पूंजी लाभ कर की बढ़ेगी अवधि!

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वित्त वर्ष 2018-19 के आम बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली पूंजी बाजार को लेकर कई कदमों की घोषणा कर सकते हैं। अन्य निवेश साधनों की तरह से इनमें सूचीबद्ध शेयरों में अल्पावधि पूंजी लाभ कर की अवधि को एक साल से बढ़ाकर तीन साल करने जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं। कई शेयरधारक इक्विटी में दीर्घावधि पूंजी लाभ कर को वापस लाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन बजट निर्माताओं को लगता है कि इस कदम से संस्थागत निवेशकों के बीच भय का माहौल बन सकता है, ऐसे में अल्पावधि पूंजी लाभ कर की अवधि बढ़ाना बेहतर विकल्प हो सकता है। सरकार के समक्ष प्रतिभूति लेनदेन कर को खत्म करने और वैकल्पिक निवेश फंडों पर वस्तु एवं सेवा कर के बारे में स्पष्टता लाने के बारे में प्रस्तुतिकरण दिया गया है।
वित्त मंत्री अरुण जेटली के साथ बजट पूर्व बैठक और वित्त मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ अलग से चर्चा में उद्योग जगत, सलाहकार फर्मों के प्रतिनिधियों तथा बाजार के भागीदारों ने दीर्घावधि पूंजी लाभ कर व्यवस्था को वापस शुरू करने की मांग की थी। पहले की खबरों के मुताबिक ऐसा समझा जाता है कि बंबई स्टॉक एक्सचेंज ने वित्त मंत्रालय से कहा था कि दीर्घावधि पूंजी लाभ कर में छूट से राजस्व को नुकसान हो रहा है और यह करीब 500 अरब रुपये सालाना हो सकता है। मामले के जानकार सूत्रों का कहना है कि इस तरह के कर को लगाने से संस्थागत निवेशकों पर प्रतिकूल प्रभाव पडऩे की आशंका को लेकर भी सरकार के समक्ष प्रस्तुतिकरण दिया गया है। उनका कहना है कि संस्थागत निवेशक दीर्घावधि के लिहाज से निवेश करते हैं, ऐसे में इस पर कर लगाने से उन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
एक अधिकारी ने कहा, ‘दीर्घावधि पूंजी लाभ कर लगाने के बजाय सरकार सूचीबद्ध प्रतिभूतियों पर अल्पावधि पूंजी लाभ कर की अवधि को बढ़ाकर तीन साल करने पर विचार कर रही है, जो अभी एक साल है। ऐसा करने से यह अन्य संपत्ति वर्ग के समान हो जाएगा।’ उन्होंने कहा कि जेटली इसके बारे में बजट में घोषणा कर सकते हैं।
शेयरों और म्युचुअल फंडों पर अल्पावधि पूंजी लाभ कर 15 फीसदी की दर से लगता है। सूचीबद्ध शेयरों में एक साल से अधिक समय तक निवेश बनाए रखने पर कोई कर नहीं लगता है। भारतीय शेयर बाजार को ज्यादा उदार बनाने के क्रम में दीर्घावधि पूंजी लाभ कर को 2005 में हटा दिया गया था। हालांकि बॉन्ड, सोना और रियल एस्टेट जैसे निवेश साधनों पर अल्पावधि पूंजी लाभ कर की अवधि तीन साल है।
कुछ विशेषज्ञ इस प्रस्ताव से सहमत हैं। पीडब्ल्यूसी इंडिया के राहुल गर्ग ने कहा, ‘ऐसा लगता है कि सरकार छूट खत्म करने और दरें घटाने को इच्छुक है। ऐसे में प्रतिभूतियों पर भी यह छूट बढ़ सकती है। ऐसे में अल्पावधि पंजी लाभ कर की अवधि को बढ़ाकर तीन साल करना व्यावहारिक प्रतीत होता है।’ डेलायट के राजेश एच गांधी ने कहा कि अल्पावधि पूंजी लाभ कर के लिए शेयरों में निवेश को तीन साल तक बनाए रखने का विचार दीर्घावधि पूंजी लाभ कर लगाने से ज्यादा तार्किक लगता है। उन्होंने कहा, ‘दीर्घावधि पूंजी लाभ कर की दरें बढ़ाने से बाजार में ज्यादा उथल-पुथल हो सकती है। लेकिन शेयरधारिता अवधि बढ़ाने पर 15 फीसदी कर लगाने को लोग उतनी गंभीरता से नहीं लेंगे।’
