म्यूचुअल फंड की स्कीम में बदलाव खत्म करने के बाद ही बदलें पोर्टफोलियो

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मुंबई
सिक्यॉरिटीज ऐंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) के निर्देश की वजह से ऐसेट मैनेजमेंट कंपनियां अपनी म्यूचुअल फंड स्कीम में बदलाव कर रही हैं। सेबी चाहता है कि कंपनियां अपने प्रॉडक्ट की ऐसी कैटिगरी बनाएं, जिसमें पैसा लगाने का फैसला करने में निवेशकों को आसानी हो। सेबी के दिशानिर्देश के मुताबिक, कोई फंड हाउस 10 तरह के इक्विटी फंड्स ऑफर कर सकता है। उसे 16 तरह की बॉन्ड स्कीमें और 6 कैटिगरी के हाइब्रिड फंड्स भी ऑफर करने की इजाजत है। इनके अलावा, वे इंडेक्स फंड, फंड ऑफ फंड्स और दूसरी सॉलूशन बेस्ड स्कीम्स लॉन्च कर सकते हैं।
इसे ध्यान में रखते हुए फंड हाउसों ने अपने ओपन एंडेड इक्विटी म्यूचुअल फंड स्कीम्स की कैटिगरी में बदलाव करना शुरू कर दिया है। इस प्रोसेस की वजह से कुछ स्कीम्स को आपस में मिलाया गया है, उनके नाम में बदलाव किया गया है और कुछ में बुनियादी बदलाव किए गए हैं। मिसाल के लिए रिलायंस म्यूचुअल फंड, रिलायंस फोकस्ड लार्ज कैप फंड को रिलायंस मिड ऐंड स्मॉल कैप फंड के साथ मिला रहा है। मर्जर के बाद इसका नाम रिलायंस मिड ऐंड स्मॉल कैप फंड से बदलकर रिलायंस फोकस्ड इक्विटी फंड कर दिया जाएगा। डीएसपी ब्लैकरॉक माइक्रोकैप फंड का नाम अब डीएसपी ब्लैकरॉक स्मॉल कैप फंड होगा। डेट सेगमेंट में एबीएसएल शॉर्ट टर्म फंड का नाम बदलकर एबीएसएल कॉर्पोरेट बॉन्ड फंड और एबीएसआईएल कॉरपोरेट बॉन्ड फंड का नाम एबीएसएल क्रेडिट रिस्क फंड किया जा रहा है।ऐसा सभी फंड हाउस कर रहे हैं। इसलिए निवेशकों को अपने एसेट ऐलोकेशन गोल को ध्यान में रखकर पोर्टफोलियो में बदलाव करना होगा। मिसाल के लिए, इस बदलाव के बाद किसी लार्ज कैप फंड में किया गया निवेश लार्ज और मिड कैप फंड में चला जाता है तो इससे लार्ज कैप ऐलोकेशन में कमी आएगी और मिडकैप ऐलोकेशन बढ़ जाएगा। इस बारे में क्रेडिट सुइस वेल्थ मैनेजमेंट में फंड्स और ईटीएफ के हेड कुणाल वालिया ने कहा, ‘स्कीम में बुनियादी बदलाव के बाद निवेशकों को ऐलोकेशन की समीक्षा करनी चाहिए ताकि उन्होंने जिस मकसद से पैसा लगाया था, वह पूरा होता रहे।’कई म्यूचुअल फंड्स ने रेग्युलेटरी शर्तों को पूरा करने के लिए सिर्फ फंड के नाम में बदलाव किया है। इस बारे में मुंबई बेस्ड म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर प्लान रुपी के फाउंडर अमोल जोशी ने बताया, ‘अगर रेग्युलेटरी रिक्वायरमेंट पूरी करने के लिए सिर्फ फंड का नाम बदला गया है तो निवेशक उसमें बने रह सकते हैं।’ मिसाल के लिए, डीएसपी ब्लैकरॉक ऑपर्च्युनिटी फंड का नाम बदलकर डीएसपी ब्लैकरॉक इक्विटी ऑपर्च्युनिटी फंड कर दिया गया है, लेकिन स्कीम में कोई बुनियादी बदलाव नहीं हुआ है। वेल्थ मैनेजरों का मानना है कि निवेशकों को इस वजह से पोर्टफोलियो में बदलाव करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि निवेशकों को बदलाव करने से पहले टैक्स और एग्जिट लोड वाले एंगल का भी ख्याल रखना चाहिए।इस पर Fundsindia.com की रिसर्च हेड विद्या बाला ने कहा, ‘फंड की कैटिगरी में बदलाव होने या स्कीमों को मर्ज किए जाने से निवेशकों को यह समझने में मुश्किल होगी कि इससे उनके ओवरऑल पोर्टफोलियो ऐलोकेशन पर क्या असर होगा। क्या लार्ज कैप, मिडकैप या मल्टीकैप में उनका ऑरिजिनल ऐलोकेशन बना रहेगा? ऐसे में उन्हें सारे बदलाव के खत्म होने का इंतजार करना चाहिए और उसके बाद पोर्टफोलियो ऐलोकेशन को ध्यान में रखते हुए कोई तब्दीली करनी चाहिए।’

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