लालू प्रसाद की मुश्किलों के साथ बढ़ेंगी RJD की भी चुनौतियां, आसान नहीं सियासी राह

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राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव चारा घोटाला में सजा पाकर जेल में हैं। उनकी अनुपस्थिति में राजद की सियासी राह आसान नहीं होगी।
पटना । उपचुनाव में राजद प्रत्याशियों की फतह एवं नेता प्रतिपक्ष के रूप में तेजस्वी यादव की कामयाब चर्चाओं ने यह साफ कर दिया है कि लालू प्रसाद की अनुपस्थिति में राजद की राह में चुनौतियां तो आएंगी, किंतु उत्तराधिकारियों पर नकारात्मक रूप से हावी नहीं होंगी। तेजस्वी के हालिया संघर्ष और सफलता ने माता-पिता की विरासत के बूते सियासत के फार्मूले को एक हद तक सत्यापित कर दिया है। फिर भी राजद के लिए आगे के रास्ते को निष्कंटक नहीं कहा जा सकता है।चारा घोटाले के चौथे मामले में भी राजद प्रमुख को दोषी करार दिए जाने पर उनके उत्तराधिकारी की क्षमता, पार्टी की एकजुटता, परिवार की परेशानियों एवं भाजपा विरोध की राष्ट्रीय सियासत को लेकर सवाल उठना लाजिमी है। राजद के सामने अभी सबसे बड़ी चुनौती भाजपा-जदयू के संयुक्त वार से महागठबंधन की एकता को बचाना है।हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के प्रमुख जीतनराम मांझी के पाला बदलकर राजद-कांग्रेस के साथ खड़ा होने के बाद से सत्तारूढ़ दलों की नजरें राजद के प्रति कुछ ज्यादा ही टेढ़ी हो गई हैं। हालांकि, हम में टूट का दावा करने वालों को राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी ने मूर्खों की जमात में रहने वाला करार दिया है। लेकिन, मांझी के कुनबे को विभाजित करके नरेंद्र सिंह ने तेजस्वी-मांझी की पेशानी पर बल तो ला ही दिया है। यह भी संकेत कर दिया है कि महागठबंधन की गाड़ी आगे खतरनाक मोड़ से गुजरने वाली है।लोकसभा की चुनौतियां आने वाली हैं और लालू प्रसाद का बिहार से बाहर रांची में सलाखों के पीछे बसेरा है। यह भी पता नहीं कि कब बाहर निकल पाएंगे। केंद्र और बिहार में विरोधी पार्टियों की सरकारें हैं और परिवार भी विभिन्न मुकदमों के जंजाल में है। लालू के सातवीं बार जेल जाने के बाद पार्टी का सारा दारोमदार तेजस्वी पर है। पार्टी और परिवार की हिफाजत के साथ-साथ कानूनी पचड़ों से लालू और खुद को निकालने-संभालने की बड़ी जिम्मेदारी है।दूसरे खेमे में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एवं उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी जैसे बड़े नेताओं के होने से चुनौतियों की गंभीरता समझी जा सकती है। रेलवे होटल घोटाले में उन्हें खुद को भी जांच एजेंसियों के रडार से बाहर निकालना है।
राजद के मुख्य सचेतक एवं विधायक ललित यादव का मानना है कि लालू के बिना राजद की दिक्कतें तो बढ़ गई हैं, लेकिन उपचुनाव के नतीजे ने साफ कर दिया है कि नया नेता भी किसी मायने में कमजोर नहीं है। राजद के समर्थकों को तेजस्वी यादव ने बखूबी संभाला है।महागठबंधन ने विधानसभा चुनाव लालू की ताकत के दम पर जीता था। अब 80 विधायकों वाली पार्टी के पास चेहरा भी है और ताकत भी। ललित की बातों में दम है और तर्क में भी। शीर्ष पर पहुंचने के प्रयास में जुटी भाजपा और विस्तार की राह पर चल रहे जदयू के विपरीत राजद को इस बात से खुशी हो सकती है कि 5 जुलाई 1995 में निर्माण के बाद से इस पार्टी पर बड़े-बड़े संकट आए, लेकिन विभाजन नहीं हुआ। लालू की सात-सात जेल यात्राओं के बावजूद कार्यकर्ताओं का राजद से मोहभंग नहीं हुआ।

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