हालांकि कुछ लोग इस प्रस्ताव पर सहमत नहीं हैं। डाल्टन कैपिटल एडवाइजर्स के प्रबंध निदेशक यूआर भट्ट ने कहा, ‘अगर अल्पावधि पूंजी लाभ कर की अवधि बढ़ाई जाती है तो इससे बजट से लेकर 1 अप्रैल तक बाजार में उथल-पुथल देखी जा सकती है। एक साल तक शेयर में निवेश करने वाले लोगों के लिए यह उतना आकर्षक नहीं रहेगा। ऐसे में वे इन शेयरों से अपना निवेश निकाल सकते हैं।’ शेयर बाजार के कुछ अन्य भागीदारों का कहना है कि इन बदलावों के लिए यह सही समय हो सकता है क्योंकि बाजार ही अर्थव्यवस्था का वह हिस्सा है जो बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। उनका कहना है कि दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर को वापस लाने या फिर अल्पकालिक पूंजीगत लाभ को बढ़ाने का फैसला तभी किया जा सकता है जब प्रतिभूति लेनदेन कर को हटाया जाए। अन्यथा कर का बोझ बहुत अधिक होगा।
ब्रोकर समूहों ने प्रतिभूति लेनदेन कर को समाप्त करने की मांग एक बार फिर दोहराई है। उनका कहना है कि इससे तरलता में सुधार होगा। साथ ही यह शेयर बाजारों के लिए भी अच्छा रहेगा। उनका कहना है कि कारोबारियों पर यह कर दोहरे कराधान की तरह है क्योंकि निवेशकों के उलट उनके कर का आंकलन कारोबारी आय के तहत होता है। इसमें शेयरों पर हुए लाभ पर 30 फीसदी की दर से कर लगता है और साथ ही अधिभार और उपकर भी चुकाना पड़ता है। इसके अलावा उन्हें 30 फीसदी कर के अलावा प्रतिभूति लेनदेन कर भी देना होता है।
एआईएफ उद्योग ने भी सरकार के समक्ष अपनी मांगें रखी हैं। इस क्षेत्र की कंपनियां प्रबंधन फीस और घरेलू एआईएफ पर विदेशी निवशकों द्वारा किए गए खर्च के बारे में जीएसटी में स्पष्टता चाहती हैं। एआईएफ में विदेशी पैसों का प्रबंधन भारतीय संपत्ति प्रबंधन कंपनियां को जीएसटी में छूट प्राप्त नहीं है जिससे प्रबंधन की लागत में 18 फीसदी का इजाफा हो जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कंपनियां भारत आधारित फंड बनाने से परहेज कर सकती हैं। एआईएफ कंपनियों की मांग है कि निवेशकों को निवेश पर नुकसान को समायोजित करने की अनुमति होनी चाहिए।
वित्त कानून, 2015 के मुताबिक यूनिट धारक अपने नुकसान की भरपाई दूसरे फंड से हुए लाभ या प्राप्ति से नहीं कर सकते। पहली और दूसरी श्रेणी की एआईएफ कंपनियां अपने नुकसान को निवेशकों पर नहीं डाल सकती हैं बल्कि वे इसे फंड के स्तर पर अगले साल की आय में समायोजित कर सकती हैं। तीसरी क्षेणी की एआईएफ कंपनियों ने बाकी दो श्रेणियों की तरह पास थ्रू दर्जा देने की पुरानी मांग दोहराई है। सरकार ने पहली और दूसरी श्रेणी की कंपनियों को 2015 में यह सुविधा दी थी। यह दर्जा नहीं होने का मतलब है कि ऐसे फंडों से होने वाली आय पर फंड के स्तर पर कर लगाया जाएगा और कर का बोझ यूनिटधारकों पर नहीं थोपी जाएगी।

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