सुप्रीम कोर्टः आसान नहीं जजों को हटाना, पढ़ें महाभियोग की पूरी प्रक्रिया

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संविधान में न्यायपालिका की निष्पक्षता का पूरा ख्याल रखा गया है। साथ ही जवादेही सुनिश्चित करने के लिए ‘निरीक्षण एवं संतुलन’ के सिद्धांत को अपनाया गया है। यही वजह है कि विधायिकों को जजों को हटाने के लिए महाभियोग चलाने का अधिकार दिया गया है। लेकिन इसकी प्रक्रिया जटिल रखी गई, ताकि इसका दुरुपयोग नहीं हो सके। तो जानते हैं महाभियोग की पूरी प्रक्रिया को।
संवैधानिक प्रावधान
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को संविधान के अनुच्छेद 217 (1) तथा 124 (4) में दी गई महाभियोग प्रक्रिया के अनुसार हटाया जाता है। संसद में यह कार्रवाई प्रधानमंत्री को दी गई मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश पर होती है।
सांसद भी पेश कर सकते प्रस्ताव
जजेज इंक्वायरी एक्ट, 1968 के तहत सांसदों की पहल पर भी यह प्रस्ताव लाया सा सकता है। प्रस्ताव के लिए राज्यसभा के 50 या लोकसभा के 100 सांसदों के हस्ताक्षर वालापत्र राज्यसभा के सभापति या लोकसभा स्पीकर को देना आवश्यक है।
सभापति-स्पीकर को विवेकाधिकार प्राप्त
महाभियोग प्रस्ताव आने पर राज्यसभा के सभापति जजेज इंक्वायरी एक्ट, 1968 की धारा 3(1)(बी) के तहत प्रस्ताव का निरीक्षण करते हैं। इस मामले में उन्हें इसका विवेकाधिकार प्राप्त है। सभापति के लिए प्रस्ताव पर फैसला करने के लिए कानूनी रूप से कोई अवधि तय नहीं की गई है। यही व्यवस्था लोकसभा में भी है।
विचार विमर्श के बाद जांच
सभापति प्रस्ताव पर प्रारंभिक राय बनाने के लिए कानूनविद / न्यायविद / अटॉर्नी जनरल या किसी व्यक्ति से परामर्श करते हैं। यदि वह उससे संतुष्ट हो जाते हैं, तो वह जांच के लिए समिति का गठन करते हैं। यदि सभापति संतुष्ट नहीं होते हैं तो वह प्रस्ताव को खारिज कर देते हैं। लोकसभा में प्रस्ताव में भी यही प्रक्रिया अपनाई जाती।
फैसले को चुनौती संभव
प्रस्ताव खारिज करने के सभापति के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। लेकिन यह बहुत ही सीमिति आधार पर होती है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सिर्फ यह देखता कि प्रक्रियाओं का पालन हुआ है या नहीं। या उपराष्ट्रपति के विवेकाधिकार का इस्तेमाल करते हुए कानूनों के अनुसार निर्णय लिया है या नहीं।
प्रस्ताव मंजूरी के बाद गठित होती समिति
जांच समिति में सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ जज तथा एक न्यायविद होते हैं। यह समिति दोनों पक्षों आरोप लगाने वाले तथा आरोपित जज का पक्ष सुनती है और अपनी रिपोर्ट देती। यदि समिति जज को दोषी पाती है, तो रिपोर्ट को संसद के दोनों सदनों में बहस के लिए रखा जाता है।
जांच के साथ जज की शक्तियां सील
जांच समिति का गठन होने पर आरोपित जज को न्यायिक और प्रशासनिक कार्य से हटना होता है। क्योंकि उसे जांच समिति के सामने अपना पक्ष रखना होता है।
अदालत की तरह काम करती संसद
रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में बारी-बारी से रखी जाती है। इस दौरान आरोपित जज को रिपोर्ट और संबंधित दस्तावेज दिए जाते हैं। संबंधित जज स्वयं या अधिवक्ता के जरिये अपना पक्ष दोनों सदनों में रखता है। इसके बाद मतदान होता है। अगर प्रस्ताव दोनों सदनों में में दो तिहाई मतों से पारित होता है, तो आरोपित जज को पदच्युत मान लिया जाता है।
कोई अपील नहीं
संसद का यह फैसला अंतिम होता है। इस फैसले के खिलाफ किसी भी कोर्ट में कोई अपील या रिट नहीं दायर की जा सकती।

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