मजबूरी की दोस्ती: लालू का साथ छोड़ कांग्रेस के पास भी कोई चारा नहीं

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कांग्रेस के पास लालू यादव के साथ बने रहने के अलावा और कोई विकल्‍प नहीं है। संगठन कमजोर, पार्टी में कलह, आधार वोट बैंक पीछे छूट गया है। ऐसे में कांग्रेस जायेगा तो कहां जाये।

पटना। नहीं मिलने पर घबराने और मिलने पर आंख चुराने वाले गाने को याद करें, तो कांग्रेस और राजद की दोस्ती की तस्वीर साफ समझ में आती है। भ्रष्टाचारी को मदद पहुंचाने वाले जिस संशोधन विधेयक की कॉपी को पत्रकार सम्मेलन में फाड़कर राहुल गांधी ने अपनी पार्टी की सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को घेरने की कोशिश की थी, उसके केंद्र में लालू प्रसाद ही थे।

राहुल को आशंका थी कि इस बिल से भ्रष्टाचार के आरोप में सजायाफ्ता लालू प्रसाद को फायदा पहुंचेगा। जो उन्हें कतई मंजूर नहीं था। कांग्रेस को नई राह पर चलाने की कोशिश करने वाले राहुल प्रसाद ने सार्वजनिक रूप से कई बार यह दिखाने की कोशिश की कि लालू प्रसाद उन्हें पसंद नहीं हैं, लेकिन यह भी कड़वी सच्चाई है कि बिहार में तब और अब कांग्रेस को लालू से अच्छा कोई दोस्त मिल ही नहीं रहा।

लालू से दूर रहने की कोशिश करते थे राहुल

2014 के लोकसभा चुनाव में राजद के साथ सीटों का तालमेल रहने के बाद भी राहुल गांधी लालू प्रसाद के साथ मंच शेयर करने से परहेज करते दिखे। 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व में बने महागठबंधन के दौरान भी राहुल गांधी ने लालू से दूरी बनाए रखी।

हालांकि उनकी पार्टी के नेता यह दलील देते थे कि सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ कांग्रेस-राजद के सिद्धांत कमोबेश एक ही हैं, इसीलिए हमारा उनके साथ गठबंधन है। परंतु, राहुल गांधी भ्रष्टाचार के आरोपी लालू यादव के साथ मिलकर राजनीति करने के लिए तैयार नहीं दिखते थे।

नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण समारोह में लालू प्रसाद ने जबरन उन्हें खींचकर गले लगाया और यह दिखाने की कोशिश की कि राहुल गांधी भले ही उनसे दूरी बनाने की कोशिश करें लेकिन कांग्रेस उनकी हमनवां थी और रहेगी। उस समय भी राहुल गांधी लालू प्रसाद की जगह नीतीश कुमार से दोस्ती के इच्छुक थे। महागठबंधन टूटने के बाद राहुल का नीतीश से मोहभंग हुआ तो अब लालू की दोस्ती उनकी मजबूरी है।

शुचिता की बात बिहार में पीछे छूट जाती है

अब लग रहा कि बिहार में कांग्रेस के सामने भ्रष्टाचार के आरोपी लालू प्रसाद से हाथ मिलाने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है। बिहार में भाजपा के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए राजद कांग्रेस की मजबूरी है। इस मजबूरी की कीमत कांग्रेस को ही चुकानी है। राजद के वोट बैंक के लिए कांग्रेस को बिहार में भ्रष्टाचार के मसले पर घुटने टेकने पड़ रहे।

राजनीति में शुचिता के पक्षधर राहुल गांधी अब कांग्रेस के अध्यक्ष हैं, लेकिन वे अब तेजस्वी यादव के साथ खाना खाते दिखते हैं। लालू प्रसाद के जेल जाने के बाद उनकी पार्टी के नेता राबड़ी देवी से मिलकर उन्हें सांत्वना दे रहे। उनके साथ खड़े दिख रहे।

संगठन में झगड़ा, वोटबैंक पीछे छूटा, फिर क्या है चारा

कांग्रेस अपने पारंपरिक वोटबैंक को संभाल नहीं पाई। संगठन में झगड़े हैं। अभी हाल तक पार्टी के विधायक टूट और बिखराव की वजह से चर्चा में थे। सदाकत आश्रम के अलावा कहीं भी राजनीतिक कार्यक्रम में पार्टी भीड़ नहीं जुटा पाती।

नेता खुद मानते हैं कि पार्टी में कार्यकर्ता कम नेता अधिक हैं। ऐसे में चुनावी नैया पार करने के लिए राजद के आधार वोट बैंक के अलावा कोई चारा नहीं दिखता। लालू प्रसाद के खिलाफ लगे चारा घोटाला और भ्रष्टाचार के आरोपों पर आंख मूंदने के अलावा पार्टी के पास कोई चारा नहीं।

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