संत बसवेश्वर: 12वीं सदी का वह समाज सुधारक जो तब ‘प्रधानमंत्री’ भी रहा, आज मोदी-शाह-राहुल सब कर रहे याद

0
174

नई दिल्ली
एक संत जिसने जाति और वर्गरहित समाज का स्वप्न देखा। एक संत जिसने 800 साल पहले नारी प्रताड़ना को खत्म करने की लड़ाई लड़ी। शिव का उपासक एक संत जिसने मठों, मंदिरों में फैली कुरीतियों, अंधविश्वासों और अमीरों की सत्ता को चुनौती दी। एक संत जिसके नाम से कन्नड़ साहित्य का एक पूरा युग जाना जाता है। एक संत जो 12वीं सदी के कलचुरी साम्राज्य में ‘प्रधानमंत्री’ भी बना। एक संत जो आज कर्नाटक में लिंगायत ही नहीं बल्कि सर्व समाज के प्रिय हैं। आज संत बसवेश्वर की जयंती है। पीएम मोदी लंदन में उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं तो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह उन्हें कर्नाटक में पुष्प चढ़ा चुके हैं। कांग्रेस, राहुल गांधी और सिद्धारमैया भी सम्मान जाहिर कर उनके संदेश को याद कर रहे हैं।दरअसल इस कवायद को कर्नाटक विधानसभा चुनावों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। कर्नाटक में लिंगायत समुदाय की आबादी 17 फीसदी है। कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार ने लिंगायतों की अलग धर्म की मान्यता की मांग स्वीकार कर ली है। इसके बाद लिंगायत वोटर्स को अपनी ओर करने की जद्दोजहद शुरू हो चुकी है। दोनों पार्टियों की टॉप लीडरशिप लिंगायत मठों की ओर आशीर्वाद पाने के लिए दौड़ते नजर आ रही है। तो आइए आपको बताते हैं 12वीं सदी के उस महान संत की कहानी, जिसके सामने सब नतमस्तक हैं…
1131 ईसवी में हुआ था जन्म
संत बसवेश्वर का जन्म 1131 ईसवी में बागेवाडी (कर्नाटक के संयुक्त बीजापुर जिले में स्थित) में हुआ था। ब्राह्मण परिवार में जन्मे बसवेश्वर के पिता का नाम मादरस और माता का नाम मादलाम्बिके था। 8 साल की उम्र में बसवेश्वर या उपनयन संस्कार (जनिवारा- पवित्र धागा) हुआ, लेकिन विद्रोही बालमन इस परंपरा में नहीं टिका और उन्होंने उस धागे को तोड़ घर त्याग दिया। बसवेश्वरा यहां से कुदालसंगम (लिंगायतों का प्रमुख तीर्थ स्थल) पहुंचे, जहां उन्होंने सर्वांगिण शिक्षा हासिल की।बाद के दिनों में संत बसवेश्वर कल्याण पहुंचे जहां उस समय कलचुरी साम्राज्य के शासक बिज्जाला का शासन (1157-1167 ईसवी) था। बसवेश्वर के ज्ञान का सम्मान करते हुए कलचुरी साम्राज्य में उन्हें कर्णिका (अकाउंटेंट) का पद दिया गया। बाद में वह अपने प्रशासकीय कौशल के बदौलत राजा बिज्जाला के प्रधानमंत्री बने। लेकिन बसवेश्वर को असल चिंता समाज की बिगड़ी हुई सामाजिक-आर्थिक दशा की थी। समाज में गरीब-अमीर की खाई लगातार चौड़ी हो रही थी। छुआछूत का व्यापक असर था। लैंगिक भेदभाव वाले समाज में महिलाओं का जीवन नारकीय बना हुआ था।