‘अगर ईरान ने परमाणु बम बनाया तो सऊदी अरब भी बनाएगा’

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सऊदी अरब ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान ने परमाणु बम बनाया तो वह भी ऐसा करेगा. यह बात सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने कही है.
क्राउन प्रिंस ने अमरीकी चैनल सीबीएस न्यूज़ से कहा, ”हमारा देश परमाणु हथियार नहीं रखना चाहता लेकिन इस बात में भी कोई शक़ नहीं कि अगर ईरान ने परमाणु बम बनाया तो हम भी जितना जल्दी हो सकेगा ऐसा कर लेंगे.”
साल 2015 में विश्व की तमाम देशों के साथ हुए समझौते के बाद ईरान में अपने परमाणु कार्यक्रम को रोक दिया था, हालांकि बाद में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने धमकी दी थी कि वे इस समझौते से अलग हो सकते हैं.
मध्य पूर्व के क्षेत्र में सऊदी अरब और ईरान की दुश्मनी बहुत पुरानी है. दोनों ही देशों में इस्लाम की अलग-अलग पंथों का प्रभुत्व है. एक तरफ जहां सऊदी में सुन्नी प्रभाव में हैं तो वहीं ईरान में शिया.
हाल के कुछ सालों में दोनों देशों के बीच सीरिया और यमन में हुए युद्ध के चलते भी तनातनी बढ़ी है.
यमन में कौन किसके ख़िलाफ़ लड़ रहा है?
‘मध्य पूर्व का हिटलर’
प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान सऊदी अरब की सत्ता के वारिस हैं और मौजूदा वक्त में वे सऊदी के रक्षा मंत्री हैं. सीबीएस न्यूज़ को उन्होंने 1 घंटें का इंटरव्यू दिया है.
इस इंटरव्यू में उन्होंने यह भी समझाया कि पिछले साल नवंबर में उन्होंने ईरान के प्रमुख नेता अयोतुल्लाह अली ख़मेनई को ‘मध्य पूर्व का नया हिटलर’ क्यों कहा था.
प्रिंस ने कहा, ”वे (ख़मनेई) मध्य पूर्व में अपनी अलग ही योजनाओं पर काम करना चाहते हैं, ठीक जैसे हिटलर अपने वक्त में सोचा करते थे.”
”जब तक हिटलर ने तबाही नहीं मचाई, तब तक यूरोप या किसी भी अन्य देश को अंदाजा नहीं लग पाया कि वे कितने ख़तरनाक साबित होंगे. मैं नहीं चाहता कि ऐसा ही मंजर हम मध्य पूर्व में भी देखें.”
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पाकिस्तान में परमाणु कार्यक्रम में निवेश
सऊदी अरब अमरीका का प्रमुख सहयोगी है और उसने साल 1988 में परमाणु हथियारों की अप्रसार संधि में हस्ताक्षर भी किए हैं.
यह तो किसी को नहीं पता कि सऊदी अरब ने कभी खुद का परमाणु कार्यक्रम स्थापित करने की कोशिश की या नहीं लेकिन ऐसी खबरें कई बार मिलीं कि उसने पाकिस्तान के परमाणु हथियारों के कार्यक्रम में निवेश किया है.
साल 2013 में इसरायल की खूफिया सेना के पूर्व प्रमुख अमोस यादलिन ने स्वीडन में एक सम्मेलन में कहा था, ”अगर ईरान परमाणु बम बना लेता है तो सऊदी अरब को परमाणु बम प्राप्त करने में एक महीने का भी वक्त नहीं लगेगा, वे पहले से ही इन बमों के लिए निवेश कर रहे हैं, वे पाकिस्तान जाएंगे और जो भी हथियार उन्हें चाहिए ले आएंगे.”
ईरान ने भी परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए हुए हैं, और वह लंबे समय से यह कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ शांतिपूर्ण पहल के लिए है.
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हालांकि साल 2015 में उसे अंतरराष्ट्रीय दवाब के चलते अपने परमाणु कार्यक्रम को बंद करना पड़ा, उस समय तमाम देशों ने शक़ और आशंका जताई थी कि ईरान परमाणु कार्यक्रम के तहत परमाणु हथियारों का निर्माण कर रहा है.
उस समय इस समझौते को तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की एक बड़ी जीत बताया गया था लेकिन बाद में डोनल्ड ट्रंप ने कहा था कि यह अभी तक का सबसे बेकार समझौता है.
अमरीका के पूर्व गृह मंत्री रेक्स टिलरसन इस समझौते के समर्थन में थे जबकि उनकी जगह लेने वाले माइक पोम्पो का मानना है कि इस समझौते को खत्म करना चाहिए.
जनवरी में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान पर लगे प्रतिबंधो में कुछ कमी की थी हालांकि उनका कहना था कि वे ऐसा अंतिम बार कर रहे हैं.
वहीं यूरोपीय देश ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी का मानना ने ट्रंप से अपील की है कि वे ईरान के साथ हुए समझौते को जारी रखें.

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