जयंती विशेष: महामना मदन मोहन मालवीय ने रखी थी BHU की आधारशिला

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नई दिल्ली: काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक और भारत रत्न पं. मदन मोहन मालवीय का जन्म प्रयाग (इलाहाबाद) में 25 दिसंबर 1861 को हुआ था. उनके पिता का नाम पं. ब्रजनाथ व माता का नाम मूनादेवी था. वे अपने सात भाई-बहनों में 5वीं संतान थे. उनके पिता संस्कृत भाषा के अच्छे जानकार थे. जीवन भर देश सेवा में लगे रहने वाले महामना का 12 नवंबर 1946 को 85 वर्ष की उम्र में बनारस में निधन हो गया था.

संसार में सत्य, दया और न्याय पर आधारित सनातन धर्म उनको सर्वाधिक प्रिय था. वेशभूषा और आचार-विचार में मालवीय भारतीय संस्कृति के प्रतीक और ऋषियों के स्मारक थे. मात्र 5 वर्ष की आयु में उनके माता-पिता ने उन्हें संस्कृत भाषा में प्रारंभिक शिक्षण लेने हेतु पं. हरदेव धर्म ज्ञानोपदेश पाठशाला में भर्ती किया गया. वहां प्राइमरी परीक्षा पास करने के बाद मालवीय को एक अन्य विद्यालय में भेजा गया. जहां से पढ़ाई पूरी करने के बाद वे इलाहाबाद के जिला स्कूल पढ़ने गए. उन्होंने म्योर सेंट्रल कॉलेज (जो आजकल इलाहाबाद विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है) से 10वीं की परीक्षा पास की थी. इसके बाद कोलकाता विश्वविद्यालय से उन्होंने बी.ए. की डिग्री ली.

35 सालों तक कांग्रेस की सेवा की
मालवीय जी हिन्दू सभ्यता के सजीव प्रतीक थे. उन्होंने हिन्दी-अंग्रेजी समाचार पत्रों में संपादन का काम भी किया और देश की जनता को जागृत करने का फर्ज भी अदा किया. सत्य, दया और न्याय पर आधारित जीवन जीने वाले मदनमोहन मालवीय का व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन देश की जनता के लिए आदर्श था. उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेकर 35 वर्ष तक कांग्रेस की सेवा की. वह सन 1909, 1918, 1930 और 1932 में कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए. उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की.

हिन्दुओं को संगठित करने का था लक्ष्य
उन्होंने हिन्दू संगठन का शक्तिशाली आंदोलन चलाया लेकिन कांग्रेस को राजनीतिक प्रतिक्रियावाद और धार्मिक कट्टरता से मुफ्त रखा. हिन्दू समाज और भारत की प्राचीन सभ्यता तथा विविध विधाओं एवं कला की रक्षा के लिए मालवीय जी ने विशेष कार्य किया. वह स्वभाव में बड़े उदार, सरल और शांतिप्रिय व्यक्ति थे. उनके कार्यों एवं व्यवहार के लिए जनमानस ने उन्हें महामना कहा था.

बीएचयू के लिए मांगी थी भीख
मालवीय जी का सम्पूर्ण जीवन शिक्षा के लिए समर्पित था. उन्होंने अपने अथक प्रयासों से हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना कर शिक्षा का प्रकाश फैलाया था. कहा जाता है कि मालवीय जी ने बीएचयू के निर्माण के लिए एक-एक रुपये की भीख तक मांगी थी जो विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए फंड इकट्ठा करने का एक कैंपेन का हिस्सा था. मालवीय जी की इस नि:स्वार्थ समाज सेवा के लिए ही ‘लीडर’ समाचार पत्र के तत्कालीन संपादक सी.वाई. चिंतामणि ने मालवीय जी को ‘धर्मात्मा पं. मदन मोहन मालवीय’ कहा था.

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