120 साल पुराने कावेरी जल विवाद पर आज आएगा सुप्रीम कोर्ट का फैसला

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तमिलनाडु, कर्नाटक, पुडुच्चेरी और केरल के बीच कई दशकों से चल रहे कावेरी जल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार (16 फ़रवरी) को फ़ैसला सुना सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस जस्टिस अमिताभ राय और जस्टिस खानविलकर की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। संबंधित राज्यों के बीच कावेरी नदी के पानी को लेकर विवाद है। कावेरी जल विवाद पर कावेरी वाटर डिस्प्यूट ट्राइब्यूनल (सीडब्ल्यूडीटी) ने साल 2007 में फैसला दिया था। तमिलनाडु और कर्नाटक दोनों ने ही ट्राइब्यूनल के फैसले के खिलाफ अपील की थी।
कर्नाटक में इसी साल विधान सभा चुनाव होने हैं। इस फैसले का असर दोनों राज्यों के सियासत पर पड़ना तय है। कर्नाटक के किसान सिंचाई के लिए कावेरी नदी के पानी पर निर्भर रहते हैं। राजधानी बेंगलुरु में पीने का पानी भी कावेरी से ही आता है। कावेरी नदी जल विवाद को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु में हिंसक विरोध प्रदर्शन भी हो चुके हैं। कर्नाटक में हाल ही में विभिन्न संगठनों ने इस मुद्दे को लेकर राज्यव्यापी हड़ताल बुलाई थी। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है। वहीं तमिलनाडु में एआईएडीएमके की सरकार है। अगर अदालत का फैसला लोगों की अपेक्षाओं के अनरूप नहीं रहा तो राज्य सरकारों को जनता के गुस्से का शिकार होना पड़ सकता है। दोनों राज्यों को
कावेरी वाटर डिस्प्यूट ट्राइब्यूनल (सीडब्ल्यूडीटी) का फैसला
केंद्र सरकार ने कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच विवाद सुलझाने के लिए 1990 में कावेरी वाटर डिस्प्यूट ट्राइब्यूनल का गठन किया था। इस ट्राइब्यूनल ने पाँच फ़रवरी 2007 को फैसला सुनाया था। ट्राइब्यूनल ने अपने फैसले में कावेरी नदी के 740 टीएमसी पानी को चार राज्यों को बीच बांटा था। ट्राइब्यूनल ने कर्नाटक को 419 टीएमसी पानी और कर्नाटक को 270 टीएमसी पानी, 30 टीएमसी केरल को और सात टीएमसी पानी पुडुच्चेरी को देने का फैसला दिया था। ट्राइब्यूनरल ने कावेरी नदी का 14 टीएमसी पानी पर्यावरण संरक्षण के लिए इस्तेमाल करने का आदेश दिया था।
ट्राइब्यूनल ने कर्नाटक को मानसून सीज़न (जून से मई) के बीच 192 टीएमसी अतिरिक्त पानी छोड़ने का आदेश दिया था। ट्राइब्यूनल ने कर्नाटक को तमिलनाडु के बिलिगंडलु वाटर स्टेसन के लिए जून में 10 टीएमसी, जुलाई में 34 टीएमसी, अगस्त में 50 टीएमसी, सितंबर में 40 टीएमसी, अक्टूबर में 22 टीएमसी, नवंबर में 15 टीएमसी, दिसंबर में आठ टीएमसी, जनवरी में तीन टीएमसी और फ़रवरी से मई तक हर महीने 2.5 टीएमसी पानी छोड़ने के लिए कहा था।
ट्राइब्यूनल ने अपने फैसले में कहा था कि जिस साल कम बारिश हो उस साल सभी राज्यों के लिए निर्धारित पानी की मात्रा उसी अनुपात में कम की जा सकती है। कर्नाटक ने ट्राइब्यूनल के फैसले का विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट में 312 टीएमसी पानी दिए जाने की माँग की। तमिलनाडु ने भी सुप्रीम कोर्ट में जाकर अपना पक्ष रखा। सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2017 में कावेरी जल विवाद पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था।
कावेरी जल विवाद का इतिहास
कावेरी नदी के पानी को लेकर विवाद करीब 120 साल पुराना है। तमिलनाडु ने 1924 में मेटूर बांध बनाया था। दोनों राज्यों के बीच कावेरी नदी के जल बंटवारे को लेकर पहले 50 साल तक अनुबंध था। ऐतिहासिक रुप से तमिलनाडु को कावेरी नदी ाक 602 टीएमसी और कर्नाटक को 138 टीएमसी पानी मिलता था। दोनों राज्यों के बीच हुए समझौते की मियाद 1974 में पूरी हो गई। समझौता की मियाद खत्म होने के बाद कर्नाटक ने कावेरी नदी घाटी में बांध बनाने शुरू कर दिए। कर्नाटक का दावा है कि समझौते की वजह से कावेरी नदी घाटी में खेती का विकास नहीं हो सका।
कावेरी नदी जल विवाद पर हुई हिंसा
पिछले दो दशकों में कई बार कावेरी नदी के पानी को लेकर कर्नाटक में हिंसक प्रदर्शन हो चुके हैं। 1990-191 में खराब मानसून रहा जिससे औसत से 35 प्रतिशत कम बारिश हुई। राज्य भर में तमिलनाडु को कावेरी नदी का पानी दिए जाने का हिंसक विरोध हुआ। इस हिंसा में 18 लोगों की मौत हो गई थी।

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