महाभियोग:संविधान विशेषज्ञ और पूर्व जज बोले-विपक्ष का CJI के खिलाफ नोटिस राजनीति से प्रेरित

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संवैधानिक विशेषज्ञों को लगता है कि कांग्रेस नीत विपक्ष का देश के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा को पद से हटाने की कार्यवाही शुरू करने के लिए दिए गए नोटिस से राजनीति की बू आती है और यह संसद में पारित नहीं हो पाएगा।विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न तो शक्तियों का दुरूपयोग है और न ही कोई कदाचार है। सात विपक्षी दलों के नेताओं ने आरोप लगाते हुए शुक्रवार को उप राष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू से मुलाकात की और उन्हें प्रधान न्यायाधीश को पद से हटाने की कार्यवाही शुरू करने के प्रस्ताव का नोटिस दिया। इस नोटिस पर 64 राज्यसभा सदस्य और सात ऐसे सदस्यों के हस्ताक्षर हैं, जिनका कार्यकाल समाप्त हो चुका है। न्यायमूर्ति सिन्हा और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने इसे न्यायपालिका के लिए एक ‘दुखद दिन’ बताया।
‘यह घटना लोगों के मन में न्यायपालिका में विश्वास और भरोसे को हिला देगी’
यह कदम प्रधान न्यायाधीश के नेतृत्व वाली उच्चतम न्यायालय की एक पीठ द्वारा उन याचिकाओं को खारिज किए जाने के एक दिन बाद आया है, जिनमें विशेष सीबीआई न्यायाधीश बीएच लोया की मृत्यु की स्वतंत्र जांच की मांग की गई थी। विपक्ष के इस कदम को विधिवेत्ता सोली सोराबजी, उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीशों एसएन ढींगरा और अजित कुमार सिन्हा, वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने ‘राजनीति से प्रेरित’ बताया। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार के दौरान अटॉर्नी जनरल रहे सोली सोराबजी ने प्रधान न्यायाधीश को उनके पद से हटाने के की कार्यवाही शुरू करने के लिए विपक्ष की ओर से उपराष्ट्रपति को दिए गए नोटिस पर तीखा हमला बोला और कहा,’न्यायपालिका की स्वतंत्रता के साथ यह सबसे खराब बात हो सकती है। यह घटना लोगों के मन में न्यायपालिका में विश्वास और भरोसे को हिला देगी।’
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न्यायमूर्ति एसएन ढींगरा ने नोटिस को राजनीति से प्रेरित बताया
सोली सोराबजी के विचार से सहमत होते हुए न्यायमूर्ति ढींगरा ने कहा कि यह राजनीतिक लाभ हासिल करने का एक प्रयास है। उन्होंने गत 12 जनवरी को न्यायालय के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एमबी लोकुर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ की ओर से बुलाए गए प्रेस कॉन्फ्रेंस की ओर परोक्ष रूप से इशारा किया, जिसमें वे मुद्दे उठाए गए थे जो कि इस नोटिस में प्रतिबिंबित हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि न्यायालय के न्यायाधीशों के बीच असंतोष इस कदम को उचित नहीं ठहराता। उन्होंने कहा,’यह नोटिस राजनीति से प्रेरित है और संसद सदस्य यह जानते हुए राजनीतिक लाभ चाहते हैं कि उनके पास प्रधान न्यायाधीश को हटाने की कार्यवाही के लिए पर्याप्त संख्या बल नहीं है। न्यायाधीशों के बीच असंतोष का यह मतलब नहीं कि आप पद से हटाने की कार्यवाही शुरू कर दें। असंतोष जीवन का एक हिस्सा है।’

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