आंध्र प्रदेश की राजनीति में ‘विलन’ बीजेपी की राह नहीं होगी आसान

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फाइल फोटो: चंद्रबाबू नायडू और पीएम मोदी
हैदराबाद
तेलगू देशम पार्टी के मंत्रियों ने गुरुवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ने हालांकि यह कदम बेहद सोच समझकर उठाया है लेकिन इसने उन्हें राजनीतिक दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। राज्य में यदि दोनों ही दलों का गठबंधन टूटता है तो उन्हें नए पार्टनर तलाशने होंगे। इससे वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले आंध्र प्रदेश में एक नया चुनावी परिदृश्य निकलकर सामने आएगा।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हालांकि पूरे देश में बीजेपी लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रही है लेकिन आंध्र प्रदेश में उसे अकेले दम पर जनाधार बढ़ाने में कड़ी मशक्कत का सामना करना पड़ेगा। बीजेपी सूत्रों ने बताया कि पार्टी के अंदर कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने टीडीपी के साथ गठजोड़ का तीखा विरोध किया है। इसमें आरएसएस से आए एमएलए सोमा वीराराजू और कांग्रेस से बीजेपी में आए नेता भी शामिल है29 बार पीएम मोदी से मदद मांगने दिल्ली गया, सब बेकार: चंद्रबाबू नायड न सबके बावजूद अपने दम पर चुनाव में वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव की दो सीटों और विधानसभा की चार सीटों के आंकड़े को और बढ़ाने में राज्य बीजेपी को काफी मशक्कत करनी होगी। अविविभाजित आंध्र प्रदेश में बीजेपी कभी भी अपने दम पर खाता नहीं खोल पाई थी। टीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस दोनों ही इस बार विशेष राज्य को लेकर चल रहे पूरे घटनाक्रम में बीजेपी को ‘विलन’ के रूप में दर्शा रही हैं। ऐसे में बीजेपी के लिए आंध्र प्रदेश के मतदाताओं का दिल जीतना काफी कठिन होगा।आंध्र प्रदेश: TDP सरकार से BJP के दो मंत्रियों ने दिया इस्तीफबीजेपी के साथ एक और मुश्किल यह है कि राज्य में उसके पास चंद्रबाबू नायडू या वाईएसआर कांग्रेस के मुखिया जगन मोहन रेड्डी की तरह कोई करिश्माई नेता नहीं है। राज्य में एम वेंकेया नायडू के अलावा बीजेपी के पास कोई ऐसा बड़ा नेता नहीं है जिसका व्यापक जनाधार हो लेकिन अब वह भी उपराष्ट्रपति हैं और राजनीति से उन्हें दूर रहना होगा।
नायडू के साथ छोड़ने के बाद क्या है बीजेपी के पास अब आंध्र में विकल्प?
बीजेपी अगर वाईएसआर कांग्रेस के साथ गठबंधन करने में कामयाब हो जाती है तो उसका भाग्य बदल सकता है। सूत्रों ने कहा, ‘लेकिन इस तरह का गठबंधन तभी कामयाब रहेगा जब गठबंधन के बाद भी दोनों का वोट बैंक उनके साथ बना रहे। अन्यथा अल्पसंख्यक जगन का साथ छोड़ सकते हैं और बीजेपी भी कुछ हिंदुओं के वोटों से हाथ धो सकती है।’बीजेपी के एक सूत्र ने कहा, ‘पार्टी के लिए सबसे अच्छा यह है कि वह टीडीपी के साथ बनी रहे।’ हालांकि वर्तमान परिस्थितियों में इसकी संभावना बेहद कम दिखाई दे रही है। इसी तरह की परिस्थिति का सामना कर रही टीडीपी अब ऐक्टर पवन कल्याण की पार्टी जन सेना के साथ हाथ मिला सकती है। टीडीपी वाम दलों से भी समर्थन मांग सकती है।

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