शहीदी दिवस: फांसी से पहले मुस्कुरा रहे थे भगत सिंह, जानें ऐसे ही फैक्ट्स

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भारत में कई दिन ऐसे हैं जिन्हें शहीद दिवस या सर्वोदय दिवस के रूप में मनाया जाता है। इनमें से 30 जनवरी महात्मा गांधी की मृत्यु का दिन, 21 अक्टूबर को पुलिस शहीद दिवस, 17 नवंबर को लाला लाजपत राय की मृत्यु और 23 मार्च को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी होने का दिन भी शहीद या शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। आइए जानते हैं इस दिन से जुड़ी कुछ रोचक बातें…
मरने से पहले गा रहे थे, ‘रंग दे बसंती चोला’
बताया जाता है कि भगत सिंह करीब दो साल जेल में रहे और दुखी होने के बजाय वह खुश थे कि उन्हें देश के लिए कुर्बान होने का मौका मिल रहा है। बताते हैं कि फांसी पर जाते वक्त वह, सुखदेव और राजगुरु ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ गाते जा रहे थे और फांसी पर चढ़ते वक्त भगत सिंह के चेहरे पर मुस्कुराहट थी। शहीद होते वक्त भगत सिंह और सुखदेव सिर्फ 23 साल के थे और राजगुरु 22 के।
तय दिन से पहले हुई फांसी
23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरु को लाहौर जेल में फांसी दी गई थी। बताया जाता है कि उन्हें 24 मार्च की सुबह फांसी देने की सजा सुनाई दी गई थी लेकिन पूरे देश में जनाक्रोश को देखते हुए एक दिन पहले ही शाम को चुपचाप फांसी दे दी गई थी।
लाला लाजपत राय की मौत का बदला
भारत में स्वतंत्रता संग्राम में लाला लाजपत राय की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। वह साइमन कमिशन के विरोध में शामिल थे, जिसमें हुए लाठीचार्ज में वह गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके बाद वह पूरी तरह ठीक नहीं हो पाए और 17 नवंबर 1928 को उनकी मौत हो गई। भगत सिंह ने सुखदेव,राजगुरु और चंद्रशेखऱ आजाद के साथ मिलकर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने की कसम खा ली थी।
धोखे में मारा गया सांडर्स
उनकी मौत के ठीक 1 महीने बाद लाहौर में 17 दिसंबर 1928 को राजगुरु और भगत सिंह ने एएसपी जॉन पी सांडर्स को गोली मार दी। हालांकि उनका निशाना लाठीचार्ज कराने वाला जेम्स ए स्कॉट था लेकिन पहचानने में चूक होने पर सांडर्स की हत्या कर दी। भगत सिंह और राजगुरु का पीछा करने वाले एक भारतीय कॉन्सेटबल को आजाद ने गोली मार दी। भगत सिंह और उनके साथ कई महीनों तक फरार रहे।
बम फेंकने के बाद नहीं भागे भगत सिंह
इसके बाद 1929 में बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह ने दिल्ली असेंबली में बम फेंका। यह बम किसी की हत्या के लिए नहीं बल्कि अंग्रेजी हुकूमत को डराने के लिए था। अंग्रेजी सरकार दो ऐसे बिल ला रही थी जो भारतीयों के हित में नहीं थे, इन्हीं को रोकने के लिए यह कदम उठाया गया। बटुकेश्वर और भगत सिंह वहां से भाग सकते थे लेकिन दोनों ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगाते हुए वहीं खड़े रहे और गिरफ्तारी हो गई।
बम के बाद हुई गिरफ्तारी से जोड़े सांडर्स की हत्या के तार
इस घटना के बाद और भी क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी शुरू हुई। राजगुरु को पुणे से गिरफ्तार किया गया। लाहौर में बम फैक्ट्री पकड़े जाने के बाद सुखदेव की गिरफ्तारी हो गई। सब अलग-अलग आरोपों में गिरफ्तार किए गए लेकिन पुलिस ने सांडर्स की मौत से कड़ियां जोड़कर तीनों को फांसी की सजा सुना दी।

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