अभूतपूर्व: मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग का नोटिस, ये हैं विपक्ष के पांच आधार

0
95

देश के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए विपक्ष एकजुट हुआ है। कांग्रेस की अगुवाई में सात विपक्षी दलों के नेताओं ने शुक्रवार को राज्यसभा सभापति एम. वेंकैया नायडू से मिलकर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस सौंपा।

महाभियोग प्रस्ताव की चर्चा काफी दिनों से थी। बजट सत्र के दौरान कांग्रेस ने इसकी मुहिम शुरू की थी। कई विपक्षी दलों ने भी उस समय प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे पर, मामला थम गया था। एक दिन पूर्व जस्टिस लोया मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के तुरंत बाद विपक्ष ने यह कदम उठाया है। नोटिस में जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ पांच आधार गिनाए गए हैं। इनमें पद के दुरुपयोग का आरोप भी शामिल हैं।नोटिस देने से पूर्व नेता विपक्ष गुलाम नबी आजाद के दफ्तर में विपक्षी नेताओं की बैठक हुई। इसके बाद कांग्रेस, एनसीपी और सीपीआई के नेताओं ने उपराष्ट्रपति भवन जाकर वेंकैया नायडू को नोटिस सौंपा। करीब 40 मिनट तक चली बैठक के बाद संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि हम चाहते थे कि यह दिन कभी नहीं आए। पर मुख्य न्यायाधीश के रवैये की वजह से हम मजबूर हुए हैं।यह पूछने पर कि उप राष्ट्रपति नोटिस नामंजूर कर देते हैं तो क्या होगा? उन्होंने कहा कि हमारे पास कई और रास्ते हैं। पर अभी खुलासा नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के चार जजों की सार्वजनिक तौर पर प्रेस कांफ्रेस के बाद हम उम्मीद करते थे कि जस्टिस मिश्रा कुछ बदलाव करेंगे। पर पिछले चार माह में कुछ नहीं हुआ।
विपक्ष के पांच आधार
1.प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट में फायदा लेने का आरोप, इसमें नाम आने के बावजूद उन्होंने जैसे मामले का निपटारा किया, उसमें जांच जरूरी है
2.प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट मामले में उन्होंने न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रिया को नजरअंदाज किया। इसकी और जांच होनी चाहिए।
3.परंपरा रही है कि जब मुख्य न्यायाधीश संविधान पीठ में हों तो किसी मामले को दूसरे जज के पास भेजा जाता है। पर, यहां ऐसा नहीं हो रहा
4.मुख्य न्यायाधीश ने अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया। उन्होंने कई संवेदनशील मामलों को चुनिंदा बेंचों को दिया।
5.मुख्य न्यायाधीश जब वकील थे, तो उन्होंने एक फर्जी हलफनामे से जमीन का अधिग्रहण किया। एडीएम ने यह आवंटन 1985 में रद्द कर दिया था। पर इन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्त होने के बाद 2012 में वह जमीन वापस की।
अब आगे क्या
’ सभापति प्रस्ताव स्वीकार कर लेते हैं तो तीन सदस्यीय समिति (सुप्रीम कोर्ट के जज, हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस या जज,कानूनविद) आरोपों की जांच करेगी।
’ समिति जांच पूरी करने के बाद अपनी रिपोर्ट पीठासीन अधिकारी को सौंपेगी। इसके बाद आरोपी जज को भी अपने बचाव का मौका मिलेगा।
’ दोष साबित होने पर प्रस्ताव को लोकसभा और राज्यसभा से पारित करना अनिवार्य है। इसके लिए दो तिहाई सदस्यों की अनुमति जरूरी होगी।
किसने क्या कहा
राज्यसभा में नेता विपक्ष गुलाम नबी आजाद ने बताया कि नोटिस पर 71 सदस्यों के हस्ताक्षर हैं। इनमें से सात सदस्य सेवानिवृत्त हो गए हैं। ऐसे में सात पार्टियों के 64 सदस्यों के हस्ताक्षर हैं। कई और सदस्यों का समर्थन भी हासिल है। हालांकि, उन्होंने दस्तखत नहीं किए हैं।वहीं कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने कहा कि कांग्रेस अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने संवैधानिक आदर्शों का उल्लंघन किया।भाजपा नेता मीनाक्षी लेखी ने कहा कि जिनकी राजनीतिक जमीन नहीं बची वे ऐसी हरकत कर रहे हैं। न्यायपालिका की गरिमा कम की जा रही है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here