आवाज़ अड्डा: घोटालों पर आमने-सामने आरबीआई और सरकार

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पीएनबी घोटाले ने बहुत कम बोलने वाले आरबीआई गवर्नर को खुलकर बोलने पर मजबूर कर दिया। नतीजा, घोटाले की जिम्मेदारी को लेकर अब सरकार और रिजर्व बैंक आमने-सामने आ गए हैं। पिछले महीने वित्त मंत्री ने एक तरह से आरबीआई की खिंचाई करते हुए कहा था कि खेल के नियम तय करने वाले रेगुलटर के पास तीसरी आंख होनी चाहिए। अब आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने कहा है कि वो इस मामले में पत्थर खाने और विषपान करने के लिए तैयार हैं क्योंकि ये उनकी ड्यूटी है। लेकिन सरकारी बैंकों के रेगुलेशन को लेकर गंभीर सवाल हैं, जिनका जवाब ढूंढना होगा। वैसे सरकार ने फिलहाल उर्जित की सलाह को सिरे से खारिज कर दिया है लेकिन अब सरकारी बैंकों में दखलंदाजी से लेकर, निजीकरण और बैंकिंग सेक्टर में गैरबराबरी तक पर चर्चा की गुंजाइश बनती है। आज आवाज़ अड्डा में इसी पर बात होगी लेकिन पहले पूरा माजरा समझ लेते हैं।आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने कहा है कि वो इस मामले में पत्थर खाने और विषपान करने के लिए तैयार हैं क्योंकि ये उनकी ड्यूटी है। इस ब्लेम गेम में बुनियादी मसलों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। सरकारी बैंकों पर दोहरे नियंत्रण से दरारें आईं हैं। सरकारी बैंकों पर आरबीआई के कार्रवाई के अधिकार सीमित हैं। बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट में पर्याप्त अधिकार नहीं।उन्होंने आगे कहा कि सरकारी बैंक के डायरेक्टरों को आरबीआई हटा नहीं सकता। बैंक के मैनेजमेंट में भी बदलाव नहीं कर सकते, मर्जर, संपति बेचने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। सरकारी बैंकों पर बाजार का अनुशासन कमजोर। सरकारी बैंकों पर ज्यादा कठोर रेगुलेशन जरूरी है। सरकारी और निजी बैंकों के रेगुलेशन में फर्क नहीं होना चाहिए।उधर सरकार की तरफ से इसपर दिए गए जवाब में कहा गया है कि रिजर्व बैंक के पास पर्याप्त शक्तियां हैं। कर्ज खाते पर निगरानी की जवाबदेही आरबीआई की है। सरकार का बैंकों पर सिर्फ मालिकाना हक है। बैंकों के प्रबंधन में सरकार का दखल नहीं है।

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