तेजस्वी यादव के दम-खम की परीक्षा लेगा यह उपचुनाव

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राज्यसभा की 6 सीटों और उपचुनाव की तीन सीटों के लिए होने वाला चुनाव नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के लिए परीक्षा की तरह है। सभी सीटों पर प्रत्याशियों की जीत का दारोमदार उन्हीं पर है।
पटना। राज्यसभा की छह सीटों पर संभावित घमासान से पहले हम प्रमुख जीतनराम मांझी को राजग से तोड़कर अपने पाले में लाने वाले नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के लिए उपचुनाव भी अग्नि-परीक्षा से कम नहीं होगी। उपचुनाव की तीन में से दो सीटें राजद एवं एक सीट कांग्रेस खाते की है।
सभी सीटों पर महागठबंधन प्रत्याशियों की जीत का दारोमदार तेजस्वी पर है। अगर वह अपने दम पर सफल हो जाते हैं तो सियासत में उनका कद बढऩा तय है। असफलता की स्थिति में आगे की राह बड़ी मुश्किल हो सकती है।
अररिया लोकसभा एवं जहानाबाद तथा भभुआ विधानसभा सीटों के लिए 11 मार्च को होने वाला उपचुनाव मांझी और तेजस्वी की नई दोस्ती की पहली परीक्षा होगी। राजग में उपेक्षा से खफा चल रहे मांझी के गठबंधन बदलने से लालू प्रसाद की अनुपस्थिति में तेजस्वी को नि:संदेह नई ऊर्जा मिली है।
साथ ही मांझी की पतवार से राजद को सियासी मजबूती भी मिली है। सामाजिक समीकरण के हिसाब से दोनों नेताओं के मिलन से महागठबंधन के वोटों का इजाफा भी हो सकता है।
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सबसे बड़ी बात कि उपचुनाव की जीत-हार से 12 दिन बाद होने वाले राज्यसभा चुनाव की भी पटकथा लिखी जाएगी। तेजस्वी-मांझी की जोड़ी अगर उपचुनाव में कामयाब हो गई तो अपने ही लोगों के चक्रव्यूह में घिरी राजद की प्रमुख सहयोगी कांग्रेस को राज्यसभा चुनाव से पहले राहत मिल सकती है, क्योंकि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी की कोशिशों की कामयाबी बहुत हद तक उपचुनाव के नतीजे पर भी निर्भर करेगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गठबंधन की विजय-पराजय से कांग्रेस में टूट-फूट या एकजुटता के भाव को बढ़ावा मिलेगा। गठबंधन जीत गया तो कांग्र्रेस के बागी विधायकों के तेवर ठंडे पड़ सकते हैं। अगर हार गया तो बगावत के स्वर तेज हो सकते हैं। पराजय का असर कांग्रेस के साथ राजद विधायकों की एकता पर भी पडऩा तय माना जा रहा है। आम चुनाव के पहले सत्तारूढ़ दलों की ओर उनका झुकाव बढ़ सकता है।
कांग्रेस को भी तेजस्वी का सहारा
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राज्यसभा चुनाव में सत्ता पक्ष के निशाने पर मुख्य रूप से कांग्रेस के विधायक हैं। अशोक चौधरी के दलबदल के बाद हमलावर तेवर के कारण कांग्रेस के पास वेट एंड वॉच की स्थिति में रहने के अलावा और कोई चारा नहीं दिख रहा है। कांग्रेस के 27 में से कई विधायकों ने बागी रुख अख्तियार कर रखा है।
ऐसे में कांग्रेस के कर्णधारों को एकमात्र तेजस्वी के सहारे से उम्मीद है और कांग्रेस की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए तेजस्वी यादव को उपचुनाव में जीत की दरकार है।
यही कारण है कि संसदीय चुनाव से पहले दोनों गठबंधनों ने तोडफ़ोड़ के जरिए सियासी प्रदर्शन को प्रतिष्ठा की लड़ाई में तब्दील कर दिया है। विधानमंडल के बजट सत्र के बावजूद राजद का पूरा कुनबा उपचुनाव वाली सीटों पर पसीना बहा रहा है।

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