अयोध्या विवाद: कुछ ऐसे हुई सुप्रीम कोर्ट में पहले दिन सुनवाई, पढ़ें- पूरी बहस

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सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में हस्तक्षेप की अनुमति के लिये दायर सभी अंतरिम आवेदन बुधवार को अस्वीकार कर दिये। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस ए नजीब की तीन सदस्यीय विशेष खंडपीठ ने इस दलील को स्वीकार कर लिया कि भूमि विवाद के सभी मूल पक्षकारों को ही बहस करने की अनुमति दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि इस प्रकरण से असंबद्ध व्यक्तियों की हस्तक्षेप करने के लिये दायर सारी आर्जियां अस्वीकार की जानी चाहिए। आइए हम आपको बताते हैं कि बुधवार को इस मामले में कोर्ट रूम कैसे हुई बहसमुस्लिम पक्ष के वकील एजाज मकबूल : सभी दस्तावेज मिल गए हैं, एक पुस्तक नहीं दायर की गई है। लेकिन कोर्ट से आग्रह है कि कोर्ट इस मामले में घुसने वाले लोगों को नियंत्रित करे। जो पार्टी नहीं थे अब इस मामले में पक्ष बनना चाहते हैं। इनके कारण कोर्ट में इतनी भीड़ हो जाती है कि वकीलों का अंदर आना मुश्किल हो रहा है।यूपी सरकार के वकील तुषार मेहता : इस बात से सहमत हैं कि हस्तक्षेपकर्ताओं को आने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
राम जन्मभूमि मामला: SC ने हस्तक्षेप के लिये सारे आवेदन अस्वीकार किये
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा : तो क्या हम इस कार्रवाई को अभी शुरू करें। पीठ ने भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी से शुरुआत की। पूछा- आप का इस मामले से क्या संबध है। स्वामी : मैंने इस मामले में रिट याचिका दायर की थी और न्यायमूर्ति जे. चेल्मेश्वर की पीठ ने इस मामले में मुझे पक्ष बनने की अनुमति दी है।
न्यायमूर्ति भूषण : लेकिन इस केस में हम आपकी सुनवाई नहीं कर सकते। हम किसी भी हस्तक्षेप को अनुमति नहीं दे रहे हैं। आप कोई अपवाद नहीं है।
राजीव धवन : यदि स्वामी कोई बहस करेंगे तो हम उसका जवाब नहीं देंगे।
स्वामी : इन्होंने तो मेरे कुर्ता-पाजामा पहनकर कोर्ट आने पर भी आपत्ति दर्ज की है। अब मेरी याचिका पर आपत्ति कर रहे हैं।
एक हस्तक्षेपकर्ता : मी लार्ड, हम अयोध्या के 10,023 लोग हैं, जिन्होंने यह अर्जी दायर की है। हम चाहते हैं कि इसे कोर्ट में न निपटाकर कोई समझौता फार्मूला निकाला जाए। इस मामले में नोटिस जारी किया जाए। ये मामला कोर्ट में नहीं निपट सकता क्योंकि बनारस में कब्रिस्तान का मुद्दा मुस्लिम धर्म के दो मतों- शिया और सुन्नी के बीच का है। आजादी से पहले से केस लंबित है।
न्यायमूर्ति भूषण : तो आप जाइए लोगों को समझौते के लिए मनाइए, हम पक्षों को समझौते के लिए बैठने के लिए मजबूर नहीं कर सकते।
दीपक मिश्रा : आप हाईकोर्ट में पक्ष क्यों नहीं बने, हम नोटिस कैसे जारी कर सकते हैं। हम हस्तक्षेपकर्ताओं को नहीं सुनेंगे।
वकील एलआर सिंह : मेरी अर्जी है कि मैं कोर्ट की सहायता करना चाहता हूं। क्योंकि मेरे पास एक किताब है, जिसमें अयोध्या के बारे में शोध है और तथ्य हैं।
न्यायमूर्ति भूषण : तो आप रामलला विराजमान के वकील के. परासरन को क्यों नहीं मदद देते। वैसे जरूरत पड़ने पर कोई भी आपकी पुस्तक का रेफरेंस दे सकता है।
