राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक के नाम पर मचा बवाल, सामने आईं गलतियां

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एलोपैथिक चिकित्सक नियुक्ति पाकर भी बेजा तरीके से निजी प्रैक्टिस में लगे रहे। पैरामेडिकल स्टाफ के सहारे स्वास्थ्य सेवाएं चलती रहीं।
नई दिल्ली, । राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक के नाम पर अभी बवाल मचा हुआ है। दरअसल यह सरकार की सही मंशा के गलत प्रस्तुतीकरण का परिणाम है। वास्तव में यह विश्व स्वास्थ्य संगठन के समग्र दृष्टिकोण का प्रायोगिक स्वरूप है जिसमें सारी चिकित्सा पद्धतियों की सामान्य कारगर औषधियों का समन्वित प्रयोग प्रस्तावित है। यहां गलती यह हुई है कि केवल आयुष चिकित्सकों को ऐलोपैथिक ब्रिज कोर्स करने की बात कही जा रही है, जबकि यह पाठ्यक्रम सबके लिए होना चाहिए। आयुर्वेद, होम्योपैथ, सिद्ध, यूनानी, ऐलोपैथी आदि सभी को एक दूसरे की सुविधाजनक प्रभावी दवाएं एवं विधियां जानने के लिए ब्रिज कोर्स किया जाना चाहिए। इससे सहजता होगी।
सरकार को उठाने होंगे कदम
उल्लेखनीय है आयुर्वेद की रत्ती, मिलीग्राम में बदलकर वैज्ञानिक ऐलोपैथी हो जाती है। एल्कोहलिक एक्सट्रेक्ट होम्योपैथी हो जाता है। ये वैज्ञानिक बातें यदि ऐलोपैथी के कथित स्वयंभू वैज्ञानिकों को अवैज्ञानिक लगती हैं तो निश्चय ही उनका विज्ञान से कोई संबंध नहीं है। आखिर हो भी कैसे। वास्तविक वैज्ञानिकों की उपलब्धियों के वे दुकानदार ही तो हैं। बहरहाल मैं सरकार के ब्रिज कोर्स बनाने की राय से इत्तेफाक नहीं रखता, लेकिन सरकार यदि वास्तव में आयुर्वेद का भला चाहती है तो उसे कुछ कदम उठाने होंगे।
मसलन वह स्वास्थ्य बजट में मात्र 25 फीसद बजट आयुष को दे तो यह काफी कारगर होगा। आयुर्वेद के सुश्रुत की शल्य विधा और नागाजरुन के रस विधा को आधुनिक ढांचा प्रदान किए जाने की दरकार है। सरकार शल्य और रसौषधियों को आयुर्वेद के लिए पेटेंट प्रदान करे। वन औषधियों से निर्मित आयुर्वेदिक योग को हर्बल के नाम से बाजारीकरण को प्रतिबंधित किया जाए। आयुर्वेद संस्थानों का उन्नयन किया जाए। अगर उपरोक्त बिन्दुओं पर अमल किया जाए तो चिकित्सा को उद्योग समझने वाले समूह पर अंकुश तो लगेगा ही देश के स्वास्थ्य तंत्र का कायाकल्प हो जाएगा।
जनता पार्टी की सरकार में सफलता से चली व्यवस्था
जिक्र करना जरूरी है कि 1977 में जनता पार्टी की तत्कालीन सरकार ने स्वास्थ्य सेवा में सुधार और डॉक्टरों की कमी से निपटने के लिए बिना किसी ब्रिज कोर्स के आयुर्वेद ग्रेजुएट्स को सह चिकित्साधिकारी के रूप में तैनात करने का फैसला किया था। उस वक्त यह व्यवस्था सफलता से चल निकली थी। मगर 1980 में फिर कांग्रेस की सरकार आने के बाद इंडियन मेडिकल एसोसिएशन यानी आइएमए के विरोध के सामने झुकते हुए उसने पहले से नियुक्त आयुर्वेदिक डॉक्टरों को आयुर्वेद चिकित्सालयों में नियोजित कर दिया था। जहां आवश्यक दवाओं और संसाधनों के अभाव में ये चिकित्सक निष्क्रिय साबित हुए। इधर एलोपैथिक चिकित्सक नियुक्ति पाकर भी बेजा तरीके से निजी प्रैक्टिस में लगे रहे। पैरामेडिकल स्टाफ के सहारे स्वास्थ्य सेवाएं चलती रहीं। फिर सरकार ने संविदा यानी ठेका व्यवस्था लागू कर दिया।
आज सभी सरकारी और निजी अस्पतालों की रीढ़ आयुष चिकित्सक या आयुष इंटर्न बने हुए हैं। सवाल है कि फिर ये ब्रिज कोर्स और आइएमए के विरोध का उपक्रम क्यों? आयुर्वेद की दवाओं की प्रमाणिकता की जब बात आती है तो आंकड़े यानी डेटा मांगे जाते हैं। विद्वान भी डेटा के अभाव में आयुर्वेद की दवाओं का प्रयोग नहीं करना चाहते हैं,जबकि आज हजारों वैद्य, लाखों लोगों को स्वास्थ्य लाभ दे रहे हैं। डेटा के चक्कर में आयुर्वेद ग्रेजुएट में आत्मविश्वास भी विकसित नहीं हो पा रहा है। आयुर्वेद स्नातकों को अपने प्रयोग में कम से कम 40 शास्त्रीय दवाओं को स्थान देना चाहिए। आयुर्वेद डॉक्टरों के शास्त्रीय दवाओं के प्रयोग न करने के कारण ही नीति नियामक संस्थाएं व एलोपैथिक लोग आयुर्वेद को ब्हल्के में लेते हैं। इससे यही संदेश जाता है कि आयुर्वेद में प्रभावी दवाओं का अभाव है।

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