बसवेश्वर ने इन सभी बुराइयों के खिलाफ जंग छेड़ दी। सोशलिस्ट विचारों के आरंभिक प्रणेता के रूप में बसवेश्वर के एक महान सुधारक बनकर उभरे। उनके लेखन और दर्शन ने समाज में क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत की। उन्होंने अपने अनुभवों को एक गद्यात्मक-पद्यात्मक शैली में ‘वचन’ (कन्नड़ की एक साहित्यिक विधा) के रूप में लिखा। बसवेश्वर ने वीर शैव लिंगायत समाज बनाया, जिसमें सभी धर्म के प्राणियों को लिंग धारण कर एक करने की कोशिश की। बसवेश्वर ने सबसे पहले मंदिरों में व्याप्त भ्रष्टाचार और कुरीतियों को निशाना बनाया, जहां ईश्वर के नाम पर अमीर गरीबों का शोषण कर रहे थे। उनके महत्वपूर्ण कार्यों के लिए उनके युग को ‘बसवेश्वर युग’ का नाम दिया गया। बसवेश्वर को ‘भक्तिभंडारी बसवन्न’, ‘विश्वगुरु बसवण्ण’ और ‘जगज्योति बसवण्ण’ के नाम से भी जाना जाता है।कर्नाटक में लिंगायत राजनीति: संसद से सड़क तक बसवेश्वर पर दावेदारी कर्नाटक विधानसभा चुनावों के लिए 12 मई को वोटिंग होनी है। बीजेपी सूबे की सत्ता में वापसी कर देश की सियासत में कमजोर पड़ रही कांग्रेस को एक और धक्का देने की तैयारी में है। हालांकि इस बीच कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने एक मास्टर कार्ड खेल दिया है। राज्य सरकार ने लिंगायत समाज की अलग धर्म की मांग स्वीकार कर ली है। दरअसल लिंगायत समाज बीजेपी का कोर वोटर्स समझा जाता रहा है। माना जा रहा है कि सिद्धारमैया ने इसी में सेंध लगाने की कोशिश की है। बीजेपी के लिए चिंता की बात यह है कि लिंगायत समाज के कई मठों ने सिद्धारमैया के समर्थन का ऐलान कर दिया है।ऐसे में संत बसवेश्वर पर दावेदारी को लेकर संसद से सड़क तक एक लड़ाई दिख रही है। इसकी शुरुआत करते हुए पीएम मोदी ने फरवरी महीने में संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद भाषण देते हुए संत बसवेश्वर का जिक्र किया। पीएम ने कहा था कि कांग्रेस ने उस लोकतंत्र को भुला दिया जिसे संत बसवेश्वर ने स्थापित किया था। पीएम ने कहा बसवेश्वर ने 12वीं सदी में लोकतांत्रिक व्यवस्था का सूत्रपात कर दिया था। पीएम के निशाने पर तब शायद कर्नाटक की सियासत भी थी।इसके बाद बारी सिद्धारमैया की थी। सिद्धारमैया ने कहा कि ‘मुझे खुशी है कि आपने संसद में बसवण्ण को याद किया। बसवा ने कहा था कि जिनके पास धन है वह मंदिर बनाएंगे, मैं गरीब आदमी क्या करूंगा? कन्नड़ लोग आपका शुक्रिया अदा करेंगे, अगर आप बसवण्ण की शिक्षा को भी आत्मसात करेंगे।’ जाहिर तौर पर सिद्धारमैया बीजेपी की मंदिर पॉलिटिक्स पर निशाना साध रहे थे।आज (18 अप्रैल 2018) को बसवेश्वर की जयंती है। पीएम मोदी लंदन में ही बसवेश्वर की उस प्रतिमा को पुष्पांजलि अर्पित कर रहे हैं जिसका अनावरण खुद उन्होंने ही 2015 में किया था। इधर अमित शाह और बीजेपी के सीएम कैंडिडेट येदियुरप्पा भी श्रद्धांजलि देते हुए देखे गए हैं। कांग्रेस ने भी बसवेश्सर की शिक्षा को याद किया है। ऐसे में 12 मई की वोटिंग के बाद जब 15 मई को कर्नाटक चुनावों के परिणामों की घोषणा होगी तो यह देखना रोचक होगा कि संत बसवेश्वर का ‘आशीर्वाद’ किसके साथ जाता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here