सीजेआई को पत्रः हम बहुत दुःख और चिंता के साथ यह लिख रहे हैं…

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भारत के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों जे चेलमेशवार, रंजन गोगोई, मदन लोकुर और कुरियन जोसफ ने मीडिया के सामने आकर सीजेआई की प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल उठाए। शुक्रवार को उन्होंने कहा कि हमने इस मुद्दे पर सीजेआई दीपक मिश्रा से बात की, लेकिन उन्होंने हमारी बात नहीं सुनी। पढ़ें जजों की ओर से सीजेआई को लिखा गया खत।
प्रिय मुख्य न्यायाधीश,
बहुत दुःख और चिंता के साथ हमने यह उचित समझा कि आपको पत्र लिखकर कुछ न्यायिक आदेशों को रेखांकित किया जाए जिनसे न्याय वितरण प्रणाली का कार्य न सिर्फ विपरीत रूप से प्रभावित हुआ है, बल्कि हाईकोर्टों की आजादी के प्रभावित होने के अतिरिक्त सीजेआई के प्रशासनिक कार्य को भी प्रभावित किया है।
कोलकाता, बंबई और मद्रास हाईकोर्ट के स्थापित होने के बाद कुछ परंपराएं और रूढ़ियां कायम हुई थीं और उन्हें लगभग एक शताब्दी के बाद बने सुप्रीमकोर्ट ने भी अपनाया है। इनमें से एक परंपरा यह है कि सीजेआई रोस्टर (जजों में केस और बेंच वितरण) के मास्टर होते हैं। इसके तहत सीजेआई केसों का वितरण करते हैं। लेकिन यह सीजेआई को अन्य साथी जजों पर कोई कानूनी वरिष्ठता प्राधिकार नहीं देता।
देश की न्यायपालिका में यह स्थापित है कि मुख्य न्यायाधीश बराबरों में सबसे ऊपर हैं। न इससे ज्यादा और न इससे कम। सभी जज रोस्टर के मुताबिक केस सुनने के लिए बाध्य हैं।
इन नियमों के खिलाफ जाना न सिर्फ नाखुशी की बात होगी बल्कि अवांछनीय भी होगा और इससे पूरे कोर्ट की सत्यनिष्ठा पर संदेह पैदा होंगे। जो इससे हंगामा पैदा होगा उसकी तो बात करने की जरूरत नहीं हैं।
यह कहते हुए हमें दुख है कि पिछले दिनों दो नियम जिनकी बात हुई है उनका पालन नहीं किया जा रहा है। ऐसे उदाहरण हैं कि देश तथा संस्थान के लिए दूरगामी प्रभाव वाले केस मुख्य न्यायाधीश द्वारा उनकी पसंद के जजों को दे दिए गए। जबकि इसके पीछे कोई तर्कशील वजह नहीं थी। इससे हर हालत में बचाना चाहिए।
हम संस्थान की फजीहत से बचने के लिए इन केसों की विस्तार नहीं दे रहे हैं लेकिन यह जरूर कहते हैं कि इस तरह के फैसलों से संस्थान की छवि को पहले ही कुछ हद तक क्षति पहुंच गई है।
इस संदर्भ में हम यह उचित समझते हैं कि आपको 27 अक्तूबर 2017 के केस (आरपी लूथरा बनाम भारत सरकार) में पास आदेश के बारे में बताया जाए। इस आदेश में था कि व्यापक जनहित में एमओपी (उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति का ज्ञापन) को अंतिम रूप देने में कोई देरी न की जाए। जब एमओपी संविधान पीठ (2016, इस पीठ में जस्टिस चेलमेश्वर और जोसेफ थे) के फैसले को विषय था तो यह समझना काफी मुश्किल हो रहा है कि कोई दूसरी बेंच इसे कैसे देख सकती है।
इसके अलावा संविधान पीठ के फैसले के बाद आपको मिलाकर कोलेजियम के पांच जजों ने एमओपी पर विचार कर उसे अंतिम रूप दिया और तत्कालीन सीजेआई ने उसे मार्च 2017 में भारत सरकार को भेजा।
सरकार ने इसका कोई जवाब नहीं दिया और सरकार की इस चुप्पी को देखते हुए यह माना जा सकता था कि सरकार ने कोलेजियम का एमओपी स्वीकार कर लिया है। इसके बाद इसलिए बेंच के लिए ऐसा कोई अवसर नहीं था कि वह एमओपी को अंतिम रूप देने के लिए अपनी टिप्पणियां करे। या यह मुद्दा अनंत काल के लिए लटका रहे।
चार जुलाई 2017 को सात जजों की बेंच ने जस्टिस कर्णन के मामले में फैसला दिया। इस मामले में हममें से दो जजों ने टिप्पणियां की कि जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को फिर से देखे जाने की जरूरत है और कोई ऐसा तंत्र बनाया जाए जिसमें जजों को सुधारने के लिए महाभियोग से कम की सजा का प्रावधान हो। इस दौरान सातों में से किसी भी जज ने एमओपी के बारे में कोई शब्द नहीं कहा था।
इस बारे में एमओपी से जुड़ा कोई भी मुद्दा मुख्य न्यायाधीश और फुल कोर्ट की बैठक में उठाया जाना चाहिए था। यदि इसे न्यायिक पक्ष में उठाया जाना ही था, तो कम से कम इसे संविधान पीठ के समक्ष उठाया जाना चाहिए था।
यह घटनाक्रम बहुत गंभीर है। सीजेआई इस बात से बाध्य हैं कि वे स्थिति को दुरुस्त करें और कोलेजियम के अन्य सदस्यों के साथ विचार कर उचित सुधारात्मक कदम उठाएं। बाद में यदि जरूरत हो तो अन्य जजों से भी बात करें।
एक बार आरपी लूथरा केस का मुद्दा निपट जाए तो हम आपको अन्य केस भी देंगे जिनमें आदेश पारित किए गए हैं और उनसे निपटना जरूरी है।

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