खत्म होंगे रेल के लाल, हरे सिग्नल

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हाल में हुई रेल दुर्घटनाओं के मद्देनजर सरकार देश में मौजूदा सिग्नल प्रणाली को पूरी तरह बदलने पर विचार कर रही है। इस तरह लोकोमोटिव चालकों के लिए वर्षों से चल रही लाल और हरे सिग्नल की व्यवस्था खत्म हो जाएगी। सरकार बजट में इसकी घोषणा कर सकती है। पूरे देश में सिग्नल प्रणाली को बदलने के लिए 60,000 करोड़ रुपये से अधिक का खर्च आने का अनुमान है। अलस्टॉम, एनल्सडो, सीमंस, बोम्बार्डियर और थेल्स सहित यूरोपियन ट्रेन कंट्रोल सिस्टम (ईटीसीएस) की 6 प्रमुख कंपनियां देश में सिग्नल प्रणाली पर काम कर रही हैं।
रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कहा, ‘हम मौजूदा सिग्नल प्रणाली को पूरी तरह बदलने की योजना बना रहे हैं। इतिहास में रेलवे पहली बार ऐसा करने जा रही है।’ इस मामले की जानकारी रखने वाले एक सूत्र ने कहा कि इस कार्यक्रम को एक नए वित्तीय मॉडल की जरूरत है क्योंकि इसके लिए बहुत पैसा चाहिए। सूत्र ने कहा, ‘इसे चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है लेकिन मंत्री का मानना है कि अगर बड़े पैमाने पर ऑर्डर देंगे तो सस्ता पड़ेगा।’ इसके वित्तपोषण का एक तरीका एन्युटी मॉडल हो सकता है जिसमें कंपनियों को टुकड़ों में भुगतान किया जाता है। इस योजना को मंजूरी के लिए मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति के समक्ष रखा जाएगा।
ईटीसीएस प्रणाली में ट्रेन चालक के लिए एक बार के साथ एक डैशबोर्ड होता है जो यह बताता है कि कितनी दूरी आगे बढ़ने के लिए सुरक्षित है। इसमें एक स्पीडोमीटर होता है जो हरे रंग में रफ्तार की सीमा निर्धारित करता है और पीले रंग में ट्रेन की रफ्तार दिखाता है। जैसे ही चालक ट्रेन की रफ्तार तेज करता है यह डैशबोर्ड पर लाल रंग का अलर्ट दिखाता है। अगर चालक तेज गति के साथ 5 किमी की दूरी तय करता है तो ट्रेन पर अपने आप ब्रेक लग जाता है। फिलहाल लोकोमोटिव चालकों के पास ट्रेन चलाने के लिए कोई तकनीकी मदद उपलब्ध नहीं है। वे पूरी तरह स्टेशनों के आगे चले सिग्नल पर निर्भर हैं। कोहरे और खराब मौसम में जरा सी चूक भी दुर्घटना का कारण बन सकती है।
ईटीसीएस को फिलहाल 342 किमी के खंड पर आजमाया जा रहा है जिसमें गतिमान एक्सप्रेस का दिल्ली-आगरा रूट और चेन्नई के करीब उपनगरीय रेल सेवा शामिल है।भारत की पहली रेल 1853 में मुंबई में वडी बंदर और ठाणे के बीच चली थी लेकिन सिग्नल प्रणाली की शुरुआत 1893 में गाजियाबाद से पेशावर के बीच 23 स्टेशनों पर हुई थी। इसका श्रेय दो अंग्रेज सिग्नल इंजीनियरों लिस्ट और मोर्स को जाता है जिन्हें भारतीय सिग्नल प्रणाली का पिता कहा जाता है। रेल मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, ‘देश में सिग्नल प्रणाली में बदलावा की शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी और तबसे कुछ बदलाव हुए हैं लेकिन इस बार हम वैश्विक तकनीक लाए हैं।’ ईटीसीएस के तहत भी लाइन क्लीयरेंस की जिम्म्ेदारी स्टेशन मास्टर की ही होगी। इस प्रणाली के लिए ट्रेन, पटरियों और ट्रेन इंटरफेस के लिए उपकरण लगाने की जरूरत है। इसके दो तकनीकी स्तर हैं। पहले स्तर में इंटरफेस को संभव बनाने के लिए रेलों पर एक इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसपोर्डर लगाना होगा। अगला स्तर ट्रेन और स्टेशनों के बीच ऑटोमैटिक रेडियो कनेक्शन का होगा।
गाजियाबाद-कानपुर मार्ग पर प्रयोग के तौर पर एक अन्य प्रणाली का इस्तेमाल किया जा रहा है। सेंट्रलाइज्ड ट्रैफिक कंट्रोल (सीटीसी) में इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग और ऑटोमैटिक सिग्नेलिंग सिस्टम की सुविधा है। गाजियाबाद और कानपुर के बीच 410 किमी लंबे मार्ग पर रोजाना 200 ट्रेनें गुजरती हैं। सीटीसी सिस्टम से ट्रेनों की वास्तविक स्थिति पर नजर रखने और बेहतर प्रबंधन में मदद मिलेगी। इसमें सेंट्रलाइज्ड ट्रैफिक कंट्रोल ऑफिस से सिग्नल के दूरस्थ संचालन की सुविधा है।

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