बेखौफ आंखें, बाजुओं में दम …ये हैं बिहार की ‘दंगल गर्ल्‍स’

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ये हैं बिहार की दंगल गर्ल्‍स। इनकी कोशिश है, उनलोगों के मुंह पर ताला लगाने की, जिन्हें आज भी लगता है कि लड़कियां सिर्फ चौके-चूल्हे के लिए ही बनी हैं।
पटना । दोपहर के साढ़े बारह बज रहे हैं। फावड़े से धनवंती और नूतन मिट्टी को दंगल के लिए तैयार कर रही हैं। पास में ही बाकी लड़कियां वार्मअप कर रही हैं। इतने में सीटी बजती है और रेडी की आवाज आती है। सभी लड़कियां एक साथ वंदे मातरम के नारे के साथ प्रैक्टिस के लिए अखाड़े में उतर आती हैं। ये तैयारी है जीत की।कोशिश है, उनलोगों के मुंह पर ताला लगाने की, जिन्हें आज भी लगता है कि लड़कियां सिर्फ चौके-चूल्हे के लिए ही बनी हैं। ये हैं बिहार की दंगल गर्ल्‍स। इनकी बेखौफ आंखों में लड़कियों और औरतों की बदलती दुनिया की झलक दिखती है। ये नजारा है पटना से 75 किलोमीटर दूर अथमलगोला के एक छोटे से गांव रुपस का। यहां राज्य के पहले महिला अखाड़े की शुरुआत की गई है।
हरियाणा की पहलवान भी हो जाती हैं पस्त ये लड़कियां मामूली खिलाड़ी नहीं हैं ये देश भर की खिलाडिय़ों को अखाड़े में पस्त कर चुकी हैं। इनके सामने क्या हरियाणा, क्या उत्तर प्रदेश। सभी जगह की खिलाडिय़ों को ये पहलवान पटखनी दे चुकी हैं। इस अखाड़े में 22 खिलाड़ी हैं जिन्होंने सब जूनियर, जूनियर और सीनियर प्रतियोगिताओं में राष्ट्रीय स्तर पर राज्य का प्रतिनिधित्व किया है। इसमें धनवंती कुमारी, प्रियंका, नीलम, सुरमा रानी, निशा कुमारी, अंजलि, राधा, नूतन, प्रीति सोनम और वर्षा प्रमुख हैं।
चंदे से खड़ी की अखाड़े की दीवार कहते हैं ठान लो तो जीत है और मान लो तो हार। कुछ ऐसे ही जीत की ठानी है धीरज सिंह चौहान ने। इनकी प्रतिज्ञा है राज्य को महिला कुश्ती में पहला मेडल दिलाने की। धीरज बताते हैं कि चंदा करके ऑफिस और पाई पाई जोड़कर अखाड़े की दीवार बनवाई गई है। चंदे की राशि से ही वह लड़कियों के लिए पोशाक और खाना भी खरीदते हैं। रुपस गांव में दूर से ही सड़क से सद्भावना खेल कूद अकादमी, अथमलगोला, रुपस का साइन बोर्ड। मिट्टी और ईंट के बने इस ऑफिस की छत कपड़े की है।तीन साल से चल रहा अखाड़ा यूं तो यह अखाड़ा तीन साल से चल रहा है लेकिन इसका विधिवत उद्घाटन बिहार कुश्ती संघ के अध्यक्ष दशरथ यादव ने 25 दिसंबर को किया है। इस अखाड़े में गांव की ऐसी लड़कियां दंगल खेलती हैं जो बहुत ही निम्नवर्ग से आती हैं। धीरज सिंह चौहान खुद कुश्ती में स्टेट चैंपियन रह चुके हैं और पिछले आठ सालों से गांव की लड़कियों को कबड्डी और कुश्ती का प्रशिक्षण दे रहे हैं।छेड़ा तो दिखा दी औकात एक छोटे से गांव के अखाड़े में कुश्ती खेलना लड़कियों के लिए इतना भी आसान नहीं होता है। उसे एक गांव की ही नहीं बल्कि उस पुरुष मानसिकता से भी कुश्ती करनी होती है जो लड़कियों को घर के अंदर देखना चाहता है। इन लड़कियों के साथ कई बार छेडख़ानी तो कई बार परेशान करने की कोशिश भी की गई लेकिन यह किसी की सुनने वाली कहां थी।
बात मार्च की है जब यह राष्ट्रीय बालक बालिका सब जूनियर कुश्ती प्रतियोगिता के लिए चित्तूर गई हुई थीं। उस समय लड़कियों के साथ कुछ लोगों ने छेडख़ानी की तब इन्होंने उन्हें अपनी ताकत दिखा दी और एफआइआर भी दर्ज कराई। इसके अलावा बगल के गांव पुंडारक के भी कुछ दबंग लोगों ने इन्हें ना खेलने के लिए धमकाया। गांव वालों को घर घर जाकर हिदायत दी लेकिन ये लड़कियां डरी नहीं और खेलती रहीं।डाइट के लिए खेलने जाते हैं जिलों में धीरज इनके लिए अपनी तरफ से चंदा इकट्ठा करके खाना तो उपलब्ध करवाते हैं लेकिन कुश्ती के लिए पौष्टिक डाइट की जरूरत होती है जो इन्हें मिल नहीं पा रही है। गांव का कोई किसान चावल या आटा दे जाता है उसी से इनका खाना पीना होता है। इसके अलावा वह विभिन्न जिलों में दंगल खेलने जाती हैं जिससे मिली पुरस्कार राशि से डाइट की सामग्री खरीदी जाती है।
धीरज बताते हैं कि ये राजस्थान, यूपी, हरियाणा में दंगल खेलने जाती ही हैं लेकिन दरभंगा, मधुबनी, सहरसा सहित विभिन्न जिलों में भी जाती हैं ताकि उन्हें कुछ पैसे मिले और उनकी डाइट की व्यवस्था हो पाए। धीरज ने इन खिलाडिय़ों के लिए हॉस्टल खोला है जिसमें वह उन्हें रखते भी हैं और उनको प्रशिक्षण भी देते हैं। इसमें खिलाड़ी खुद से खाना पका कर खाते हैं और प्रैक्टिस करते हैं।

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