मेक इन इंडिया के तहत बन रहे हथियार महंगे

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मेक इन इंडिया के तहत बन रहे हथियार विदेशों से आयात किए जा रहे बेहतर गुणवत्ता वाले हथियारों से भी महंगे पड़ रहे हैं। सस्ता और बेहतर गुणवत्ता को आधार बनाकर सुरक्षा बलों के लिए 39 हजार असॉल्ट राइफल बुल्गारिया से खरीदे जा रहे हैं। एक असॉल्ट हथियार की कीमत करीब 41 हजार रुपये है। जबकि देश में बनने वाली इंसास राइफल की कीमत गृह मंत्रालय द्वारा हथियारों की खरीद के लिए मंजूर सूची के मुताबिक 57 हजार रुपये है।मिल रही हैं शिकायतें : सुरक्षा बल से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इंसास की क्षमता को लेकर मिल रही शिकायतों की वजह से इसे हटाया जा रहा है। इसकी जगह असॉल्ट राइफल खरीदी जा रही है। खरीद के लिए ग्लोबल टेंडर भी जारी हो चुका है।फायरिंग के दौरान खराबी : इंसास की ज्यादा कीमत के बावजूद इसकी शिकायतें मिल रही थीं। कई जगहों पर फायरिंग के दौरान इंसास ने काम करना बंद कर दिया। सुरक्षा बल की खरीद से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि इंसास के जल्दी गर्म होने, मैग्जीन के टूटने जैसी शिकायतें मिल रहीं थीं। इसकी क्षमता को लेकर भी कई जगहों से शिकायतें आ रहीं थीं। जबकि, असॉल्ट राइफल ज्यादा समय तक काम करने वाली और इस्तेमाल में सुविधाजनक है। यह इंसास की तुलना में ज्यादा मारक है।नक्सल-आतंक प्रभावित क्षेत्रों में बदले जा रहे हथियार : सुरक्षा बल से जुड़े अधिकारी के मुताबिक पहले चरण में नक्सल और आतंक प्रभावित क्षेत्रों में तैनात सुरक्षा बल, राज्य पुलिस बल के जवानों को इंसास की जगह असॉल्ट राइफल दी जा रही है। इस समय करीब तीन फीसदी हथियारों को बदला जा चुका है। आने वाले एक साल में सुरक्षा बल के करीब दस फीसदी जवानों को नए हथियार मिल जाएंगे।बरेटा का भी ट्रायल : सुरक्षा बल जेवीपीसी 56 (ज्वाइंट वेंचर प्रोटेक्टिव कार्बाइन) की जगह इटली की बरेटा को खरीदने पर भी विचार कर रहे हैं। बरेटा की कीमत 45 हजार रुपये के करीब पड़ेगी। जबकि जेवीपीसी की कीमत 88 हजार रुपये के आसपास है। बरेटा का परीक्षण किया जा चुका है।पूर्व एडीजी बीएसएफ पीके मिश्रा ने बताया- देश में तैयार हथियारों के महंगे होने की बड़ी वजह निजी क्षेत्रों की भागीदारी नहीं होना है, यहां श्रम सस्ता है लेकिन तकनीकी के मामले में पीछे हैं, रिसर्च पर ज्यादा काम नहीं होने से गुणवत्ता पर भी इसका असर साफ दिख रहा है।लागत ज्यादा होना भारी पड़ रहा
देश के आयुध कारखानों में तैयार हो रहे हथियार निर्माण में लागत ज्यादा होने की वजह से विदेशी हथियारों की तुलना में महंगे पड़ रहे हैं। निजी कंपनियों की हिस्सेदारी न होने से बाजार में कीमतों को लेकर प्रतिस्पर्धा नहीं है। शोध के लिए मंत्रालय की मंजूरी में लगने वाला लंबा वक्त भी मेक इन इंडिया के तहत बनने वाले हथियारों की गुणवत्ता और कीमत राह में बड़ी बाधा है।
विदेश में आधुनिक मशीनों ने लागत 30 फीसदी घटाया :
विदेशों में हथियारों का निर्माण निजी क्षेत्र के हाथ में हैं। बुल्गारिया, इटली, स्वीडन, अमेरिका, फ्रांस, इजरायल जैसे प्रमुख हथियार आपूर्तिकर्ता देशों में पूरा काम निजी कंपनियों के हवाले है। इस वजह से वहां उत्पादन क्षमता भारत के मुकाबले ढाई से तीन गुना है। इसके साथ अत्याधुनिक मशीनों ने उत्पादन लागत को 30 फीसदी तक घटा दिया है।
मंत्रालय की धीमी चाल :
आयुध निर्माणियों में प्रति कर्मचारी हथियार उत्पादन निजी कंपनियों के मुकाबले आधा है। इसके अलावा छोटे से छोटे काम और रिसर्च के लिए रक्षा मंत्रालय की मंजूरी में लंबा वक्त लगता है। यही वजह है कि रिसर्च में तैयार हथियार दस-दस साल तक सेना का हिस्सा नहीं बन पाते। वह या तो परीक्षण में ही दम तोड़ देतें हैं या इसी वजह बढ़े खर्च का बोझ सुरक्षा बलों को दिए जा रहे हथियारों की कीमत पर पड़ता है।
अाधुनिकीकरण में पिछड़े :
इंसास जैसे राइफल बनाने के लिए जरूरी विशेष इस्पात को तैयार करने के लिए फोर्जिंग प्रेस मशीन की जरूरत है। ये प्रस्ताव 2009 में पास हुआ था और मंजूरी भी मिल गई थी लेकिन 300 करोड़ के इस प्लांट का इंतजार आज भी फील्ड गन फैक्ट्री को है।
10 हजार कर्मचारी हैं सिफ कानपुर की पांच आयुध निर्माणियों में
2500 करोड़ भी नहीं है यहां हथियारों का उत्पादन
03 हजार कर्मचारी हैं रक्षा क्षेत्र में काम कर रहीं निजी कंपनियों के पास
15 हजार करोड़ तक का सौदा कर रहीं हैं भारत फोर्ज, टाटा और महिन्द्रा जैसी कंपनियां
गौरव हैं हमारे आयुध कारखाने
-41 आयुध निर्माणियां हैं देश में, इन सभी में उत्पादन जारी
-कानपुर की स्माल आम्स फैक्ट्री और फील्ड गन में निर्भीक, निशंक, मार्क-3, मार्क-4 जैसी रिवाल्वर बन रही हैं
-निशंक महज 325 ग्राम वजनी है। जो दुनिया की सबसे हल्की रिवाल्वर में से एक है
-निर्भीक को निर्भया कांड के बाद खासकर महिलाओं के लिए तैयार किया गया था
-इन रिवाल्वरों की कीमत 85 हजार से 1.25 लाख रुपये के बीच है

धनुष और टी-70 टैंकों के मामले में अन्य देशों से आगे
-बोफोर्स को धनुष टैंक में अपग्रेड करने का खर्च केवल 2.5-3 करोड़ रुपये आएगा, जो बहुत कम है
-‘सारंग’ की कीमत भी इसकी इजरायली ‘सॉल्टम’ की तुलना में 40 फीसदी कम है
-सुपर रैपिड गन की कीमत तो केवल 1.5-2 करोड़ रुपये है, जबकि इसे अभी विदेशों से 10-12 करोड़ में आयात किया जा रहा है

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