चुनाव के लिए गोलबंद होने लगी बिहार की राजनीति, सहारा तलाश रहे नेता

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बिहार में अब लोकसभा चुनाव के लिए गोलबंदी शुरू हो गई है। नेता भी अब सहारे की तलाश में जुट गए हैं। महागठबंधन के बाद दो ही मुख्य धड़े दिख रहे एक भाजपा-जदयू तो दूसरी राजद-कांग्रेस।
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पटना । लोकसभा चुनाव के दिन करीब आने लगे तो बिहार में सियासत का मौसम भी बदलने लगा है। सियासी दोस्तों और दुश्मनों के प्रति आकर्षण-विकर्षण घटने-बढऩे लगा है। सियासत के चार बड़े खिलाड़ी दो खेमों में पहले से ही विभक्त हो चुके हैं।महागठबंधन की गांठ खुलने के बाद भाजपा-जदयू एक तरफ तो राजद-कांग्रेस दूसरी तरफ। छोटे दल इनकी परिक्रमा और अपने वजन के हिसाब से मेल-मुलाकात की कवायद में जुट गए हैं। क्षेत्र के फार्मूले के मुताबिक इधर-उधर का रास्ता नापा जा रहा है। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी और उनके करीबी विधायकों के पैंतरे तो पुराने हो गए। अब अन्य छोटे-बड़े नेताओं ने भी दांव-पेच का खेल शुरू कर दिया है। झुंड से बिछुड़ चुके विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी के बोल-बचन बता रहे हैं कि उनके इरादे कुछ और हैं। नीतीश कुमार की नीतियां उन्हें तभी तक अच्छी लग रही थी, जबतक वह स्पीकर थे।इसी तरह राजद के असंबद्ध सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव को लोकसभा चुनाव के एलान से पहले ही किसी मजबूत सहारे की तलाश है तो हम नेता वृषिण पटेल की लालू प्रसाद से मुलाकात की बात भी बेवजह नहीं है। रांची की सीबीआई अदालत में जाकर राजद प्रमुख से मिलने के लिए घंटों इंतजार कोई यूं नहीं कर सकता। केंद्रीय कैबिनेट से बाहर रहना भाजपा के वरिष्ठ नेता और अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा को रास नहीं आया तो पैंतरे लेने शुरू कर दिए। कभी लालू-राबड़ी से मुलाकात तो कभी राहुल गांधी की तारीफ। इस साल चूड़ा-दही की राजनीति के जरिए भी शत्रु ने अपने समर्थकों को संकेत कर दिया कि उनकी राह अब भाजपा कार्यालय से होकर नहीं गुजरती है।भाजपा के एक और सांसद कीर्ति झा आजाद की कीर्ति भी कोने तक सीमित नहीं रही। कांग्रेस में चर्चाएं तेज हैं कि वह उनके होने जा रहे हैं। कांग्र्रेसियों में कयास तो सांसद पप्पू यादव को लेकर भी लगाए जा रहे हैं। पप्पू की पत्नी रंजीता रंजन अभी कांग्र्रेस की सांसद भी हैं। बहरहाल, पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है कि अगले लोकसभा चुनाव में बिहार में आमने-सामने की ही टक्कर होने जा रही है। तीसरी शक्ति के लिए यहां कोई संभावना नहीं है। यही कारण है कि वीरचंद पटेल पथ एवं सदाकत आश्रम में चहल-पहल कुछ ज्यादा ही दिखने लगी है। छोटे दल और नेता अभी से सहारे की तलाश में जुट गए हैं।

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