अस्पताल में भर्ती हैं गीतों के सरताज नीरज, ये हैं उनकी 5 श्रेष्‍ठ रचनाएं…

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कवि गोपाल दास नीरज को चेस्ट इंफेक्शन होने के कारण लखनऊ के लोहिया मेडिकल इंस्टीट्यूट में भर्ती किया गया है। वो इस समय ऑक्सीजन पर हैं। रविवार सुबह उन्हें संजय गांधी पीजीआई ले जाया गया था। जहां से उन्हें जांच के बाद घर भेज दिया गया था। सोमवार सुबह जब उन्हें फिर दिक्कत हुई तो इंस्टीट्यूट में भर्ती किया गया। डॉ. राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के निदेशक प्रो. दीपक मालवीय ने बताया कि उन्हें चेस्‍ट इंफेक्‍शन है और उन्हें एंटीबायटिक दी जा रही है। उनके सभी जरूरी अंग ठीक काम कर रहे हैं, वहीं फेफड़ों की जकड़न कम करने के ‌लिए नेबुलाइज किया गया है। गोपाल दास नीरज की उम्र 92 वर्ष है। उनका जन्म 4 जनवरी 1925 को हुआ था।
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे, कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे…
नीरज प्रेम रस के बड़े कवि हैं। उन्होंने हिंदी फ़िल्मों के कई बेहतरीन गीत लिखे। वे पहले व्यक्ति हैं जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो-दो बार सम्मानित किया, पहले पद्मश्री से, उसके बाद पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। यही नहीं, फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये उन्हें लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला। हम अपने पाठकों के लिए उनकी पांच बेहतरीन रचनाएं पेश कर रहे हैं।

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई
पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई
चाह तो निकल सकी न पर उमर निकल गई

गीत अश्क बन गए छंद हो दफन गए
साथ के सभी दिऐ धुआँ पहन पहन गए
और हम झुके-झुके मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा
क्या जमाल था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ़ जमीन और आसमाँ उधर उठा
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा

एक दिन मगर यहाँ ऐसी कुछ हवा चली
लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली
और हम लुटे-लुटे वक्त से पिटे-पिटे
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ

हो सका न कुछ मगर शाम बन गई सहर
वह उठी लहर कि ढह गये किले बिखर-बिखर
और हम डरे-डरे नीर नैन में भरे
ओढ़कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

माँग भर चली कि एक जब नई-नई किरन
ढोलकें धुमुक उठीं ठुमक उठे चरन-चरन
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन चली दुल्हन
गाँव सब उमड़ पड़ा बहक उठे नयन-नयन

पर तभी ज़हर भरी गाज़ एक वह गिरी
पुँछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी
और हम अजान से दूर के मकान से
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

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