महाभियोगः पहली बाधा पार करना होगा बेहद मुश्किल, ये है वजह

0
155

कांग्रेस समेत सात दलों की तरफ से देश के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को अगर राज्यसभा में लाने की मंजूरी मिलती है, तो उसके लिए उच्च सदन की पहली बाधा पार करना बेहद मुश्किल ही नहीं असंभव होगा।भाजपा व उसके साथ सहयोगी दलों की उच्च सदन में इतनी ताकत है कि सारा विपक्ष एकजुट होकर भी इसे पारित नहीं करा सकता है। वैसे भी विपक्षी खेमे के कई प्रमुख दल इस प्रस्ताव के साथ नहीं हैं। लोकसभा में भाजपा का अपना बहुमत होने से ही यह पारित नहीं हो सकता है।कांग्रेस और उसके साथ खड़े दल जिस मकसद से भी इस प्रस्ताव को लाए हों, लेकिन संसदीय व राजनीतिक गणित में भाजपा भारी है। एनडीए के खेमे के पास विभिन्न दलों से जुड़े पक्के 86 सांसद (भाजपा, जदयू, शिवसेना, अकाली दल, पीडीपी, बीपीएफ, एसडीएफ, एनपीएफ, आरपीआई) ही विपक्ष के प्रस्ताव को रोक देने में सक्षम हैं। हालांकि, एनडीए के साथ निर्दलीय, मनोनीत व अन्य दलों को मिलाकर यह संख्या सौ से अधिक हो जाती है। द्रमुक, बीजद, तृणमूल व तेलुगुदेशम के साथ न देने से कांग्रेस खेमा और भी ज्यादा कमजोर हो जाता है।
संख्याबल के पड़ेंगे लाले
संवैधानिक प्रावधान के अनुसार महाभियोग को संसद के दोनों सदनों में पारित कराना होता है। इसके लिए हर सदन में कुल सदस्यों के बहुमत का समर्थन के साथ सदन में मौजूद सदस्यों व वोट देने वालों का दो तिहाई समर्थन जरूरी है। राज्यसभा में इस समय 244 सदस्य हैं। सदन में बहुमत की 123 पर होता है। जबकि दो तिहाई बहुमत के लिए 162 सदस्यों का समर्थन चाहिए। एनडीए को इसे रोकने के लिए केवल 82 यानी एक तिहाई सांसद ही चाहिए, जबकि उसके पास सौ से ज्यादा सांसदों का समर्थन है। राज्यसभा में प्रस्ताव रूक जाने के बाद लोकसभा में आने का सवाल ही नहीं है। वैसे भी वहां पर भाजपा अकेले ही इसको गिराने में सक्षम हैं।
राजनीतिक लाभ की भी स्थिति में भाजपा
भाजपा के लिए इस प्रस्ताव पर हर स्थिति में लाभ की स्थिति है। न्यायाधीश मिश्रा अयोध्या मामले की भी सुनवाई कर रहे हैं। ऐसे में उनके खिलाफ विपक्ष का कोई भी राजनीतिक दांव भाजपा के लिए फायदेमंद होगा। वैसे भी विपक्ष ने अपने प्रस्ताव में जो आरोप लगाए हैं वे महाभियोग के जरूरी दो बिंदुओं जज की अक्षमता व कदाचार से मेल नहीं खाते हैं। ऐसे में सभापति के स्तर पर ही इसके आगे बढ़ने को लेकर संशय है। हालांकि विपक्ष सभापति के स्तर पर प्रस्ताव रोके जाने को लेकर राजनीतिक मुद्दा बना सकता है।संविधान विशेषज्ञों ने महाभियोग प्रस्ताव का विरोध किया
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ शुक्रवार को महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस देने वाली कांग्रेस ने 25 साल पहले सत्ता में रहते हुए ऐसी ही कार्यवाही का विरोध किया था। दिलचस्प बात यह है कि पहले तीन मौकों पर उस वक्त महाभियोग प्रस्ताव लाए गए थे जब कांग्रेस केंद्र की सत्ता में थी। मई 1993 में जब पहली बार उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति वी रामास्वामी पर महाभियोग चलाया गया तो वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में कपिल सिब्बल ने ही लोकसभा में बनाई गई विशेष बार से उनका बचाव किया था। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों द्वारा मतदान से अनुपस्थित रहने की वजह से यह प्रस्ताव गिर गया था। उस वक्त केंद्र में पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी। न्यायमूर्ति रामास्वामी के अलावा वर्ष 2011 में जब कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया तो भी कांग्रेस की ही सरकार थी। इसी तरह सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति पीडी दिनाकरण के खिलाफ भी इसी तरह की कार्यवाही में पहली नजर में पर्याप्त सामग्री मिली थी लेकिन उन्हें पद से हटाने के लिए संसद में कार्यवाही शुरू होने से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया था।भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) दीपक मिश्रा के खिलाफ कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी पार्टियों द्वारा लाए जा रहे महाभियोग प्रस्ताव का कई कानूनविदों और संविधान विशेषज्ञों ने विरोध किया है। उनका साफतौर पर कहना है कि यह प्रस्ताव प्रायोजित और राजनीतिक है।
जानेमाने संविधान विशेषज्ञ सुभाष सी कश्यप ने कहा, यह राजनीतिक कारणों से लाया गया प्रस्ताव है। इसका मकसद न्यायपालिका और सरकार को परेशान करना है। उन्होंने दो टूक कहा कि संविधान में जजो को हटाने के लिए महाभियोग का कोई प्रावधान नहीं है। यह शब्द केवल राष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया के लिए है। संविधान के मुताबिक जजों को केवल अक्षमता और कदाचार के आधार पर हटाया जा सकता है और यह अब भी अमल में है। इसलिए राज्यसभा के सभापित प्रस्ताव को खारिज कर सकते हैं।अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, इससे बुरा स्वतंत्र न्यायपालिका के लिए कुछ भी नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा, शुक्रवार की घटना से लोगों की न्यायपालिका के प्रति विश्वास और आस्था को धक्का लगा है। उन्होंने कहा, सीजेआई के खिलाफ महाभियोग का कोई आधार नहीं है। साथ ही न्यायपालिका को भी बिना राजनीतिज्ञों को मौका दिए बिना विवादों को खुद ही सुलझाने की सलाह दी। सोराबजी के विचार पर सहमति जताते हुए हाईकोर्ट के पूर्व जज एस एन ढींगरा ने कहा, इसका मकसद राजनीतिक लाभ उठाना है। उन्होंने 12 जनवरी को शीर्ष अदालत के चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस का हवाला देते हुए कहा कि उसका प्रभाव महाभियोग नोटिस में दिखता है। लेकिन जजों के बीच नाराजगी की वजह से महाभियोग प्रस्ताव को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता है। नाराजगी जीवन का हिस्सा है।हाईकोर्ट के ही पूर्व जज अजीत कुमार सिन्हा और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने इसे न्यायपालिका के लिए दुर्भाग्यपूर्ण दिन करार दिया। उन्होंने कहा, यह महज गुरुवार के फैसले (जज बीएच लोया की मौत की जांच की मांग वाली याचिका खारिज करना)की प्रतिक्रिया है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here