बड़ा सवाल: क्‍या एक बार फिर ठगे गए महाराष्‍ट्र के आदिवासी किसान?

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मुंबई
भीषण गर्मी में खेती-बाड़ी छोड़कर करीब 200 किलोमीटर लंबी यात्रा 6 दिन तक पैदल तय कर मुंबई पहुंचे महाराष्ट्र के करीब 30 हजार किसान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से लिखित आश्वासन मिलने के बाद अपने घरों को लौट गए। इन किसानों में बड़ी संख्या में आदिवासी भी शामिल थे। ये आदिवासी जंगल की उस जमीन के मालिकाना हक के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं जिस पर वे दशकों से रह रहे हैं और वहीं पर खेती कर अपनी आजीविका चलाते हैं।महाराष्ट्र सरकार ने आश्वासन दिया है कि वन भूमि के मालिकाना हक के दावों पर 6 महीने में अंतिम फैसला किया जाएगा। साथ ही जिन किसानों को अपात्र करार दिया गया है, उनके दावे फिर जांचे जाएंगे। जिन किसानों को कम जमीन दी गई है, उन्हें 2006 से पहले जितनी जमीन दी जाएगी। हालांकि विशेषज्ञ इस सरकारी आश्वासन से सहमत नहीं हैं। उन्हें लगता है कि किसान एक बार फिर से ठगे गए हैं।सर्वहारा जन आंदोलन की कार्यकर्ता उलका महाजन के मुताबिक वन अधिकार कानून के इतिहास पर गौर करें तो आदिवासियों को पहले भी यही आश्वासन कई बार दिया जा चुका है लेकिन सही तरीके से क्रियान्वयन नहीं होने के कारण उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ। बता दें, इसी कानून के बनने के बाद आदिवासी उस जमीन के मालिकाना हक के लिए हकदार हो गए जिस पर वे कई पीढ़ियों से खेती करते आए हैं।
वर्ष 2011 में भी मुंबई आए थे आदिवासी
उन्होंने बताया कि वर्ष 2011 में भी रायगढ़, नासिक, धूले और राज्य के अन्य हिस्सों से बड़ी संख्या में आदिवासी मुंबई आए थे। उस समय कांग्रेस सरकार सत्ता में थी और पृथ्वीराज चव्हाण मुख्यमंत्री थे। उन्होंने भी आदिवासियों से उसी तरीके के वादे किए थे जैसा कि वर्तमान सीएम फडणवीस ने किए हैं। यह वादा था कि आदिवासियों को व्यक्तिगत और समुदाय के स्तर पर जंगल के जमीन का स्वामित्व मिलेगा।मार्च 2016 में ऑल इंडिया किसान सभा के बैनर तले 1 लाख किसानों ने दो दिनों तक धरना दिया था। इस धरने के बाद भी फडणवीस सरकार ने वादा किया था कि आदिवासियों को जंगल की जमीन दी जाएगी। किसान सभा ने ही सोमवार को नासिक में प्रदर्शन का नेतृत्व किया था। वर्ष 2016 में ही मई के महीने में चव्हाण और फडणवीस के वादे नहीं पूरे करने पर बड़ी संख्या में आदिवासियों ने थाणे में ‘ताबूत रैली’ निकाली थी।
किसानों का जत्था किसानों की समस्या का कारण बना वन विभाग
महाजन कहती हैं कि राज्य में सरकारें बदलने के बाद भी इस बात की पारदर्शी तरीके से समीक्षा नहीं हो सकी कि आखिर क्यों वन अधिकार कानून का क्रियान्वयन सही तरीके से नहीं हो सका। यदि यह किया गया तो सरकारों को पता चलता कि वन विभाग लगातार और जानबूझकर आदिवासी किसानों को जमीन का मालिकाना हक देने में रोड़े डाल रहा है। वन विभाग के अधिकारी झुकने को तैयार नहीं हैं।
आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2008 में वन अधिकार कानून लागू होने के बाद महाराष्ट्र में आदिवासी किसानों के जमीन के मालिकाना हक के मात्र 31 फीसदी दावों को ही स्वीकृति दी गई। इसी दौरान 2,30,732 व्यक्तिगत दावों को खारिज कर दिया गया। वहीं सामुदायिक वन अधिकार के मात्र 18 फीसदी दावों को ही मंजूरी मिल पाई।
राजनेताओं ने एक बार फिर आदिवासियों को ठगा
महाजन बताती हैं कि वन अधिकार कानून के मुताबिक एक आदिवासी के पक्ष में दावों को निपटाने के लिए परिस्थितिजन्य और मौखिक साक्ष्य पर्याप्त हैं लेकिन वन विभाग के अधिकारी दस्तावेजों पर जोर देते हैं। कानून ग्राम सभा को व्यक्तिगत दावों को स्वीकार कर उसे निपटाने का अधिकार देता है लेकिन इसके क्रियान्वयन प्रक्रिया को वन विभाग के अधिकारी प्रभावित करते हैं। महाजन के मुताबिक वन अधिकार कानून के घटिया क्रियान्वयन की यही मुख्य वजह है और ऐसा लगता है कि राजनेताओं ने एक बार फिर आदिवासियों को ठगा है।

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