सुप्रीम कोर्टः आधार की अनिवार्यता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई आज, जाने 10 बड़ी बातें

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आधार पहचान के खिलाफ कानूनी चुनौती देने के मामले में दाखिल याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच आज आखिरी चरण की सुनवाई करने जा रही है। आधार के खिलाफ साल 2012 में याचिका दायकर निजता के मौलिक अधिकार हनन का आरोप लगाया गया है। इसके साथ ही, पार्लियामेंट की तरफ से साल 2016 में पास किए गए आधार कानून को भी चुनौती दी गई है जिसमें किसी भी सरकारी योजनाओं और सेवाओं के लिए आधार को अनिवार्य करने का प्रावधान किया गया है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा इस बेंच की अध्यक्षता कर रहे हैं। आइये केस से जुड़ी दस खास बातें जानते हैं-
1-आधार पर सुप्रीम कोर्ट पिछले पांच वर्षों से सुनवाई कर रहा है। साल 2012 में 20 से 25 करोड़ लोगों ने आधार पर अपना पंजीकरण कराया था जो अब 119 करोड़ तक जा पहुंचा है। इसमें फिंगर प्रिंट और आंखों का स्कैन किया जाता है और एक यूनिक आईडी नंबर दिया जाता है।
2-यह केस इसलिए लिया गया क्योंकि केन्द्र सरकार ने लोगों की निजता के मौलिक अधिकार पर सवाल उठाए थे। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 9 सदस्यीय बेंच का गठन किया था ताकि वह ये फैसला करे कि निजता मौलिक अधिकार है या नहीं।
3-मौलिक अधिकार पर फैसला आने के बाद चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ का गठन किया ताकि वो यह फैसला करे कि कानून समेत आधार कार्यक्रम का कोई भी पहलू क्या मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।
4-पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ में अन्य जज हैं- जस्टिस एके सीकरी, एम खांडविलकर, डीवाई चंद्रचूड़ और अशोक भूषण।
5-दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अदालत के सामने जो चिंताएं रखी गई है उसके ऊपर जल्द से जल्द सुनवाई पूरी हो जानी चाहिए। इससे आम नागरिकों, केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच चीजें साफ हो पाएंगी।
6-आलोचकों का यह तर्क है कि आधार से सरकार और प्राइवेट संस्थाओं को किसी व्यक्ति के बारे में पूरी जनकारी मिल जाएगी क्योंकि यह किसी व्यक्ति के बारे में व्यापक प्रोफाइल की जानकारी देता है। जैसे- किसी व्यक्ति का खर्च, संपत्ति और अन्य आंकड़े।
7-आधार को आम नागरिकों के डिजिटल पहचान के लिए लाया गया था जिसे वह सरकारी सेवाओं के लिए इस्तेमाल कर सकेंगे। इस प्रोजेक्ट एग्जक्यूटिव ऑर्डर के जरिए लाया गया और एच्छिक था।
8-सरकार ने साल 2013 में कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार को अनिवार्य करने से रोका था। एनडीए सरकार ने इसके बाद संसद से साल 2016 में कानून बनाकर इसे अनिवार्य करने की इजाजत ले ली। इससे आधार की अनिवार्यता को लेकर व्यापक अधिकार सरकार को मिल गया है।
9-आधार की शुरुआत यूपीए सरकार ने साल 2009-10 में की थी ताकि सरकार के सब्सिडी बिल और गृह मंत्रालय से संचालित नेशनल पोपुलेशन रजिस्टर से डुप्लीकेसी को खत्म किया जा सके।
10-साल 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद सरकार ने जनसंख्या रजिस्ट्रेशन को होल्ड कर अपना सारा ध्यान आधार के पीछे केन्द्रित किया।

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