नया मोड़ : अयोध्या पर फैसले में फारूकी केस आधार बनेगा

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जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के मुकदमे में एक नया मोड़ आ गया है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला किया है कि पहले इस्माइल फारूकी केस (1994) में दी गई व्यवस्था में देखा जाएगा कि यह संवैधानिक रूप से सही थी या नहीं। यदि यह संविधान के मानकों पर सही नहीं पाया गया तो मामला बड़ी बेंच यानी सात जजों की पीठ को रेफर किया जाएगा। फारूकी केस में कहा गया था कि मुस्लिम धर्म में मस्जिद महत्वपूर्ण नहीं है। नमाज खुले में कहीं भी पढ़ी जा सकती है। यह तभी महत्वपूर्ण हो सकती है जब उस जगह का कोई खास महत्व हो।वहीं सरकार किसी भी धार्मिक स्थल का अधिग्रहण कर सकती है। चाहे वह चर्च, मंदिर और मस्जिद ही क्यों न हों। अब यदि कोर्ट ने इस मामले को बड़ी पीठ को रेफर किया तो मुकदमे का फैसला होने में और समय लग सकता है। मामले की अगली सुनवाई 23 मार्च को होगी। यह व्यवस्था देकर प्रधान न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्र, अशोक भूषण व अब्दुल नजीर की विशेष पीठ ने वकीलों से कहा कि वे इस मुद्दे पर बहस शुरू करें। हालांकि वकील तैयार नहीं थे क्योंकि पिछली सुनवाइयों में कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि वह विवादित स्थल के मालिकाना हक के फैसले के खिलाफ अपीलों पर ही सुनवाई करेगी। संविधान पीठ ने पहले क्या कहा है इससे मतलब नहीं है।

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