गुजरात के बाद बिहार में शिफ्ट हुई देश की राजनीति, नेताओं के बयान से सियासी उफान

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ठंड के मौसम में तीन राज्यों में चुनाव के एलान के बावजूद बिहार की राजनीति सबसे ज्यादा गर्म है। यहां नेताओं के बड़े-बड़े बयानों से सियासी उफान है। केंद्रीय नेताओं के दौरे बढ़ गए हैं।
पटना । तीन राज्यों में चुनाव के एलान के बावजूद बिहार की राजनीति सबसे ज्यादा गर्म है। मौसम बेहद ठंडा है, लेकिन नेताओं के वाणी-व्यवहार से सियासी पारा तेजी से चढ़ रहा है। दोनों गठबंधनों की ओर से बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। बाहर से बयान और अंदर से तोड़-फोड़ के नुस्खे भी आजमाए जा रहे हैं।
गुजरात चुनाव के बाद माना जा रहा था कि देश की राजनीति का मुख्य फोकस फरवरी में होने जा रहे पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों पर होगा। किंतु बिहार में महागठबंधन में टूट, चारा घोटाले में राजद प्रमुख लालू प्रसाद को जेल और कांग्रेस के करीब दर्जन भर विधायकों की निष्ठा पर उठते सवाल ने राजनीति की दिशा बदल दी है। प्रहार-प्रतिकार के तल्ख तेवर ने चुनावी नारे और एजेंडे तय करने से पहले दोनों तरफ की बेचैनी बढ़ा दी है। केंद्रीय नेताओं के दौरे बढ़ गए हैं तो स्थानीय नेताओं की सक्रियता।
बिहार भाजपा के प्रभारी भूपेंद्र यादव के दौरे से एक दिन पहले मिशन-2019 की तैयारियों में गंभीरता से जुटी भाजपा ने राजद-कांग्रेस में टूट का दावा किया तो कांग्रेस भी भाजपा के आधा दर्जन सांसदों की निष्ठा-नीयत को कठघरे में खड़ा करने से पीछे नहीं रही। भाजपा नेता मंगल पांडेय के दावे का जवाब देते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रेमचंद मिश्रा ने भी भाजपा सांसदों के कांग्रेस के संपर्क में होने के दावा किया।कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी के सियासी पैंतरे ने कांग्रेस को पहले से ही परेशान कर रखा है। इतना कि कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष कौकब कादरी को 18 जनवरी से शुरू होने वाली आमंत्रण यात्रा को स्थगित करना पड़ गया।
बिहार में राजद के भरोसे चल रही कांग्रेस को लालू प्रसाद के जेल जाने से भी बड़ा झटका लगा है। राज्यसभा और विधान परिषद का चुनाव सिर पर है। ऐसे में पार्टी की एकता पर खतरा साफ दिख रहा है। कांग्रेस विधायकों की एकता बहुत हद तक तेजस्वी यादव की सक्रियता पर निर्भर कर रही है। राजद जितना एकजुट रहेगा, कांग्रेस भी उतनी ही सुरक्षित रह सकती है।चुनाव नजदीक आ रहे हैं तो क्षेत्र के सामाजिक समीकरणों के हिसाब से कतिपय सांसदों एवं विधायकों के राग भी बदलने लगे हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की विकास समीक्षा यात्रा के दौरान राजद-कांग्र्रेस के कुछ नेताओं ने सत्ता के स्वर में गाना शुरू किया तो दलित राजनीति के नाम पर जदयू के कुछ पुराने धुरंधरों को लालू राग अच्छा लगने लगा है।
वक्त की नजाकत को देखते हुए पूर्व मंत्री श्याम रजक ने तो चुप्पी साध ली है लेकिन पूर्व स्पीकर उदय नारायण चौधरी के कदम धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं। हम के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व सीएम जीतनराम मांझी अभी मंझधार में हैं। कभी इधर तो कभी उधर। उनके रास्ते दोनों तरफ खुले दिख रहे हैं।

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