिखी महिलाओं की भी पहचान
जीवकार्जन के अलावा ये कम पढ़ी लिखी गांव की महिलाएं खाद्य सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा, प्रशिक्षण और स्वास्थ्य रक्षा का भी काम कर रही हैं। खास बात यह कि अगर कोई महिला लोन लेने के बाद भी व्यवसाय नहीं चला पाती तो उसे दोबारा भी उधार दिया जा सकता है।

शराबबंदी के बाद अब जीविका दीदियों ने सामाजिक कार्यों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना शुरू कर दिया है और अब दहेजबंदी और बाल विवाह की कुप्रथा को भी खत्म करने का बीड़ा उठा लिया है। शौचालय बनाने के लिए जीविका दीदी गांव में गली-गली घूमकर लोगों को स्वच्छता का पाठ पढ़ा रही हैं और शौचालय निर्माण के लिए प्रेरित कर रही हैं।
बिहार के उन गांवों में जहां कभी औरतें घर के दरवाजे के बाहर की दुनिया के बारे में नहीं जानती थीं। घर में सास और पति द्वारा दिए ताने सुनती थीं। समाज में जिनकी कोई हैसियत नही थी। वही औरतें आज अपने पति के व्यवसाय के लिए लोन लेकर दे रही हैं, बच्चों की शिक्षा के लिए जागरूक हैं।
जीविका के तहत बिहार ने देशभर में अव्वल स्थान हासिल किया है
जीविका के तहत स्वयं सहायता समूहों के गठन में बिहार ने देशभर में अव्वल स्थान हासिल किया है। दूसरे स्थान पर आंध्र प्रदेश है। बिहार में अब-तक छह लाख 30 हजार स्वयं सहायता समूह का गठन कर लिया गया है। इन समूहों से 72 लाख से अधिक महिलाएं जुड़ चुकी हैं। यह संख्या भी देशभर में सबसे अधिक है। आंध्र प्रदेश में करीब छह लाख समूह गठित है।
1700 करोड़ लोन प्राप्त किया
बैंकों के उदासीन रवैये के बाद भी 2016-17 में समूहों ने 1700 करोड़ लोन प्राप्त किया। किसी भी समूह ने लोन को वापस करने में कोई चूक नहीं की है। यही कारण है कि इनका एनपीए (नन परफॉर्मिंग एसेट्स) शून्य है। बैंकों को लोन नहीं देने का कोई बहाना ये समूह नहीं दे रही हैं। इसके बावजूद बैंकों का अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है।
शराबबंदी के बाद अब जीविका दीदियों ने सामाजिक कार्यों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना शुरू कर दिया है और अब दहेज बंदी और बाल विवाह की कुप्रथा को भी खत्म करने का बीड़ा उठा लिया है। शौचालय बनाने के लिए जीविका दीदी गांव में गली-गली घूमकर लोगों को स्वच्छता का पाठ पढ़ा रही हैं और शौचालय निर्माण के लिए प्रेरित कर रही हैं।

बिहार के उन गांवों में जहां कभी औरतें घर के दरवाजे के बाहर की दुनिया के बारे में नहीं जानती थीं, घर में सास और पति द्वारा दिए ताने सुनती थीं। समाज में जिनकी कोई हैसियत नही थी, वही औरतें आज अपने पति के व्यवसाय के लिए लोन लेकर दे रही हैं, बच्चों की शिक्षा के लिए जागरूक हैं।

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