कैराना के रण में अभी तक अनसुलझे हैं विपक्षी एका के समीकरण

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2019 के लोकसभा चुनाव से पहले होने वाले कैराना उपचुनाव की विसात सज चुकी है. कैराना लोकसभा सीट और नूरपुर विधानसभा सीट के लिए 28 मई को मतदान होंगे. चुनाव की तारीखों की घोषणा के बावजूद विपक्षी एका के समीकरण अनसुलझे हैं. गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती पहले ही साफ़ कर चुकी हैं कि वे अब किसी भी उपचुनाव में किसी दल का समर्थन नहीं करेंगी. लिहाजा अब सपा, कांग्रेस और रालोद को मिलकर ही अपना सेनापति तय करना है. कहा जा रहा है कि दो तीन दिन में स्थिति साफ होगी.

विपक्षी दलों के बीच गठबंधन की स्थिति में साझा उम्मीदवार उतारने पर सहमती बन सकती है. ऐसे में रालोद के जयंत चौधरी का नाम आगे चल रहा है. दरअसल, बसपा की चुप्पी और कांग्रेस ने रालोद के जयंत चौधरी के नाम की पैरोकारी की है. हालांकि पिछले दिनों सपा के नरेश उत्तम पटेल ने शामली में पार्टी कार्यकर्ताओं संग बैठक किया और मुस्लिम-जाट-दलित फ़ॉर्मूले को धार देने की कोशिश की. सपा की तरफ से सुधीर पंवार और तबस्सुम हसन का नाम भी चर्चा में है. फिलहाल आने वाले कुछ दिनों में यह तय होगा कि सपा अपना उम्मीदवार मैदान में उतरती है, या फिर गठबंधन की स्थिति में साझा उम्मीदवार का समर्थन करती है.

विपक्ष की तरफ से इस सीट पर रालोद और सपा अपनी दावेदारी जाता रहे हैं. बता दें 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों में इस इलाके के बहुत सारे गांव प्रभावित हुए थे. इसी के बाद ध्रुवीकरण की वजह से बीजेपी को बड़ी कामयाबी मिली थी. लेकिन 2017 के चुनाव में माहौल बदला है. विपक्षी दलों द्वारा संयुक्त प्रत्याशी उतारने पर बीजेपी को चुनौती मिल सकती है.

कैराना उपचुनाव को लेकर गठबंधन की स्थिति साफ नहीं है फिर भी चर्चा है कि क्या कांग्रेस इसका हिस्सा होगी? कांग्रेस ने गोरखपुर और फूलपुर चुनाव अकेले लड़ा था. कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने सपा की दावेदारी पर निशाना साधा है. उन्होंने इस सीट से रालोद को चुनाव लड़ाने की पैरोकारी की है.

2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के हुकुम सिंह यहां से 2.37 लाख वोटों से जीतकर लोकसभा पहुंचे थे. इस सीट पर यूं तो गुर्जर भी चुनाव जीते हैं, लेकिन यह जाटों या मुसलमानों के लिए ज्यादा मुफीद रही है. 2014 में यहां सपा दूसरे, बसपा तीसरे और राष्ट्रीय लोक दल चौथे नंबर रार रही थी. हुकुम सिंह को तीनों दलों के उम्मीदवार को मिले वोटों से जयादा 50.54 फ़ीसदी मत मिले थे. 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस व सपा में गठबंधन था. इस संसदीय क्षेत्र के चार विधानसभा सीटों में से तीन पर बीजेपी और एक पर सपा विजयी रही थो. तीन पर कांग्रेस और एक पर रालोद दूसरे नंबर पर था.

कैराना लोकसभा सीट पर 16 लाख से ज्यादा वोटरों में सर्वाधिक तादाद मुस्लिम की है. दूसरा नंबर अनुसूचित जाति का है. इन दोनों के वोट मिलाकर करीब 45 फ़ीसदी के आस-पास बैठते हैं. जाट वोट 10 फ़ीसदी है. इसके बाद गुर्जर, कश्यप और सैनी मतदाता हैं. इनकी संख्या एक से सवा लाख के करीब है.

बीजेपी से दिवंगत हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह का टिकट लगभग पक्का मन जा रहा है. वह गुर्जर समाज से हैं. बीजेपी के वोटों के ध्रुवीकरण को रोकने के लिए विपक्षी दल जाट या किसी अन्य पिछड़े वर्ग के नेता को चुनाव लड़ा सकते हैं. यूं तो प्रत्याशी मुस्लिम भी हो सकता है लेकिन इस स्थिति में बीजेपी वोटों का ध्रुवीकरण करने की कोशिश कर सकती है. इससे बचने के लिए विपक्ष किसी जाट को मैदान में उतार सकता है. हालांकि नूरपुर विधानसभा सीट के लिए स्थिति साफ है. यहां सपा ही चुनाव लड़ेगी. 2017 में भी पार्टी यहां दूसरे नंबर पर थी.

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