बहादुरशाह जफर के वंशज तूसी के वकील : मैं अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर का वंशज हूं और विवादित स्थल का मुतवल्ली हूं। मुझे इस मामले में पक्ष बनाया जाए।
प्रधान न्यायाधीश मिश्रा (हंसी को रोकते हुए) : आप तो खुद ही एक मुकदमा दायर कर सकते हैं। लेकिन इस केस में हम आपकों नहीं सुनेंगे।
32 प्रमुख व्यक्तियों के वकील सीयू सिंह : हम देश के प्रमुख नागरिक हैं और कोर्ट से अपील करते हैं कि कोर्ट इस मामले में फैसला न देकर एक बीच का रास्ता निकाले और विवादित स्थल पर एक अस्पताल बना दे, जिसमें सभी धर्मोँ के लोग इलाज करवाएं।
एजाज मकबूल : सिविल सूट में किसी हस्तक्षेपकर्ता को अनुमति नहीं देनी चाहिए।
प्रधान न्यायाधीश : हमने आपकी याचिका का संज्ञान ले लिया है और उसे भी अन्य हस्तक्षेप अर्जियों की देखा जाएगा। आप बीच का रास्ता कैसे निकालेंगे।
एक अर्जी पर वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद : हमने कुछ सामग्री और तथ्य एकत्र किए हैं। हम इनके जरिए कोर्ट की मदद करना चाहते हैं।
प्रधान न्यायाधीश : देखिए दोनों पक्ष आपका विरोध कर रहे हैं। यह दीवानी मुकदमा है, हमें दीवानी प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों का पालन करते हुए इसका निपटारा करना है। हम तीसरे पक्ष के सबूत स्वीकार नहीं कर सकते।
पुजारी अभिरामदास के वकील : मैंने ही 1949 में रामलला की मूर्ति मंदिर में रखी थी और मैं इस मामले में पक्ष हूं।
प्रधान न्यायाधीश : आप अपनी बात रख सकते हैं, जब हाईकोर्ट ने अपको सुना था तो हम भी सुनेंगे।
शिया वक्फ बोर्ड के वकील : हमें इसमें पार्टी बनाया जाए, क्योंकि 13 मार्च 1946 का अदालत का फैसला है कि विवादित मस्जिद शिया वक्फ की थी।
एजाज : आधी शताब्दी बीतने के बाद यह मामला कोर्ट में ला रहे हैं।
प्रधान न्यायाधीश : ठीक है, रजिस्ट्री को इसे दाखिल करने दीजिए देखते हैं क्या करना है।
पुणे पीस विश्वविद्यालय के वकील एएम खान : तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेएस खेहर ने बहुत अच्छा कहा था कि इस मामले को कोर्ट से बाहर सुलझाया जाए। हम इस मामले में एक समाधान लेकर आए हैं। विवादित स्थल पर एक सर्वधर्म समभाव अध्ययन केंद्र बना दिया जाए।
प्रधान न्यायाधीश : आपने उन्हें सुना।
एजाज : एक अच्छी स्पीच है।
तुषार मेहता : मैं इसे स्पीच कहकर छोटा नहीं करूंगा, लेकिन उन्हें हस्तक्षेप की अनुमति नहीं दी जा सकती।
प्रधान न्यायाधीश : आप अपने प्रयास शुरू रख सकते हैं। हम आपका समझौता मान सकते हैं बशर्ते पक्ष इसके लिए तैयार हों। यह समझौता लायक मुद्दा है, लेकिन आप बात तो करें।
खान : वे मुझे क्यों सुनेंगे।
प्रधान न्यायाधीश : जब आप ऐसा कहते हैं तो इसका मतलब साफ है कि मामले को कोर्ट में निपटाया जाए।

न्यायमूर्ति भूषण : डॉ. धवन, आप इस बात पर बहस करिए कि मामला बड़ी पीठ को भेजा जाए या नहीं। आप हमें संतुष्ट करिए कि मामला क्यों न बड़ी पीठ को भेजा जाए।

धवन : लेकिन मैं तो मुकदमे की तैयारी करके आया था। ऐसा है तो इसके लिए हमें समय दीजिए।

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